संजय कुमार सिंह
दो जजों के मामले में सरकारी कार्रवाई में पक्षपात या जल्दबाजी की कपिल सिबल की शिकायत और उससे संबंधित कल व उससे पहले की खबरों के क्रम में आज हिन्दुस्तान टाइम्स में एक खबर है। इसके अनुसार मुख्य न्यायाधीश, भूषण आर गवई ने सरकार से कहा है कि कॉलेजियम के चुनाव पर कार्रवाई में भेदभाव न करे। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि नियुक्तियों और तबादलों पर कार्रवाी किस्तों में या चुनकर नहीं की जानी चाहिये। न्यायमूप्ति गवई ने यह संदेश 26 मई को पहली बार कॉलेजियम की बैठक की अध्यक्षता करने के बाद दिया था।
आज की दूसरी प्रमुख खबर, द टेलीग्राफ में है। खबर के अनुसार जम्मू और कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अमरनाथ यात्रा के दौरान हेलीकॉप्टर पर प्रतिबंध लगाने के दिल्ली (केंद्र सरकार) के प्रतिबंध से नाराज हैं। यह आश्चर्य की बात है कि हिन्दू और हिन्दू हित को प्रमुखता देने वाले अखबारों में आज इस खबर को टेलीग्राफ जैसी प्रमुखता नहीं मिली है और इससे लगता है कि मामला राजनीति और हिन्दू या हिन्दुत्व का कम मौजूदा व्यवस्था के समर्थन का ज्यादा है। मुझे भी लगता है कि जो हेलीकॉप्टर से जा सकते हैं उनके लिए इसका विकल्प होना ही चाहिये। जहां तक दुर्घटना की बात है, ऐसे मौकों पर मरने को जब मोक्ष मिलना कहा जा चुका है और किसी ने एतराज नहीं किया है तो इसे स्वीकार किया जाना चाहिये और आबादी के बड़े वर्ग के लिये यह सत्य भी लगता है। ऐसे में हेलीकॉप्टर सेवा बंद करना मोक्ष पाने का रास्ता बंद करना है। संभव है मैं गलत होऊं पर खबर को तो प्रमुखता मिलनी ही चाहिये और नहीं दी गई है तो रेखांकित करना मेरा काम है, मैंने खुद से चुना है। मुख्यमंत्री का कहना है कि इस प्रतिबंध से कश्मीर के बारे में लोगों में गलत संदेश जायेगा। अखबार ने लिखा है कि उमर अब्दुल्ला का यह विरोध केंद्र को खुली चुनौती का संकेत है।
आज के ज्यादातर अखबार ‘ट्रम्प को मोदी की दो टूक’और ‘न मध्यस्थता स्वीकारी थी, न स्वीकारेंगे’ जैसे जुमलों से लदे हैं। मजबूरी की इस देशभक्ति में अखबारों ने ये नहीं बताया है कि प्रधानमंत्री को ट्रम्प से यह सब कहने में इतना समय क्यों लगा (35 मिनट और कई दिन, 13 दावों के बाद) और जब यह कहा है कि, ‘न मध्यस्थता स्वीकारी थी, न स्वीकारेंगे’ तो युद्ध अचानक खत्म क्यों हो गया, उसी समय क्यों हुआ और यह भारत का निर्णय था तो उसका विवरण अभी तक सार्वजनिक क्यों नहीं है? कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब सरकारी दावा है या दावे पर आधारित है तथा सवाल पूछने का रिवाज अब है नहीं। वैसे तो पहले ऐसी घोषणाएं प्रेस कांफ्रेंस में होती थीं और पत्रकारों से कहा जाता था कि वे कुछ पूछना चाहें तो पूछ सकते हैं। पर अब ये सब नहीं होता है और खुद शपथग्रहण में नवाज शरीफ को निमंत्रण देकर उनकी मेजबानी स्वीकार करके यह दावा किया जा रहा है कि, ‘न मध्यस्थता स्वीकारी थी, न स्वीकारेंगे’। इस पूरे मामले में तथ्य यह भी है कि ट्रम्प ने फिर कहा है कि युद्ध मैंने रुकवाया है और आज यह खबर बहुत छोटी या नहीं के बराबर है। हालांकि, टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसी को अपनी लीड का शीर्षक बनाया है जो हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, मोदी के यह कहने के बाद कि मध्यस्थता स्वीकार नहीं है, ट्रम्प ने फिर कहा कि उन्होंने युद्ध रुकवाया।
