विकास मिश्रा-
बात 2007 की है। मैं उस समय आजतक न्यूज चैनल में था। इलाहाबाद से एक प्रियजन का फोन आया। इलाहाबाद में मैं साल भर से ज्यादा उसके घर में रहा था और पूरे परिवार से अभी भी बहुत मधुर और प्रगाढ़ रिश्ता है। जिसका फोन आया था वह वकील बन गया था। बोला-भइया मेरे एक क्लाइंट हैं, उनको झांसी की पुलिस ने हाईकोर्ट के सामने से उठा लिया है। वे सरेंडर करने जा रहे थे, लेकिन पुलिस वाले सादी वर्दी में वहां पहले से ही ताक में थे। इससे पहले वे गेट के अंदर जाते, पुलिस वालों ने उठा लिया और लेकर निकल लिए। डर है कि कहीं एनकाउंटर न कर दें।
मामला मैं समझ गया था। उसका मारा जाना तय था। मैंने पूछा- चाहते क्या हो..? उसने कहा कि भइया किसी तरह बचवा लीजिए। मैंने फिर पूछा-बलात्कारी या किडनैपर तो नहीं है..? उसने कहा- नहीं भइया एक मर्डर का चार्ज है, दो अटेंप्ट टू मर्डर का। एक बात साफ थी कि वह था तो बदमाश ही। मन किया कि चलो जो हो रहा है वो होने दो, लेकिन दूसरी तरफ उसकी मनुहार थी, पता नहीं क्यों सोचा कि चलो कुछ कोशिश करके देखता हूं।
पता चला कि झांसी में उस समय जो एसएसपी थे वो जाने माने एनकाउंटर स्पेशलिस्ट थे। यानी एनकाउंटर पक्का था। मैंने उस समय के आईबीएन-7 के इलाहाबाद संवाददाता आनंद श्रीवास्तव को फोन किया। आनंद से पुराना रिश्ता था, विश्वसनीय थे, दिलेर थे, दबंग थे और मुझे सम्मान भी बहुत देते थे। मैंने आनंद से बात की और बाकायदा एक स्क्रिप्ट भी बताई। समझाया कि एसएसपी से बात क्या करनी है। चूंकि एनकाउंटर अक्सर रात के अंधेरे में होता है इसलिए आनंद ने एसएसपी को रात 10 बजे के आसपास फोन किया। जो बात हुई उसका मजमून कुछ इस तरह है-
आनंद- सर नमस्कार, मैं आईबीएन-7 इलाहाबाद से आनंद श्रीवास्तव बोल रहा हूं.. आप कैसे हैं।
एसएसपी- जी मैं ठीक हूं, बताइए कैसे याद किया..?
आनंद- सर जानना ये है कि आपकी पुलिस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने से फलां (नाम लेकर) को जो उठाया है, सर उसे मारेंगे कहां, इलाहाबाद की सीमा में या झांसी की सीमा में..?
इस सवाल से कप्तान साहब हिल गए। कहने लगे कि नहीं ऐसा कुछ नहीं है, उन्हें कुछ पता नहीं है। उनकी जानकारी में झांसी से पुलिस की कोई टीम इलाहाबाद नहीं गई है।
आनंद ने कहा- सर बता दीजिए, नहीं तो मेरी क्लास लग जाएगी। अगर इलाहाबाद में मारा गया और मुझसे पहले किसी और चैनल के संवाददाता को खबर बता चल गई तो नौकरी पर बन आएगी।
एसएसपी ने बार-बार कहा कि कुछ ऐसा नहीं है। आनंद ने फिर यह बातचीत मुझे बताई। मैंने कहा कि अब कुछ भी हो, एनकाउंटर नहीं हो पाएगा। हुआ यही। एसएसपी को पता चल गया कि मीडिया में खबर लीक हो गई है, तो एनकाउंटर का फैसला वापस लेना पड़ा। अगले दिन झांसी पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर दिया और फिलहाल उस दिन उसकी जान बच गई।
एनकाउंटर पुलिस का एक ऐसा हथियार है, जो पहले कभी-कभी इस्तेमाल होता था, अब तो बहुत आम हो चुका है। जब प्रिंट मीडिया का दबदबा था और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सिर उठा रहा था, सोशल मीडिया आया नहीं था, मोबाइल पर वीडियो बनते नहीं थे, तब पुलिस और क्राइम रिपोर्टर्स का बहुत ही दोस्ताना रिश्ता हुआ करता था। 2001 में मैं दैनिक जागरण मेरठ आया था। पहले सिटी डेस्क पर था, फिर सिटी इंचार्ज बना। हमारे क्राइम रिपोर्टर अक्सर रात 9 बजे के आसपास मुस्कुराते हुए आते थे और धीरे से बताते थे कि आज कुछ खेल होने वाला है। बिजनौर एडिशन के आसपास हो जाएगा।
