मीडिया ना तो जनरल एमएम नरवणे का इंटरव्यू कर रहा है और ना ही एप्सटीन फाइल पर कुछ लिख-बोल या पढ़ रहा है। पीयूष गोयल के पक्ष में विश्लेषक, पर्यवेक्षक और सूत्र सब मैदान में हैं।
संजय कुमार सिंह
मैंने कल यहां बताया था, लगता है भारत-अमेरिका व्यापार सौदे की खबरें दूसरी खबरों से ध्यान हटाने के लिए ही हैं। आज केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के हवाले से खबर है, अमेरिका के साथ व्यापार करार किसानों को ‘तकलीफ’ नहीं देगा। दि एशियन एज में छपी इस खबर का उपशीर्षक है, कांग्रेस की आलोचना को खारिज किया (और कहा) भारत के हित सुरक्षित हैं। यह तब कहा गया है जब अमेरिका के साथ हुए इस करार के दस्तावेज ही तैयार नहीं हैं और एक यौन अपराधी की मौत के बाद आधिकारिक तौर पर कानून के पालन में जारी किए जा रहे उसके जानकारों से संचार के दस्तावेजों को एक दोषी अपराधी की बेकार की बकवास कहकर पल्ला झाड़ लिया गया है। मीडिया इसमें भी दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है। एसआईआर में नाम काटने के हवा-हवाई आवेदन और शिकायत के मामलों में कार्रवाई तो छोड़िए, राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर वोट चोरों को बचाने के जो आरोप लगाए थे उनका भी जवाब नहीं है और न तो कोई फॉलो अप हो रहा है। अमेरिका से करार के बचाव में पीयूष गोयल और संबंधित अखबारों ने जो स्पष्ट नहीं किया (या कर पाये) वह यह कि रूसी कंपनी रोसनेफ्ट के मुख्य स्वामित्व वाली नायरा एनर्जी का क्या होगा। नवोदय टाइम्स ने लिखा है, नायरा एनर्जी की वजह से रूस से तेल आयात पूरी तरह बंद नहीं होगा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है, गुजरात में नायरा रिफाइनरी का भविष्य अनिश्चित है। इस संकट ने इसके स्वामित्व में बदलाव की बात शुरू कर दी है। हम जानते हैं कि भारत में विदेशी निवेश लगातार कम हुआ है और इसका कारण यहां की आर्थिक-राजनीतिक स्थितियां भी हैं। अब अगर भारत में रूस की कंपनी का हश्र अमेरिका से तय होगा तो देश की साख कैसे बनेगी और भाजपाई प्रचार तंत्र क्या करेगा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने केंद्रीय मंत्री के इंटरव्यू की खबर के साथ स्थिति स्पष्ट करने की बजाय ‘विश्लेषकों’ के हवाले से लिखा है, भारत अमेरिका के साथ बातचीत जारी रख सकता है। मौजूदा स्थिति में इसका मतलब आप समझ सकते हैं और विश्लेषक की भूमिका बताने की जरूरत नहीं है। खबर यह भी है कि, भारतीय रिफाइनरियों ने पहले ही रूसी कच्चे तेल की खरीद में कटौती शुरू कर दी है। खबर में ‘पर्यवेक्षक’ भी शामिल किए गए हैं, और पर्यवेक्षकों ने कहा कि भारत तुरंत खरीद बंद नहीं कर सकता क्योंकि रिफाइनरियों ने पहले ही अगले 8-10 हफ्तों के लिए कार्गो बुक कर लिया है और उन्हें रद्द करना संभव नहीं है। पाठक समझ सकते हैं कि इसमें खबर क्या है और विश्लेषक क्या करने आए हैं। लेकिन जैसी खबर है, इससे नायरा के संचालन पर सवालिया निशान खत्म नहीं होता है। नवोदय टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से लिखा है, नायरा को ‘रूसी तेल न खरीदने’ की नीति से छूट दी जा सकती है। आगे, मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने (अखबार को) बताया है कि तेल शोधनशालाओं को रूस से खरीद रोकने कोई का औपचारिक निर्देश नहीं मिला है, लेकिन उन्हें अनौपचारिक रूप से मॉस्को से खरीद कम करने की सलाह दी गई है।
