
संजय कुमार सिंह
देश की मुख्य धारा का मीडिया चुनाव या वोट की चोरी पर राहुल गांधी के आरोपों और कल की प्रेस कांफ्रेंस की चर्चा करने से बचता रहा है। राहुल गांधी के आरोप जबरदस्त हैं तो मुकाबले के लिए आज प्रधानमंत्री का किसान प्रेम भी पूरी गंभीरता से दिखाया गया है। किसान आंदोलन के समय किसानों के प्रति सरकार और सरकारी पार्टी का रुख और बाद में दिवंगत सत्यपाल मलिक से प्रधानमंत्री ने जो कहा था, उसे तो लोग भूल ही गये होंगे। राहुल गांधी की कल की प्रेस कांफ्रेंस को देखने और उसकी चर्चा सुनने के बाद मेरी उत्सुकता थी कि आज अखबार वाले क्या करेंगे। आइये, बताता हूं इतनी महत्वपूर्ण प्रेस कांफ्रेंस और खुलासे को अखबारों ने कितना महत्व दिया है। अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स में टॉप पर दो कॉलम में है। इसका शीर्षक है, “भाजपा ने आयोग से मिलीभगत कर चुनाव में की धोखाधड़ी : राहुल”। इसमें चुनाव आयोग को सिर्फ आयोग लिखा गया है। भले ही यह स्थान की कमी के कारण हो पर चुनाव आयोग बदनाम होने से बच गया। वैसे भी मामला इतना भर नहीं है कि भाजपा ने चुनाव आयोग से मिलीभगत करके धोखाधड़ी की है। मामला यह भी है कि देश में चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार संवैधानिक संस्था जिसे चुनाव आयोग कहा जाता है, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सेवा में लगी है और इसके लिए कुछ ही महीने पहले नियम विरुध जाकर मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की गई है। इसके खिलाफ शिकायत सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। स्पष्ट रूप से मामला सत्तारूढ़ पार्टी या उसके मुखिया द्वारा एक संवैधानिक संस्था पर नियंत्रण करके अनैतिक और अनुचित रूप से चुनाव जीतने का आरोप है और बेहद गंभीर है। आप सरकार के लाख समर्थक हों, यह जानते हुए कि वह बहुमत में नहीं है या उसका बहुमत खरीदा हुआ या जबरदस्ती का है कैसे उसके समर्थक बने रहे सकते हैं। पर वह अलग मुद्दा है।
यह दिलचस्प है कि आज जब चुनाव आयोग पर राहुल गांधी के खुलासे की चर्चा है तब अमर उजाला ने राहुल गांधी वाली खबर तो पहले पन्ने पर नहीं छापी है लेकिन पहले पन्ने के बॉटम का शीर्षक है, ईडी को सुप्रीम कोर्ट की नसीहत….बदमाशों की तरह काम नहीं कर सकते, कानून के दायरे में रहना होगा। आप जानते हैं ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय केंद्र सरकार के अधीन काम करने वाला एक विभाग है और आरोप लगते रहे हैं कि यह केंद्र सरकार के निर्देश पर सत्तारूढ़ दल के विरोधियों को निपटाने, परेशान करने के लिए काम करता है। ऐसे में ईडी को सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश केंद्र सरकार के लिए भी है। आम तौर पर सरकार का समर्थन करने वाली खबरें छापने वाले अखबार ने चुनाव आयोग से संबंधित राहुल गांधी के खुलासे को नहीं छाप कर ईडी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश को महत्व दिया है तो यह खबर सरकार के खिलाफ ही है। चुनाव आयोग तो फिर भी एक स्वायत्त, संवैधानिक संस्था है। भले उसके मुखिया की नियुक्ति प्रधानमंत्री ने की है और अपने पसंदीदा को इस पद पर बैठा दिया हो। यह दिलचस्प है कि हिन्दी के एक और अखबार, देशबन्धु ने राहुल गांधी के खुलासे को सात कॉलम में छापा है जबकि दैनिक भास्कर ने भी इसे लीड बनाया है और पांच कॉलम में छापा है। हिन्दी अखबारों में उत्तर प्रदेश के दैनिक जागरण और अमर उजाला इस मामले में बिल्कुल एक से हैं। दैनिक जागरण में भी यह खबर पहल पन्ने पर नहीं है।