लैंडलाइन पर उनकी पुलिस वालों से देर रात बात भी होती थी। बात का मजमून इस तरह होता था- अरे साढ़े दस बजे तक निपटा दीजिए, बिजनौर एडिशन हमारा जल्दी छूटता है। अमर उजाला ने अगर एडिशन लेट करके खबर ले ली तो फजीहत हो जाएगी। इस तरह मोलभाव होता था कि पुलिस कब एनकाउंटर करेगी। रात साढ़े दस बजे से लेकर देर रात 2 बजे तक एनकाउंटर होता था, क्राइम रिपोर्टर को अमूमन खबर पता रहती थी। कई बार तो एसएसपी खुद शाम को ही क्राइम रिपोर्टर्स को बता देते थे कि आज एक एनकाउंटर होने वाला है। हमारे एक साथी क्राइम रिपोर्टर जो अब एक अखबार के संपादक हैं, वे तो एनकाउंटर की पूरी खबर लिखकर बैठे रहते थे। पुलिस जब कन्फर्म करती थी, तो खबर रिलीज कर देते थे।
कई बार इस मामले में गड़बड़ भी हो जाती थी। लखनऊ के एक तेज तर्रार क्राइम रिपोर्टर थे, बड़े अखबार के सिपहसालार थे। पुलिस वालों ने उन्हें कन्फर्म कर दिया कि देर रात फलां अपराधी का एनकाउंटर हो जाएगा, आप निश्चिंत रहिए। रिपोर्टर ने रात 1 बजे रिपोर्ट फाइल कर दी और घर चले गए। अखबार में छपा कि पुलिस से मुठभेड़ में दुर्दांत अपराथी मारा गया। हकीकत यह थी कि आखिरी समय में मुठभेड़ से पुलिस ने कदम पीछे खींच लिए थे। अपराधी बच गया था और अगली सुबह से कई दिनों तक अखबार की छिछालेदर हो गई थी।
बतौर पत्रकार मैं कभी एनकाउंटर जैसे स्टंट का समर्थन नहीं कर सकता, लेकिन कई बार जनता तक संदेश देने के लिए, अपराधियों के भीतर दहशत भरने के लिए यह जरूरी भी होता है। आजकल यूपी से लेकर बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, मध्य प्रदेश समेत दूसरे राज्यों में भी पुलिस सीना ठोंककर मुठभेड़ में अपराधियों को मार रही है। पहले बहुत कुछ चोरी छिपे था, लेकिन अब तो दिनदहाड़े और डंके की चोट पर है।
पुलिस टीम पर हमला करने वाले और कई पुलिसकर्मियों की मौत की वजह बने दुर्दांत अपराधी विकास दुबे को तो पुलिस ने ढेर कर दिया था और कहानी भी ऐसी बनाई, जिसे सुनकर हंसी छूट जाए। गाड़ी पलटने वाली कहानी। तब से मुहावरा भी बन गया कि न जाने कब यूपी पुलिस की गाड़ी पलट जाए।
मुठभेड़ में पुलिस की कहानी आम तौर पर वही होती है कि अपराधी को पुलिस ले जा रही होती है। रास्ते में अपराधी ने दरोगा की पिस्टल छीन ली होती है। अपराधी पुलिस पर गोली चलाता है। आत्मरक्षा में पुलिस गोली चलाती है और अपराधी मारा जाता है। कई बार कहानी यह होती है कि लूट या हत्या के इरादे से बदमाश जा रहे थे, पुलिस ने ललकारा तो बदमाशों ने गोली चला दी, पुलिस ने आत्मरक्षा में जवाबी फायरिंग की तो बदमाश मारे गए। मैंने मुठभेड़ की ऐसी तमाम खबरों को पूरा सच जानते हुए एडिट किया है, प्रकाशित भी किया है। यह तय था कि एनकाउंटर में मारा गया हर बदमाश अपराधी था, किसी पर हत्या, किसी पर बलात्कार, किसी पर अपहरण तो किसी पर ये सारे केस चल रहे थे। मन पर बोझ नहीं था, एक तरह से एनकाउंटर को समर्थन भी था।
यूपी में तो मुठभेड़ में बड़े अपराधियों का खात्मा और छोटा अपराध करने वालों के पैर में गोली मारने का चलन सा हो गया है। आने वाले सालों में गांव-कस्बा-शहर में जो आदमी लंगड़ाता हुआ चलेगा, उसकी ये हालत उसकी करतूतों की गवाही देंगी।
अभी हाल में ही ईद पर दोस्त को बुलाकर चाकू मारकर उसकी हत्या करने वाले असद को यूपी पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया है। पुलिस ने उसका जेल में रहने का झंझट हटा दिया, सीधे ऊपर भेज दिया।
दरअसल किसी भी अपराधी को अदालत के जरिए सजा दिलवाने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इंसाफ की राह देखते देखते पीड़ित परिवार की आंखें पथरा जाती हैं। बलात्कारी जमानत पर छूटता है और फूलों का हार पहनता है, उसका स्वागत जुलूस निकलता है। ऐसे में पुलिस का त्वरित न्याय- न एफआईआर, न केस, न कोर्ट-कचहरी, फैसला ऑन द स्पॉट वाला इंसाफ लोगों को सुकून देता है।



