यह एकाएक, विचलित करने वाला समाचार है। आलोचक वीरेंद्र यादव जी भी कुछ देर पहले, हम सब से सदा के लिए, बिछुड़ चुके हैं। ऐसी ख़बर जो विश्वसनीय नहीं लगती। भाई नागेंद्र जी अस्पताल ले गए थे मगर हार्ट अटैक से उन्हें बचाया नहीं जा सका है। – सुभाष चंद्र कुशवाहा
राजीव तिवारी बाबा-
हिंदी साहित्य के आकाश से एक तेजस्वी तारा टूट गया है। वरिष्ठ आलोचक वीरेंद्र यादव अब हमारे बीच नहीं हैं। उनकी यादें आज भी जीवंत हैं—वे यादें जो किताबों के पन्नों से निकलकर कॉफी हाउस की गलियों, साहित्यिक सभाओं और युवा आलोचकों के मन में बस गई थीं।
मुझे याद है पहली बार उनकी किताब ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ हाथ लगी थी। वह किताब सिर्फ आलोचना नहीं थी, बल्कि एक विद्रोह थी। फणीश्वर नाथ ‘रेणु’ के “मैला आँचल” को वे बिना लाग-लपेट के कहते थे—”यह ग्रामीण भारत की सच्चाई है, लेकिन इसमें भी वर्चस्व की परतें छिपी हैं।” वे दलित-स्त्री-वंचित की आवाज़ को केंद्र में रखकर हिंदी उपन्यासों की परंपरागत व्याख्या को चुनौती देते थे। एक बैठक में उन्होंने कहा था, “साहित्य अगर वर्चस्व की सेवा करता है, तो वह साहित्य नहीं, प्रचार है।” उनकी यह बात मेरे कानों में आज भी गूंजती है।
एक बार प्रयागराज में उत्तर प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की बैठक में वे आए। कमरे में धुआं और चाय की खुशबू थी। वीरेंद्र जी चुपचाप बैठे सुन रहे थे। जब कोई युवा आलोचक नवें दशक के उपन्यासों पर बोल रहा था, तो उन्होंने बीच में टोका—”बेटा, प्रगतिशीलता का मतलब सिर्फ गरीबी दिखाना नहीं, उस गरीबी के पीछे की सत्ता की संरचना को समझना है।” फिर उन्होंने अपनी सिगरेट सुलगाई और धीरे से कहा, “मैंने ‘आधा गाँव’ पढ़ा तो लगा, राही मासूम रजा ने सिर्फ कहानी नहीं, एक समाज का पोस्टमार्टम किया है। लेकिन हम आलोचक उस पोस्ट मार्टम रिपोर्ट को भी सुंदर बनाने लगे हैं।” सब हंस पड़े, लेकिन हंसी के पीछे गहरा दर्द था।
उनकी लेखनी में मार्क्सवाद था, लेकिन वह सूखा नहीं था। वे जीवन के रस को कभी नहीं छोड़ते थे। प्रयोजन पत्रिका के संपादन में वे घंटों बैठकर युवा लेखकों के लेख पढ़ते, लाल पेन से काटते-जोड़ते, लेकिन कभी अपमान नहीं करते। एक बार किसी युवा ने उनसे पूछा—”सर, आप इतनी कठोर आलोचना क्यों करते हैं?” उन्होंने मुस्कुराकर कहा—”कठोर इसलिए, क्योंकि साहित्य प्रेम का विषय है, और प्रेम में सच्चाई की कठोरता होनी चाहिए।”
पारिवारिक जीवन में वे बेहद सादगीपूर्ण थे। घर में किताबों के ढेर, चाय का प्याला और परिवार की छोटी-छोटी खुशियाँ। वे कहते थे—”साहित्य समाज के लिए है, लेकिन परिवार के बिना साहित्य अधूरा है।” उनकी पत्नी और बच्चे उनकी सबसे बड़ी ताकत थे। निधन की खबर सुनकर एक झटका सा लगा, जैसे कोई कोई अपना चला गया हो, जो हमेशा विचारों की लड़ाई में साथ खड़ा रहता था।
वीरेंद्र यादव की यादें अब सिर्फ किताबों में नहीं, बल्कि उन अनगिनत बहसों में, उन रातों में और उन चाय की चुस्कियों में जीवित रहेंगी, जब हम साहित्य को समाज बदलने का हथियार मानकर जुटे रहते थे। उनकी कमी खलेगी, लेकिन उनकी प्रेरणा कभी नहीं मिटेगी। उनकी आत्मा को शांति मिले। ओम शांति…….




अनुभव सिन्हा
January 17, 2026 at 9:45 am
ye vampanthi to the hi, sahityakar aur aalochak भी the….sharmnaak !