मुद्दा यह है कि ट्रम्प के 13 दावों के बाद मोदी ने ट्रंप से फोन पर 35 मिनट तक बात की। फिर भी ट्रंप ने कहा है कि युद्ध उन्होंने ही रुकवाया है। सबको पता है कि ट्रंप ने ही सबसे पहले दुनिया को बताया था कि भारत और पाकिस्तान युद्ध विराम के लिए सहमत हो गए हैं। अब, जब तक मोदी ने ट्रंप को नहीं बताया, या ट्रंप ने वास्तव में युद्ध विराम की योजना नहीं बनाई, ट्रंप को इस बारे में पता कैसे चलता, वे ट्वीट कैसे कर पाते। जाहिर है, कोई एक झूठ बोल रहा है और जो संभावना है वह आप तय कीजिये। खबर और तथ्य अपनी जगह हैं ही।
द टेलीग्राफ ने इस खबर को पेश करते हुए फ्लैग शीर्षक में कहा है, प्रधानमंत्री ने अमेरिका से पहली बार कहा कोई मध्यस्थता नहीं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। मुख्य शीर्षक है – मोदी 1 ट्रम्प 13+1 – समझना बहुत आसान है। मोदी ने एक बार कहा, ट्रम्प 13 बार कह चुके थे, एक बार फिर कह दिया। भारत की अर्थव्यवस्था जापान से आगे निकल गई वाली भाषा और संदर्भ में कहा जा सकता है कि जो ट्रम्प ने 14 बार कहा उससे मोदी ने एक बार इनकार किया। द टेलीग्राफ ने आज अपनी इस लीड में यह भी बताया है कि अमेरिका या ट्रम्प ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख असिम मुनीर के साथ व्हाइट हाउस में दिन के भोजन से पहले चौदहवीं बार दोहराया कि भारत पाकिस्तान का युद्ध उन्होंने रुकवाया। टेलीग्राफ ने अपनी इस मूल खबर के साथ यह भी बताया है कि भारत और कनाडा ने दूतावास के लोगों के वापसी के साथ संबंधों को फिर से तय किया। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा भी है कि भारत और कनाडा ने अपने संबंधों को रीसेट करने की शुरुआत कर दी है।
आप जानते हैं कि कनाडा से भारत के संबंध कब, क्यों और कैसे खराब हुए थे और किस स्तर तक गये थे। उससे भारत के नागरिकों को जो नुकसान हुआ उसकी भरपाई तो नहीं ही हुई रिश्ते पहले जैसे होने की ओर हैं। इसे खराब नहीं किया जाता या उस समय कनाडा को बर्दाश्त कर लिया जाता तो जो परेशानी हुई वह नहीं होती और रिश्ते भी खराब नहीं होते। शायद अभी से बेहतर रहते। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रधानमंत्री अगर देश का संबंध किसी निर्वाचित नेता से अपने संबंधों के आधार पर बनायेंगे, बिगाड़ेंगे या रखेंगे तो ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ का भी देश को (या उन्हें भी) कोई लाभ नहीं हुआ है और यही कूटनीति है जो उन्हें न भी आती हो तो किसी योग्य की सलाह से बेहतर करने और रखने की अपेक्षा है।

इसके मुकाबले अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, ट्रम्प को मोदी की दो टूक… पाकिस्तान पर भारत को न मध्यस्थता स्वीकार थी, न है, न कभी करेंगे। यही नहीं, उपशीर्षक है, कहा – भारत की सख्त कार्रवाई के बाद घुटने टेकने पर मजबूर हुआ पाकिस्तान, व्यापार की इसमें कोई भूमिका नहीं है। नवोदय टाइम्स में यह खबर लीड नहीं है लेकिन पांच कालम के लीड के बराबर तीन कॉलम में छपी खबर का फ्लैग शीर्षक है, मोदी-ट्रम्प की टेलीफोन पर 35 मिनट वार्ता। मुख्य शीर्षक है, “न मध्यस्थता स्वीकारी थी, न स्वीकारेंगे : भारत”। दोनों अखबारों