पाकिस्तान का रोल गॉडफादर के फ्रेडो कार्लियान जैसा है। वह अपनी अक्षमता को स्वीकार करने के बजाय अहंकार वश भाई के खिलाफ दुश्मन से जा मिला है। पाकिस्तान के सैन्य खलीफा तुर्की का लिटिल ब्रदर बनकर मगन है जबकि अपने असल बड़े भाई भारत को मिटाने की साजिश करते रहते हैं!

रंगनाथ सिंह-
टर्की एक ऐसी चिड़िया का नाम है जिसकी वजह से एक मुल्क को आइडेंटिटी क्राइसिस हो गयी। तुर्की देश की इतनी हैसियत नहीं है कि टर्की चिड़िया के नाम की स्पेलिंग बदलवा सके इसलिए उसने हारकर अपने नाम की स्पेलिंग बदल ली। वैसे टर्की केवल एक चिड़िया या एक देश का नहीं है बल्कि एक सोच का भी नाम है जिसकी विषाक्त जड़ें भारत में तक फैली हुई हैं।
दुनिया के बहुत से देश एक दूसरे को हथियार बेचते हैं मगर उन हथियारों के इस्तेमाल करने वालों के बीच सीधे-सीधे पार्टी नहीं बनते। खासकर तब जब आपका उस देश से कोई सीधा जमीनी विवाद न हो। मूल विषय पर आने से पहले यह भी कहना चाहूँगा कि तुर्की का ताजा विमर्श आम जनता द्वारा सोशलमीडिया के माध्यम से बनाए गए दबाव का परिणाम है। भारत सरकार ने तुर्की में राहत-बचाव कार्यों को “ऑपरेशन दोस्त” नाम दिया था। जब भारत पाकिस्तान के बीच सैन्य टकराव हुआ तो तुर्की ने हथियार और ड्रोन भेजने के साथ यह सन्देश जारी किया कि वह पाकिस्तान का दोस्त है! उसके बाद जो हुआ उसकी तुर्की ने उम्मीद नहीं की होगी। मगर मूल सवाल ये है कि तुर्की का अर्दोगान ऐसा क्यों कर रहा है?
तुर्की की इस जहालत के पीछे एक धर्मोन्मादी सनक है जिसकी जड़ें भारत तक भी पहुँचती हैं! उस सनक का नाम है- इस्लाम के संस्थापक पैगम्बर मोहम्मद का उत्तराधिकारी (खलीफा) बनने की सनक! सनक इसलिए कहा क्योंकि मुसलमानों के पहले चार खलीफा के बाद से इस खिताब का मतबल शांति के नोबेल पुरस्कार से ज्यादा नहीं रह गया है। पहले चार को सभी मुसलमान स्वीकार करते हैं। खलीफा का खिताब अपने मूल अर्थ से कितनी दूर हो चुका है इसे आप इससे समझिए कि इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी अबु बकर अल बगदादी तक ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया था!
मध्यकाल में मक्का-मदीना का इलाका जिसके कब्जे में हो वह खुद को खलीफा घोषित कर देता था। जब मक्का-मदीना पर तुर्की के उस्मान सल्तनत का नियंत्रण था तो वे खुद को खलीफा भी कहते थे। ये अलग बात है कि उसी दौर में भारत की मुगल सल्तनत और ईरान की सफावी सल्तनत वाले तुर्क के उस्मानों को अपना नेता नहीं मानते थे। उस दौर में मक्का-मदीना का हाल यह था कि शायद ही कोई मुगल बादशाह हज करने गया हो और तुर्की के सुल्तान तो कभी हज करने गये ही नहीं। आजकल इस असुविधाजनक फैक्ट से असहज होने वाले कट्टरपंथी सुगरकोटिंग करते हुए कहते हैं कि पीछे राजपाट न छिन जाए इसलिए ये लोग हज करने नहीं जाते थे मगर इतिहास पढ़ने से पता चलता है कि ताकतवर सुल्तान अपनी सुविधा से धार्मिक नियमों को मानते या ठुकराते हैं।
जन-आक्रोश देखकर भारत में तुर्की के खिलाफ कुछ कड़े कदम उठाए गए हैं मगर एक सोच के रूप में तुर्की भारत के अन्दर इतना गहरा धंसा हुआ है कि आज लग जाएँ तो भी इसकी जड़ें पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं है। बेहद अफसोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि तुर्की को आधुनिक भारत में जड़ जमाने का मौका देने का अशुभ कार्य महात्मा गांधी ने किया। महात्मा गांधी जैसा महान आदमी भी 20वीं सदी में एक विशुद्ध कट्टरपंथी मुहिम को सपोर्ट करने का निहितार्थ नहीं समझ सके। मेरा मानना है कि भारत विभाजन की आधारशिला औरंगजेब कमजर्फ ने रखी थी मगर आधुनिक काल में इसे फास्ट फारवर्ड मोड में डालने का काम “खिलाफत आन्दोलन” ने किया जिसकी परिणति भारत विभाजन के रूप में हुई।
