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“ठाकुर-पंडित जीते” वाली हेडलाइन पर चित्रा त्रिपाठी की खूब हो रही लानत-मलानत!

कंचना यादव-

हेलो चित्रा त्रिपाठी जी, लगता है आप आज कुछ ज़्यादा ही उलझन में हैं। ऐसे में हिंदू एकता बेचारे किस कोने में जाकर बैठे?

अभी तक तो हमें समझाया जा रहा था कि हिंदू एकता ही सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन आपने तो अचानक जाति-पात की खिड़की खोल दी। अब ज़रा स्पष्ट कीजिए..जब आप UGC को बहुजनों की हार बता रही हैं, तो हिंदू एकता मज़बूत होगी या सिर्फ़ भाषणों तक सीमित रहेगी?

या फिर हिंदू एकता वही है जो स्क्रीन पर अच्छी लगती है, और ज़मीन पर आते ही असहज हो जाती है?



संदीप सिंह-

चित्रा त्रिपाठी की शकल देखो और अंदाजा लगाओ इनका पिछड़ों से नफरत का…

पप्पू यादव ने बस इतना कहा कि जब EWS में सवर्ण समाज को आरक्षण मिला तब क्या दलित पिछड़े आदिवासी समाज ने उसका विरोध किया? और तब चित्रा त्रिपाठी की पत्रकारिता को सरकार के फैसले में जातिवाद नहीं दिखा…

पप्पू यादव ने आखिरी में कह दिया कि आप पैसा लेकर पत्रकारिता करती हैं चित्रा जी….


ठाकुर-पंडित जीते और बहुजन हारे” ये बोलकर चित्रा त्रिपाठी हिंदू एकता को मजबूत करती हुई! -प्रियंका भारती


जैकी यादव-

ये शीर्षक पढ़िए और सोचिए यह क्या मानसिकता होगी। एक National News Channel के पोस्टर पर यह शब्द लिखना कितनी बड़ी बात है। निःसंदेह चित्रा त्रिपाठी जी अपनी जाति संबंधित मामलों में बढ़ चढकर हिस्सा लेती हैं, मगर फिर भी चित्रा त्रिपाठी जी को कुछ तो अपने पद और अपने प्रोफेशन का मान सम्मान रखना चाहिए।


सायमा-

“इस घिनौने, विभाजनकारी, जातिवादी और कट्टर सोच से भरे पोस्टर को देखिए। यही इस देश के असली नफरत फैलाने वाले लोग हैं, जो देश को शांति, प्रेम और सद्भाव की ओर ले जाने के बजाय हमेशा ‘महादंगल’ की स्थिति में बनाए रखना चाहते हैं। अब ये लोग अपनी कुरूपता छिपाते भी नहीं हैं।”

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