नई दिल्ली — यूट्यूब ने अपनी कॉन्टेंट मॉडरेशन नीति में बड़ा बदलाव किया है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्लेटफॉर्म की सुरक्षा नीतियों के बीच संतुलन बनाने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। यह संशोधित नीति दिसंबर 2023 से प्रभावी है और अब ऐसे वीडियो भी यूट्यूब पर बने रह सकते हैं, जो आंशिक रूप से उसके नियमों का उल्लंघन करते हैं, बशर्ते उनका सार्वजनिक समझ बढ़ाने में योगदान हो।
नई गाइडलाइंस के तहत अब मॉडरेटर उन वीडियो को हटाने की सिफारिश तभी करेंगे जब उसमें 50% से अधिक कॉन्टेंट यूट्यूब की नीतियों का उल्लंघन करता हो। पहले यह सीमा 25% थी। खासकर चुनाव, पहचान, लिंग, नस्ल, प्रवास और सामाजिक विचारधाराओं जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़े वीडियो इस बदलाव से प्रभावित होंगे।
इसके अलावा, मॉडरेटर अब यह भी परखेंगे कि क्या किसी वीडियो में स्वतंत्र विचार या बहस को बढ़ावा देने की सार्वजनिक उपयोगिता, संभावित नुकसान से अधिक है। अगर ऐसा लगता है, तो उस वीडियो को सीधे हटाने के बजाय “एजुकेशनल, डॉक्यूमेंट्री, साइंटिफिक और आर्टिस्टिक” (EDSA) श्रेणी के तहत आगे की समीक्षा के लिए भेजा जाएगा।
यूट्यूब की प्रवक्ता निकोल बेल ने बताया कि यह नीति केवल सीमित प्रकार के कॉन्टेंट पर लागू होती है और इसका उद्देश्य अनावश्यक रूप से कड़े नियंत्रण से बचना है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी लंबे न्यूज़ पॉडकास्ट में कुछ सेकंड की क्लिप नियमों के विरुद्ध है, तो उसे हटाने के बजाय पूरा परिप्रेक्ष्य देखा जाएगा।
यह बदलाव यूट्यूब की उस पहले की नीति को विस्तार देता है, जिसमें राजनीतिक उम्मीदवारों के वीडियो को नियम उल्लंघन के बावजूद ऑनलाइन रहने की अनुमति दी गई थी — बशर्ते वह जनजागरूकता में सहायक हों, खासकर 2024 के अमेरिकी चुनावों के मद्देनज़र।
यूट्यूब का यह रुख सोशल मीडिया की बदलती प्रवृत्तियों के अनुरूप है। मेटा और एक्स (पूर्व में ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म भी अब गलत सूचना और घृणास्पद कॉन्टेंट पर पहले की तुलना में कम सख्ती दिखा रहे हैं और उपयोगकर्ता-आधारित प्रतिक्रिया मॉडल की ओर बढ़ रहे हैं।
कोविड-19 महामारी और ट्रंप प्रशासन के दौरान यूट्यूब जिस कड़े मॉडरेशन के लिए जाना गया था, उसमें अब एक लचीलापन दिखाई दे रहा है — जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी गंभीरता से लिया जा रहा है।



