चंडीगढ़। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उस जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से इनकार कर दिया है, जिसमें केंद्र सरकार और नियामक प्राधिकरणों को टीवी चैनलों पर प्रसारित कथित तौर पर सांप्रदायिक रंग देने वाली बहसों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
अदालती कवरेज करने वाली वेबसाइट लाइव लॉ के अनुसार, चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता राज कुमार से साफ कहा कि चूंकि यह मुद्दा पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए हाईकोर्ट इस पर सुनवाई नहीं करेगा। अदालत ने याद दिलाया कि उसने हाल ही में एक समान याचिका को भी इसी आधार पर खारिज कर दिया था।
खंडपीठ ने कहा, “जब सुप्रीम कोर्ट में अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में यही मुद्दा लंबित है और सभी राज्यों को नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं, तो इस अदालत के पास इस पर विचार का कोई औचित्य नहीं बनता। हम यहां भी वही आदेश देंगे।”
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में सभी राज्यों को निर्देश दिया था कि जहां भी भाषण या कार्रवाई भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153ए, 153बी, 295ए और 506 जैसे अपराधों के दायरे में आती हो, वहां बिना शिकायत दर्ज हुए भी पुलिस स्वतः संज्ञान लेकर केस दर्ज करे और दोषियों पर कार्रवाई करे।
राज कुमार की ओर से दाखिल याचिका में भारत संघ और समाचार प्रसारण एवं डिजिटल मानक प्राधिकरण (NBDSA) से अनुरोध किया गया था कि वे चैनलों पर सांप्रदायिक दरार फैलाने वाली बहसों पर रोक लगाएं और सुप्रीम कोर्ट की बार-बार की गई टिप्पणियों के बावजूद कार्रवाई न करने पर स्पष्टीकरण दें।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि सांप्रदायिक रंग वाली सामग्री न सिर्फ देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को नुकसान पहुंचाती है बल्कि सामाजिक सद्भाव पर भी चोट करती है। उन्होंने मांग की थी कि यदि जरूरी हो तो सरकार आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए ऐसे प्रसारण रोके और दोषी चैनलों व एंकरों के खिलाफ सख्त कदम उठाए।



