पानीपत- हरियाणा के पानीपत ज़िले के ऋषपुर गांव में इंसानियत को झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां एक महिला को उसके ही पति ने करीब दो साल तक बाथरूम में कैद कर रखा। महिला का नाम रामरती है, जिसे अक्टूबर 2020 में प्रशासन की मदद से मुक्त कराया गया था।
महिला एवं बाल संरक्षण अधिकारी राजनी गुप्ता को एक गुप्त सूचना मिलने के बाद यह खुलासा हुआ। सूचना देने वाले व्यक्ति ने बताया कि गांव का ही एक व्यक्ति अपनी पत्नी को अमानवीय हालात में बंद करके रखे हुए है और पुलिस को इसकी भनक तक नहीं लगने दी जा रही।
बाथरूम बना जेल
छापेमारी के दौरान टीम को घर की छत पर बने तीन फीट × तीन फीट के छोटे बाथरूम में रामरती बंद मिली। वह न तो ठीक से चल पा रही थी और न ही अपने पैर फैला सकती थी। उसका शरीर मल-मूत्र से सना था, बाल बिखरे हुए थे और दांत टूट चुके थे। बाथरूम में न तो पानी की व्यवस्था थी और न ही रोशनी की।
पति का दावा: “मानसिक रूप से अस्थिर थी”
आरोपी पति नरेश रावल ने दावा किया कि उसकी पत्नी मानसिक रूप से अस्वस्थ थी, हिंसक व्यवहार करती थी और बार-बार गंदगी फैलाती थी, इसलिए उसे बाथरूम में रखना मजबूरी थी। हालांकि, डॉक्टरों और जांच में यह दावा पूरी तरह पुष्ट नहीं हो सका।
गांव जानता था, फिर भी चुप्पी
सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि गांव के लोग, रिश्तेदार और यहां तक कि बच्चे भी इस हालात से वाकिफ थे। कई लोगों ने महिला की चीखें सुनीं, लेकिन झगड़े और सामाजिक दबाव के डर से किसी ने हस्तक्षेप नहीं किया।
पुलिस कार्रवाई और कमजोर धाराएं
पुलिस ने आरोपी पति को धारा 498A (क्रूरता) और धारा 342 (ग़ैरकानूनी कैद) में गिरफ़्तार किया, लेकिन वह अगले ही दिन ज़मानत पर छूट गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मामले में गंभीर धाराएं लगाई जातीं तो सख्त सजा संभव थी।
इलाज और फिर उसी घर में वापसी
रेस्क्यू के बाद रामरती को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां कुपोषण और शारीरिक जकड़न का इलाज हुआ। कुछ महीनों तक वह अपने मायके पक्ष के साथ रही, लेकिन बाद में बच्चों के कहने पर उसे फिर उसी पति के घर भेज दिया गया, जहां वह आज भी रह रही है।
सिस्टम पर गंभीर सवाल
यह मामला घरेलू हिंसा कानून, महिला सुरक्षा व्यवस्था, पुलिस जांच और सामाजिक संवेदनहीनता पर बड़े सवाल खड़े करता है। महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि प्रशासन, परिवार और समाज समय रहते हस्तक्षेप करता, तो इतनी बड़ी त्रासदी टल सकती थी। मामला अभी भी अदालत में लंबित है और आरोपी सभी आरोपों से इनकार कर रहा है।
साभार : हिमाल डॉट कॉम
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की टिप्पणी-
2020 की घटना है। एक विवाहित स्त्री को दो साल तक तीन फुट के शौचालय में बंद रखने का मामला सामने आता है। जैसा कि हर घटना के साथ होता है, कुछ दिनों के बाद इसे भुला दिया जाता है। पाँच साल बाद दिसंबर 2025 में रोमिता सलूजा इस पर हिमाल में एक लंबी रिपोर्ट लिखती हैं। लंबे समय तक रामरति के पास जाती रहती हैं। उसकी दुनिया से जुड़े लोगों से मिलती रहती हैं। पति से भी मिलती हैं। कई बार मिलती हैं। रामरति की सहेली से मिलती हैं। इस केस से जुड़े अफ़सरों, वकीलों से मिलती हैं। पूरी प्रक्रिया में रोमिता एक सामान्य पत्रकार की तरह इस कहानी की परतों को उठा-उठा कर नोट कर रही हैं। उनकी इस रिपोर्ट को जज से लेकर वकील, पत्रकार से लेकर किसी लड़की को ज़रूर पढ़ना चाहिए।
जिस देश में पत्रकारिता का संस्थागत ढांचा ख़त्म कर दिया गया है, उस देश में कोई पत्रकार फेलोशिप पर एक स्टोरी के ज़रिए पत्रकारिता के ढांचे को फिर से खड़ा कर रही हैं। पहले शब्द से लेकर आख़िर तक पढ़ते हुए यही सवाल उठता रहा कि एक स्त्री इस रिपोर्ट को पढ़ते हुए कितने अलग सवालों से देख रही होगी, क्या सवालों के साथ-साथ ख़ुद के साथ भी होता हुआ महसूस करेगी, क्या उस स्त्री को यह लग सकता है कि इस समाज में उसकी जगह क्या है? वो है ही क्यों? उसका होना इतना मुश्किल और अमानवीय क्यों है?
क्या एक पुरुष पत्रकार, पुरुषों से संचालित न्याय व्यवस्था, प्रशासन वगैरह महसूस करेगा? रोमिता सलूजा की रिपोर्ट में रामरति अकेली महिला नहीं हैं। अनगिनत महिलाओं की आवाज़ हैं जो हरियाणा की लाखों FIR में दर्ज हैं, जिन्हें केवल दर्ज कराने के लिए उन्हें सात से नौ घंटे इंतज़ार करने पड़ते हैं। रोमिता सलूजा को सलाम भेज रहा हूँ।