प्रचारकों की लीड किसानों की खबर ही है। और यह अंग्रेजी में भी है। टाइम्स ऑफ इंडिया में राहुल गांधी की खबर है लेकिन लीड किसानों की खबर ही है। इंडियन एक्सप्रेस भी वैसा ही है। लीड किसानों की खबर है पर राहुल गांधी वाली खबर भी है। हिन्दुस्तान टाइम्स, दि एशियन एज का भी यही हाल है। द हिन्दू ने राहुल गांधी के खुलासे को पांच कॉलम में लीड बनाया है। किसानों की यानी मोदी जी की घोषणा और प्रण की खबर यहां दो कॉलम में है। द टेलीग्राफ ने किसानों वाली खबर के साथ की राजनीति को शीर्षक में ही समझा दिया है। रही सही कसर सिंगल कॉलम की एक और खबर से बता दी है। लीड का फ्लैग शीर्षक है, आंदोलनजीवी के ‘कलंक’ से किसानों के संरक्षक। मुख्य शीर्षक है, टैरिफ ने वह कर दिखाया जो आंदोलन से नहीं हुआ। इसके साथ सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है – तेल, गुस्सा एक तरफ, ट्रम्प पुतिन से मिलेंगे। फ्लैग शीर्षक के तहत दो खबरें हैं और इनमें प्रमुख है किसानों वाली खबर। नई दिल्ली डेटलाइन से जेपी यादव की यह खबर इस प्रकार है, डोनाल्ड ट्रम्प के मुश्किल टैरिफ के दबाव में, लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को किसानों से अपने प्रेम की याद फिर हो आई है। उन्होंने कहा है, किसानों के हितों की रक्षा के लिए वे भारी कीमत निजी तौर पर चुकाने के लिए तैयार हैं। इससे आप समझ सकते हैं कि आज इस खबर को इतना महत्व क्यों मिला है। वैसे भी, आज नवोदय टाइम्स में एक खबर है, भारत के समर्थन में खुलकर आया चीन। एक खबर पहले थी, प्रधानमंत्री चीन के दौरे पर जा रहे हैं। वैसे तो प्रधानमंत्री इस महीने के अंत में एससीओ सम्मेलन में हिस्सा लेने चीन जाएंगे और यह गलवां घाटी संघर्ष के बाद पहला दौरा होगा। इससे पहले वे 2019 में चीन गये थे। मुझे लगता है कि विदेश नीति के मामले में प्रधानमंत्री वैसे ही काम कर रहे हैं जैसे बचपन में हम साथियों से कुट्टी हो जाया करते थे।
अखबार ने यह भी बताया है कि ट्रम्प आने वाले समय में पुतिन से मिलने वाले हैं। तेल, गुस्सा सब भूलकर। द टेलीग्राफ में आज एक और महत्वपूर्ण खबर है। भले यह 5 अगस्त को जारी आदेश से जुड़ी है इसलिए पुरानी हो पर मेरे अखबारों में पहले पन्ने पर आज पहली बार है। खबर के अनुसार जम्मू कश्मीर में 25 किताबों पर प्रतिबंध के बाद अब पुलिस के छापे का डर है और यह आतंकियों की तलाश में नहीं किताबों की तलाश में भी हो सकती है। सरकार ने कथित रूप से अलगाववादी सोच को बढ़ावा देने वाली किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया है अब छापा मारकर किताबें जब्त की जा रही है। 5 अगस्त 2019 को कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की उपलब्धियों का दावा करने वाली सरकार राज्य में पांच साल से ज्यादा चुनाव नहीं करवा सकी और अब किताबों पर प्रतिबंध और किताबें जब्त करने के लिए छापे मरवा रही है। यह राजनीति हो या शासन, खबर तो है ही और निश्चित रूप से पहले पन्ने की खबर है। एक साथ पहले कभी 25 किताबों पर प्रतिबंध शायद ही पहले कभी लगा हो और अगर लगा भी हो तो छपने, बाजार में पहुंचने और बिकने के बाद लगा होगा। प्रतिबंधित किताबों को ढूंढ़ने और जब्त करने के लिए छापे की कार्रवाई शायद ही पहले कभी हुई हो। इसलिये खबर तो निश्चित रूप से प्रमुखता मांगती है लेकिन मुझे आज सिर्फ द टेलीग्राफ में मिली।
नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार पुलिस ने श्रीनगर की दुकानों से जो किताबें जब्त कीं हैं, उनमें अनुराधा भसीन की किताब की पांच प्रतियां शामिल हैं। इसके अलावा, एजी नूरानी की दो और सुमंत्र बोस की किताब की एक प्रति भी जब्त की गई है। पुलिस ने बताया कि यह कार्रवाई उन प्रकाशनों पर की जा रही है जो अलगाववादी विचारधारा को बढ़ावा देते हैं। पुलिस के अनुसार, कुछ किताबें आतंकवाद का महिमामंडन करती हैं या गलत ऐतिहासिक जानकारी फैलाती हैं। बता दें कि गृह विभाग ने मंगलवार को एक आदेश जारी किया था। इस आदेश में कहा गया था कि प्रतिबंधित किताबों की सभी प्रतियां जब्त की जाएंगी। चाहे वे लोगों के पास हों या संगठनों के पास। विभाग का कहना है कि ये किताबें राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता के लिए खतरा हैं। यह विभाग लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा के अधीन है। आजकल किताबें अधिकृत और अनअधिकृत तर पर कंप्यूटर या फोन पर भी पढ़ी जा सकती है। पता नहीं इसके लिए कंप्यूटर और फोन जब्त होंगे या उन्हें कंप्यूटर पर पढ़ा ही नहीं जा सके उसका कोई इंतजाम कर दिया गया है।