ने बताया है कि यह जानकारी उन्हें विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री ने दी है। फिर भी नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, ईरान कभी सरेंडर नहीं करेगा। यह खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर नहीं है और जो खबर पहले पन्ने पर है उसका शीर्षक (चार कॉलम) दूसरे अखबारों से अलग है, ट्रम्प को नोबेल पुरस्कार की वकालत पर मुनीर को भोज का न्योता। उपशीर्षक है, पाक सेना प्रमुख चाहते हैं, भारत से संघर्ष रोकने के लिए मिले सम्मान : व्हाइट हाउस। अमर उजाला ने एक खबर में यह भी कहा है कि अमेरिका पाकिस्तान को नियंत्रण में रखना चाह रहा है।
प्रधानमंत्री का प्रचार करने वाली अमर उजाला की इन खबरों के बीच आज एक खबर यह भी है कि ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई ने कहा है कि अमेरिका का दखल मंजूर नहीं है (देशबन्धु)। जाहिर है, अमेरिका (ट्रम्प) भारत-पाकिस्तान मामले में और ईरान-इजराइल मामले में भी दखल दे रहा है। इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि खामेनेई के यह कहने पर कि ईरान समर्पण नहीं करेगा, ट्रम्प ने उन्हें गुडलक कहा है। ठीक है कि भारत में भारत से संबंधित खबरों को प्राथमिकता दी जायेगी पर भारत में इजराइल की खबर को मणिपुर की खबर से ज्यादा महत्व दिया जाये तो बताना होगा कि भारत में विपक्ष ने सरकार से मांग की है कि ट्रम्प के साथ बातचीत पर मोदी सर्वदलीय बैठक बुलायें। पर मोदी सर्वदलीय बैठक बुलाना तो दूर उसमें जाते नहीं हैं। इसलिये बैठक बुलाने की खबर ‘संपादित’ हो गई है। हालांकि, दि एशियन एज में यह दो कॉलम की खबर है। वैसे, इस खबर का उपशीर्षक है, भाजपा का दावा, विपक्ष के झूठ की पोल खुली। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री का ट्रम्प से फोन पर बात करना कई सवालों के घेरे में है और आज विदेश सचिव के हवाले से यह खबर जरूर छपी है लेकिन इसके कई पहलू अनुत्तरित हैं। इन सवालों के जवाब न मांगे गये ना दिये गये हैं। फिर भी भाजपा का यह दावा है और छपा भी है। लेकिन कांग्रेस के दावे नहीं छपते हैं या कम छपते हैं या उन्हें प्रमुखता नहीं मिलती है इसमें कोई शक नहीं है। मैं उसी को रेखांकित करना चाहता हूं।
मैंने पहले भी कहा है कि हिन्दी के ( या ज्यादातर) अखबारों ने अहमदाबाद हादसे की खबर के बाद जमीन पर जो सब हुआ उसकी ठीक से रिपोर्टिंग नहीं की। डबल इंजन वाले अहमदाबाद प्रशासन ने इसपर कोई प्रेस कांफ्रेंस की, ऐसी खबर भी नहीं दिखी। पहलगाम की घटना को ऑपरेशन सिन्दूर से भावनात्मक बनाने और उसे पूरा प्रचार देने वालों ने विमान हादसे के भावुक पलों को वो महत्व नहीं दिया। संभव है इसका संकेत केंद्रीय गृहमंत्री के कथन, “ये एक्सीडेंट है.. ऐक्सीडेंट को कोई रोक नहीं सकता…” को माना गया हो पर भावुक खबरें तो कई तरह की हो सकती हैं और उनमें एक आज द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर है जो दूसरे अखबारों में भी हो सकती थी। इस खबर के अनुसार, विमान हादसे में जिन्दा बचने वाले एक मात्र यात्री के अस्पताल से रिहा होने पर दीव में मरने वालों को अश्रुपूर्ण विदाई दी गई और 40 साल के ब्रिटिश व्यवसायी विश्वास कुमार रमेश को अस्पताल से निकलकर भाई के अंतिम संस्कार में शामिल होना पड़ा।