इसी सौदा करार पर केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री ने कहा है, अमेरिकी व्यापार करार में अपने कृषि हितों को जोरदार ढंग से आगे बढ़ाने की कोशिश की। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार पीयूष गोयल ने यह भी कहा है कि पशु चारा आयात करने की मांग उद्योग से आई है। एक तरफ तो प्रधानमंत्री स्वदेशी और आत्म निर्भर होने की बात करते हैं। रक्षा उत्पादों से लेकर विमान के पुर्जे तक बनाने का दावा करते हैं दूसरी ओर पशुओं के लिए चारा (फीड) की मांग ‘उद्योग’ ने की है। जाहिर है, इसमें हम आत्म निर्भर नहीं हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने मंत्री जी के कहे इस हिस्से को हाईलाइट किया है, “हमने कृषि क्षेत्र की संवेदनशीलता को पूरी तरह से संरक्षित रखा है, और उच्च उत्पादन वाले क्षेत्रों को इससे बाहर रखा है … शायद ही कोई ऐसी फसल हो जिससे किसी किसान को खतरा महसूस हो। कांग्रेस काल से ही हम सोयाबीन तेल आयात करते आ रहे हैं… (भारत सरकार ने आत्म निर्भर होने के लिए 10 साल क्या किया पता नहीं)। डीडीजीएस के संबंध में, हमने जो कोटा तय किया है वह बहुत छोटा है… एक सरकार के रूप में, मुझे सभी हितों को संतुलित करना होगा। लेकिन मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूँ कि हमने सोयाबीन को संरक्षित रखा है। यह टाइम्स ऑफ इंडिया के इंटरव्यू से निकली खबर है। आप जानते हैं कि अभी जनरल नरवणे का इंटरव्यू ज्यादा जरूरी है। पाठकों में उनका पक्ष जानने की रुचि होगी और कथित अप्रकाशित पुस्तक के चर्चित अंश की पुष्टि (या इनकार) के लिए यह मीडिया के जरूरी काम में शामिल है। पर अखबार और सरकार जो कर रहे हैं वह अपनी जगह है। मुझे लगता है कि पाठकों को डीडीजीएस के संबंध में भी बताया जाना चाहिए। तथ्य यह है कि Distillers Dried Grains with Solubles यानी घुलनशील पदार्थों के साथ डिसटिलर्स द्वारा सुखाया गया अनाज एक उप-उत्पाद है। यहां डिसटिलर्स मुख्य रूप से शराब निर्माता हैं। इस तरह, डीडीजीएस तब बनता है जब अनाज (जैसे मक्का, चावल, गेहूँ) से इथेनॉल (biofuel) बनाया जाता है। इथेनॉल की कहानी आप जानते हैं। इससे कमाई किसकी हो रही है वह भी सर्वविदित है। पेट्रोल में मिलाने से कीमत कम होनी चाहिए थी पर जनता को कोई लाभ नहीं मिला है सो अलग। इस तरह डीडीजीएस चारे के लिए उपयोगी है। यह सोयाबीन का एक सस्ता और प्रभावी विकल्प है, जो पशु स्वास्थ्य में सुधार करता है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत, अमेरिकी डीडीजीएस पर आयात शुल्क में कटौती की गई है। इस बारे में केंद्रीय मंत्री ने जो कहा उसे आप ऊपर पढ़ चुके हैं। दूसरी ओर, यह तय है कि इथेनॉल का उत्पादन बढ़ेगा तो डीडीजीएस का उत्पादन भी बढ़ेगा। इससे तिलहन उत्पादों समेत सोयाबीन से बनने वाले पशु चारे की कीमत कम होनी है। इसके बावजूद शुल्क दर कम किया गया है तो आप मंत्री की मजबूरी समझिए और उसे देशहित में किया गया मान लीजिए। प्रचारकों ने जैसे कांग्रेस को भ्रष्ट साबित कर दिया वैसे ही इसे भी सही साबित कर देंगे।
पीयूष गोयल का इंटरव्यू पीटीआई के जरिए हिन्दुस्तान टाइम्स में है और द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, व्यापार करार, रूसी तेल पर पीयूष गोयल ने कहा – हर मंत्री अपनी जिम्मेदारी निभाता है। यह भी इंटरव्यू पर आधारित खबर है और मंत्री ने दिया हो या अखबार ने किया हो, मंत्री जी सरकारी वेतन पर नरेन्द्र मोदी की छवि ही बना रहे हैं। जनरल नरवणे की किताब यही कहती है (और शायद इसीलिए नहीं पढ़ने दिया गया) कि रक्षा मंत्री ने अपने स्तर पर उनसे नहीं कहा कि जो उचित समझो सो करो। और यही बात किसी अन्य ने भी नहीं कही और अंत में उन्हें जो आदेश मिला वह प्रधानमंत्री का था। इससे साबित तो यही होता है कि सारे