भारत का विभाजन भले ही ब्रिटेन-अमेरिका की योजना से हुआ हो मगर उनके लिए सबसे आसान यूजफुल इडियट की फौज खड़ी करने का पाप खिलाफत आन्दोलन ने किया जिसे समर्थन देना महात्मा गांधी की ऐतिहासिक भूल थी।
पाकिस्तान के कई लिबरल विद्वान कहते हैं कि तुर्की के खलीफा के लिए चलाए गए खिलाफत आन्दोलन से पहले जिन्ना लिबरल थे। जिन्ना ने जब देखा कि गांधी जी धुर कट्टरपंथी एजेंडे पर जाकर मुसलमानों के नेता बनना चाहते हैं तो उनकी आँखें खुल गयीं। उन्होंने सोचा होगा कि वे गांधी जी के बेहतर मुसलमान के लीडर बन सकते हैं। धर्मोन्मादी खिलाफत आन्दोलन का एक बर्बर दुष्परिणाम मोपलां नरसंहार के रूप में भी सामने आया। मोपलां नरसंहार को अंजाम देने वालों ने हजारों हिन्दुओं को कत्ल करने और जबरन कनवर्ट कराने के बाद चिन्दी भर इलाके मोपलां में “खलीफा का शासन” घोषित कर दिया था! खिलाफत और मोपलां नरसंहार का दूरगामी भारत के एक अन्य ऐतिहासिक व्यक्ति पर पड़ा जिसका असर आज तक बरकरार है। वह व्यक्ति हैं वीर सावरकर।
वीर सावरकर जब 1910 में जेल गये थे तब वे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के लेखक और क्रान्तिकारी के रूप में कालापानी भेजे गये थे मगर जेल के घनघोर कम्युनल अनुभवों ने उनकी सेकुलर सोच को बदल दिया। उसके बाद इस्लामी खिलाफत और मोपलाँ नरसंहार जैसे घटनाओं ने उनके अन्दर उन विचारों को पुख्ता कर दिया जिसे अब हम राजनीतिक “हिन्दुत्व” के रूप में जानते हैं। यह महज संयोग नहीं है कि “हिन्दुत्व क्या है” लिखने से ठीक पहले सावरकर ने मोपलाँ पर किताब लिखी थी। जिन्ना और वीर सावरकर दो बड़े उदाहरण भर हैं। सारांश ये है कि तुर्की के बर्बाद हो चुके खलीफा के लिए मोहब्बत का आधुनिक भारत के इतिहास पर गहरा असर पड़ा।
प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की सेना ब्रिटेन से हार गयी और उसके बाद आज तक तुर्की के एक वर्ग के अन्दर खलीफा बनने की हसरत मिटने का नाम नहीं ले रही है। इसे ही कहते हैं कि रस्सी जल गयी मगर बल नहीं गया। अर्दोगान इस मुहावरे के ज्वलंत उदाहरण के रूप में रोज बड़बोलापन दिखाते हैं मगर जमीनी हकीकत ये है कि इजराइल अकेले दम पर तुर्की को धूल चटा सकता है।
इस जियोपोलिटिकल ड्रामे में पाकिस्तान का रोल गॉडफादर के फ्रेडो कार्लियान जैसा है। वह अपनी अक्षमता को स्वीकार करने के बजाय अहंकार वश भाई के खिलाफ दुश्मन से जा मिला है। पाकिस्तान के सैन्य खलीफा तुर्की का लिटिल ब्रदर बनकर मगन है जबकि अपने असल बड़े भाई भारत को मिटाने की साजिश करते रहते हैं!
पाकिस्तान खिलाफत के नशे में यह भूल चुका है कि तुर्कों के लिए पाकिस्तान एक हारी हुई कौम है जिसे उनके बाप-दादा ने हराकर उन पर शासन किया था। पाकिस्तान यह भी भूल चुका है कि दुनिया में उसके जन्म से पहले चार दर्जन इस्लामी मुल्क थे और उसने पैदा होकर इस्लामी जगत पर कोई अहसान नहीं किया। पाकिस्तान अपनी हीनता ग्रन्थि से लड़ने के लिए चाहे जितना डीएनए टेस्ट करा ले, दुनिया उन्हें अरब या तुर्क या मंगोल नहीं मानने वाली। उनका डीएनए हिन्दुस्तानी ही है, वही रहेगा। चाहे वो जितना खून बहा लें, चाहे जितने अर्दगानों के तलवे चाट लें। यह सत्य अटल है, अटल रहेगा। रही भारत की बात तो यह वक्त बताएगा कि टर्की किस चिड़िया का नाम है।


