त्रयंबकेश्वर मंदिर : 200 रुपये डोनेशन देकर वीआईपी दर्शन करने की बात लिखा देख मन बिदक गया

Yashwant Singh : आजकल नासिक में डेरा है. यहां चाचाजी की ओपन हॉर्ट सर्जरी हुई है. सब कुछ सकुशल रहा. वे अपने सुपुत्र और मेरे छोटे भाई Rudra Singh के यहां रहकर स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं. चाचाजी के कहने पर आज नासिक से कुछ दूर स्थित त्रयंबकेश्वर मंदिर गया, जिसकी हिंदू धर्म में बहुत महिमा है. पर मंदिर के गेट पर 200 रुपये डोनेशन देकर वीआईपी दर्शन करने की बात लिखा देख मन बिदक गया. भीतर नहीं गया. पूछा तो पता चला कि आम जनता लंबी लाइन लगाकर काफी समय गुजारने के बाद दर्शन लाभ पाती है लेकिन जो दो सौ रुपये दे देते हैं उन्हें तुरंत डायरेक्ट दर्शन करा दिया जाता है.

 

मैं वैसे भी कर्मकांड और दुनियावी किस्म के पूजापाठ को लेकर बेहद अधार्मिक रहा हूं, सो यहां इस भेदभाव पूर्ण पद्धति से दर्शन करने का मतलब ही नहीं. बाकी जिन मंदिरों वगैरह में जाता हूं वहां दर्शन भाव से कम, उत्सुकता भाव से ज्यादा जाता हूं कि आखिर वो मूर्ति पत्थर जगह स्थल पीठ क्या कैसी है, जिसके लिए इतने लोग आते हैं और जिसकी इतनी मान्यता है, इसी टाइप की फील ज्यादा खींच ले जाती है. त्रयंबकेश्वर मंदिर के आसपास के इलाके में घूमा. पहाड़ से घिरा यह स्थान उस समय कितना अदभुत रहा होगा जब यहां इतनी भीड़भाड़ व बसावट न रही होगी. तब सच में यहां उर्जा पुंज चारों तरफ रहा होगा, वाइब्रेशन फील होती रही होगी. लेकिन अब तक इतने मकान, इतनी दुकान और इतने सारे लोग हैं कि भगवान खुद भी चले आएं तो अफना के कुछ देर या कुछ दिनों में भाग जाएं.

उपर एक तस्वीर में देख सकते हैं डोनेशन वाली बात कितनी साफ साफ ढंग से मंदिर के मुख्य गेट पर दर्ज है.
एक तस्वीर में मेरे अनुज रुद्र और मैं लैपटाप पर काम करते और टीवी पर डिस्कवरी साइंस चैनल देखते नजर आ रहे हैं.
एक तस्वीर में पहाड़ कुंड और प्रकृति का नजारा है.
एक तस्वीर में दूर से दिख रहे त्रयंबकेश्वर मंदिर की प्रतिलिपि पानी में दिख रही है.

आप लोग भी यहीं से दर्शन कर लें. आने की जरूरत नहीं है. मन चंगा तो कठौती में गंगा.

मुंबई से नासिक की कार यात्रा के दौरान सोचता रहा कि कितना हरा भरा ये इलाका है. उत्तर भारत वाली चेंचें कोंकों पोंपों वाली चिरकुटई पूरी यात्रा में कहीं न दिखी. सब कुछ मानों किसी चित्रकार ने बेहद कुशलता से संयोजित कर रखा हो. बेहद उदात्त और अनुशासित सा सब कुछ. बेहद हरा भरा और चटक सा सब कुछ.

दूसरा पहलू ये कि पानी बिना ये पूरा इलाका मरणासन्न होने की ओर बढ़ रहा है. विदर्भ के संकट की एक झलक यहां यूं दिखी कि पीने के पानी का काफी रायता फैला हुआ है. कोई कह रहा था कि अगर वाटर लेवल ठीक करने की बड़ी कोशिशें न की गईं तो सौ पचास साल में यहां मरघट हो जाएगा और सारे लोग उन इलाकों की तरफ विस्थापित हो जाएंगे जहां पीने का पानी जमीन में ठीक मात्रा में उपलब्ध है.

नाशिक में बरसाती पानी को रोककर उसी पानी को साल भर घरों में सप्लाई किया जाता है. लोग इसे पीते नहीं. पीने का पानी बाहर से मंगाते हैं. यानि यहां पानी का कारोबार खूब है. वैसे, यहां पेड़ पौधे पहाड़ियां व हरियाली खूब है लेकिन यह सब कितने दिनों तक रहेगा जब हर साल बारिश कम से कमतर होती जा रही है और वाटर लेवल का कहीं अता पता नहीं है. इन दिनों जब उत्तर भारत में कड़ाके की ठंढी पड़ रही है तो नाशिक में हम लोग पंखा चलाकर सो रहे हैं. जैकेट पहनकर बाहर निकलने की भूल कर गया मैं तो इसका पश्चाताप पूरे रास्ते रहा कि हाय इस भार को क्यों डाल लिया शरीर पर.