निर्णय अंततः प्रधानमंत्री ही लेते हैं लेकिन पीयूष गोयल कह रहे हैं कि हर मंत्री अपनी जिम्मेदारी निभाता है। मुझे लगता है कि ऐसा कहने की जरूरत पड़ी क्योंकि सोशल मीडिया पर एक वीडियो घूम रहा था जिसमें एक सवाल का जवाब पीयूष गोयल कहते हैं कि विदेश मंत्री देंगे और विदेश मंत्री कहते हैं कि पीयूष गोयल देंगे। इससे पता चलता है कि ये लोग सार्वजनिक तौर पर नहीं कहते हैं या नहीं कह सकते हैं कि निर्णय या जवाब असल में प्रधानमंत्री का होता है। किताब नहीं छपी है – का राजनाथ सिंह का विश्वास किताब के प्रकाशन की अनुमति नहीं देने के उनके ‘आदेश’ के कारण भी हो सकता है। यह अलग बात है कि किताबों के प्रकाशन या अनुमति की औपचारिकता को जानने वाला कोई आदमी यह नहीं कहता कि किताब छपी नहीं है। अब तो कुछ घंटे में किसी भी किताब की एक प्रति (कैमरे पर दिखाने लायक) किताब की वाजिब कीमत के दूने खर्च पर आसानी से छप सकती है। किताबों की पायरेटेड कॉपी भी होती है और यह प्रकाशन उद्योग की समस्या है लेकिन उसमें उसी प्रकाशक और आईएसबीएन नंबर का हवाला होता है इसलिए नकली कहना चाहे आसान हो साबित करना मुश्किल होगा और यह वैसे ही है जैसे किसी की डिग्री या प्रमाणपत्र को फर्जी साबित करना। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर का शीर्षक है, 500 अरब डॉलर की अमेरिकी खरीद का लक्ष्य ज्यादा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा है कि $500 अरब का लक्ष्य बाध्यकारी प्रतिबद्धता नहीं है। यह आकांक्षी है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगर भारत केवल वही चीज़ें खरीदे जो अब भी खरीदी जा रही हैं, तो वर्तमान दर पर यह लक्ष्य मुश्किल लगता है। लेकिन भारत ने अमेरिका से अपनी खरीद का विस्तार किया, खासकर उर्जा और मशीनरी में — तो $500 अरब संभावित हो सकता है। जाहिर है, यह लक्ष्य है और किसके फायदे के लिए है।
बेशक यह सब भारतीय जनता पार्टी की सरकार के काम, उसका पक्ष-प्रचार और वास्तविकता के प्रति व्यवहार या रुख का मामला है। और इसी सरकार में देखा जा रहा है। इसीलिए नरेन्द्र मोदी नेता के रूप में और पार्टी के रूप में भारतीय जनता पार्टी चुनाव प्रचार में वोट मांगने के लिए अपने काम की बात नहीं करती है। बिहार चुनाव से पहले महिलाओं को 10,000 रुपए नकद दिए जाने की बात भी नहीं की। इस मुद्दे पर जनसुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा किया गया तो यह सवाल था कि आपको वोट कितने मिले। मुझे नहीं लगता है कि राज नारायण ने जब इंदिरा गांधी के खिलाफ मुकदमा किया होगा तब उनसे नहीं पूछा गया होगा। चुनाव में गड़बड़ी या सत्ता के दुरुपयोग के मामलों का स्वतः संज्ञान लिया जाना चाहिए और नहीं लिया जाएगा तो शिकायत करनी पड़ेगी। इसके लिए 45 दिन का नियम तय है और अब नई समस्या सामने आई कि हारने वाले को तभी सुना जाएगा या वही शिकायत करे जो ठीक-ठाक वोट प्राप्त कर चुका है। इससे यही लगता है कि वोटर शिकायत ही नहीं कर सकता है और अब जैसा कहा जा रहा है सरकार एसआईआर के जरिए वोटर चुन रही है वरना नागरिकता सुनिश्चित करके वोटर बनाने वाला चुनाव आयोग अब लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी की बात कर रहा है। दूसरी ओर प्रधानमंत्री अपने या अपनी पार्टी के शासन काल को अच्छे दिन कह चुके हैं। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर है, भाजपा के अच्छे दिन आरएसएस के कारण हैं न कि भाजपा के कारण। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने यह भी कहा है कि समान नागरिक संहिता देश को एकजुट करने में मदद करेगी। कुल मिलाकर, भागवत घुसपैठियों का हौव्वा ही फैला रहे हैं। अमर उजाला ने इसे बहुत प्रेम से सजाकर छापा है। दूसरी ओर, द टेलीग्राफ ने इसका मतलब बताया है। यहां शीर्षक है, भागवत ने बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों से कहा : एकजुट हों और लड़ें। मुख्य शीर्षक है, हिंदुत्व की लाइन नरम पड़ी। नई दिल्ली डेटलाइन से जेपी यादव की खबर इस प्रकार है, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को बांग्लादेश में हिंदुओं से एकजुट होने और “लड़ने” का आह्वान किया, और उन्हें भारत तथा दुनिया भर के हिंदुओं से समर्थन का आश्वासन दिया। उन्होंने केंद्र से “घुसपैठियों” के खिलाफ सख्त रुख अपनाने का आग्रह किया और यह विवादित सुझाव दिया कि “उनकी भाषा ही उनकी पहचान बता देती है।” हालांकि उन्होंने भाषा का नाम नहीं बताया। उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब भाजपा शासित राज्यों में बंगाली प्रवासियों को “बांग्लादेशी” कहकर पुलिस उत्पीड़न और भीड़ हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है। बंगाल में चल रहे एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग द्वारा असली नागरिकों को मताधिकार से वंचित करने की कोशिश की जा रही है। संघ के 100 साल पूरे होने पर मुंबई में एक भाषण देने के बाद दर्शकों के सवालों का जवाब देते हुए भागवत ने कहा, “बांग्लादेश में अभी भी लगभग 1.25 करोड़ हिंदू हैं। अगर वे एकजुट होते हैं, तो वे वहां की राजनीतिक व्यवस्था का इस्तेमाल अपने फायदे और सुरक्षा के लिए कर सकते हैं, लेकिन उन्हें एक साथ आना होगा।” बांग्लादेश की स्थिति और भारत की सुरक्षा पर इसके असर के बारे में पूछे जाने पर, भागवत ने दावा किया कि बांग्लादेश में हिंदुओं ने इस बार मुश्किलों का सामना करने पर भागने का फैसला नहीं किया है।
पीएम केयर्स पर पीएमओ ने लोक सभा सचिवालय से कहा
असम के मुख्यमंत्री, भाजपा में कांग्रेस से आयातित लेकिन मौजूदा कर्ता-धर्ता के प्रिय हेमंत बिस्व सरमा मुसलमानों के खिलाफ खुलकर बोलते हैं। हाल में वे मुसलमानों की तस्वीर को गोली मारने के अपरने वीडियो के लिए खबरों में हैं। सोशल मीडिया से उसे हटा दिए जाने के बावजूद उनका विरोध हो रहा है पर भाजपा या आरएसएस ने उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की है अब तो डर यह भी है कि भाजपा ने अपने सभी मुख्यमंत्रियों के समान नागिरक कोड, आचार संहिता या न्यूनतम योग्यता जैसी कोई शर्त लागू कर दी तो देश का क्या होगा। फिलहाल भारी आलोचना के बाद भाजपा ने पोस्ट को डिलीट कर दिया है। कहने की जरूरत नहीं है भाजपा के अपने नियम हैं और उसके पैमाने बदलते रहते हैं। ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे। इसका सबसे बढ़िया उदाहरण पीएम केयर्स है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार नियमों का हवाला देते हए पीएमओ ने लोक सभा सचिवालय से कहा है पीएम केयर्स, राहत और रक्षा कोष से संबंधित कोई भी सवाल न लिए जाएं। जाहिर है, प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों के साथ पीएम केयर्स का गठन किया, चंदा लिए और जो वेंटीलेटर खरीदे जाने थे वे नहीं खरीदे गए। दान में मिले करोड़ों रुपए में सीएसआर के पैसे भी हैं जो सही जगह गए होते तो खर्च हो गए होते और आम जनता को उसका लाभ मिला होता। अगर प्रधानमंत्री अपने स्तर पर ऐसा पीएम केयर्स बना सकते हैं तो थानेदार को थाना स्तर पर ऐसा कोष बनाने से कैसे रोकेंगे और अगर किसी ने बना लिया तो उसपर यही नियम क्यों नहीं लागू होंगे?

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