सोचिए, जब कड़ाके की ठंढ में इधर ये हाल है तो गर्मी में ये पूरा इलाका कैसा होता होगा. हालांकि समुद्र किनारे वाले शहरों में ठंढी गर्मी दोनों कम पड़ती है लेकिन इतनी भी कम सर्दी नहीं पड़ती जैसी नाशिक में पड़ रही. बेहद खतरनाक बात तो बारिश का न्यूनतम होते जाना है.

कोढ़ में खाज सरकार की नीतियां हैं. पूरा इलाका अब मकान फ्लैट बनाने के लिए लगातार उलीच कर समतल किया जा रहा है. पहाड़ काट डाले गए. पेड़ काटे डाले गए. पानी लील लिया गया. तालाब नाले पोखरे पाट डाले गए. हर तरफ बड़े बड़े मकान दुकान रंगरोगन से सजे ईंट पत्थरों के आलीशान मानवी ठिकाने उग चुके हैं. इस तरह के विकास का नतीजा यही दिख रहा है कि यहां आर्थिक रूप से बेहद ताकतवर लोग ही रह पाएंगे. गरीब या तो विस्थापित होगा या आत्महत्या करेगा, जिसका ट्रेंड विदर्भ के जरिए हम लोगों को बखूबी इंडिकेट कर रहा है.

महाराष्ट्र में हरित आंदोलन या यूं कहिए प्रकृति आंदोलन चलाने की जरूरत है. रीयल इस्टेट माफियाओं पर लगाम कसने के लिए सरकारी नीति बदलने को लेकर पढ़े लिखे संवेदनशील तबके को चौतरफा दबाव बनाने बनवाने की जरूरत है. अगर आज हमारी पीढ़ी के लोगों ने यह सब नहीं किया तो भविष्य के नौनिहालों के लिए महाराष्ट्र किसी मौत के राष्ट्र सरीखा होगा.

मराठी मानुष की राजनीति करने वाली पार्टियां अगर वाकई क्षेत्रीय विशिष्टता और क्षेत्रीय ताकत को बढ़ावा देने के लिए चिंता करें तो उन्हें सबसे पहले पानी-प्रकृति बचाने बढ़ाने का महाअभियान शुरू करना चाहिए. लेकिन हमको मालूम है इनकी नीयत ठीक नहीं. इसलिए ये शार्टकट वाली राजनीति करने पर आमादा रहेंगे, मराठी – गैर मराठी टाइप की लड़ाई बार बार नए नए तरीके से छेड़कर. पर क्या अब ऐसे जांबाज मराठे नहीं जो अपनी पार्टियों को आइना दिखाएं या फिर नई पार्टी बनाकर वाकई महाराष्ट्र बचाने की मुहिम को आगे बढ़ाएं.

जैजै.

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नाशिक रेलवे स्टेशन पर एक अंधे लेकिन हस्ट-पुष्ट भिखारी को एक साहब टाइप सज्जन ने पैसे देने के बदले रोटी सब्ज़ी ऑफर किया तो उसने तुरंत मान लिया और उन्हीं के सामने लाठी बिछा धरती पर पालथी मार बैठ गया। उनने अपने बैग से खाना निकाला और सम्मान के साथ दे दिया। टांय टांय बोलने वाला अँधा भिखारी जब दो तीन कौर खा गया तो साहब बोले- ये सब्ज़ी आंवले की है, इससे डायबटीज़ की बीमारी नहीं होगी।

भिखारी खाना मुंह में कूँचते चबाते बोला- साहब, डायबटीज़ की बीमारी चोरों झुट्ठों को होती है। मुंझे काहें को होगी।

बेचारे साहब। उनका मुंह देखने लायक था। सामने मैं बैठा था। वे मुझे देखने लगे तो मैं ठठा के हंस पड़ा। वो बहुत झेंप गए। वो अँधा भिखारी भी देख रहा था साहब के चेहरे पर डायबटीज़ का उभर आना। खाना ख़त्म कर भिखारी ने मिनरल वाटर की बोतल झोले से निकाल गड़गड़ा कर पिया और लाठी ठोंकते टांय टांय बोलते-मांगते आगे बढ गया।

लर्निंग- भिखारी का पेट भरने के दौरान डायबटीज़ और डेमोक्रेसी बतियाएंगे तो लात खाएंगे ही 🙂

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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