राकेश कायस्थ-
नीचे शेयर किया गया वक्तव्य एक बार ध्यान से पढ़िये और सोचिये इसमें आपत्तिजनक क्या है? अगर वास्तव में ऐसा लिखना आपत्तिजनक है तो फिर इसका मतलब यह है कि इस समय आधे भारत को जेल में होना चाहिए क्योंकि सोशल मीडिया पर हर कोई यही सब लिख रहा है।

आपत्ति का सबसे बड़ा कारण यह है कि पोस्ट लिखने वाले का नाम अली खान है। अली खान उच्चतम शिक्षा के सबसे प्रतिष्ठित निजी संस्थानों में एक अशोका यूनिवर्सिटी पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं। एकेडमिक रिकॉर्ड आला दर्जे का है, उनके काम की देश-विदेश चर्चा है। जाहिर है, तभी इतनी कम उम्र में प्रोफेसर बने हैं।
हरियाणा पुलिस ने यह पोस्ट लिखने के जुर्म में प्रोफेसर खान को घर से उठा लिया। उनकी पत्नी नौ महीने की प्रेग्नेंट हैं। ताजा खबर ये है कि निचली अदालत ने उनकी जमानत की अर्जी ठुकरा दी है। कप्पन सिद्दिकी से लेकर उमर खालिद तक सैकड़ों मामलों ने हमे बताया है कि किस तरह सांप्रादायिक राजनीति इस देश की न्यायपालिका तक को निगल लिया है।
2014 के चुनाव से ठीक पहले सोनिया गाँधी ने नरेंद्र मोदी को “ज़हर की खेती करने वाला” और मौत का “सौदागर करार” दिया था। मनमोहन सिंह ने कहा था कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बने तो इसके नतीजे देश के लिए विनाशकारी होंगे। कालांतर में ये सारी बातें सच साबित हुईं।
मगर कांग्रेस के भीतर के एक तबके ने शीर्ष नेतृत्व पर इस बात का दबाव बनाया कि वो सांप्रादायिक के सवाल से सीधा मुठभेड़ ना करे। कांग्रेस के आला नेतृत्व ने इसे एक हद तक स्वीकार भी किया और यह सबसे बड़ी गलती थी। मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे स्वीकार करते हुए कहा “ज़हर का मतलब ज़हर है। आप इसे थोड़ा सा भी चाटकर नहीं देख सकते।“
आखिर बीजेपी को मुसलमानों से क्या समस्या है? समस्या कुछ नहीं है। मुसलमान उनके लिए एक तरह का चारा हैं। संघ परिवार को यह लगता है कि नफरत का इंजेक्शन हर भारतीय को ठीक से लगा तो अस्सी बनाम बीस अपने आप हो जाएगा। उसके बाद नॉर्थ कोरिया या किसी `बनाना रिपब्लिक’ की तरह बिना कुछ किये धरे आजन्म गद्दी पर बैठे रहने की व्यवस्था हो जाएगी।
अगर मुसलमान चारा है तो एसटी-एससी और ओबीसी को `शिकारी’ बनाने का प्रोजेक्ट चल रहा है। जरा एक बार सोशल प्रोफाइल चेक कीजिये… मस्जिद के सामने डीजे पर नाचने और सड़क पर लाठी और तलवार भांज रहे लोग कौन सी जातियों के हैं।
इन्हें हथियार इसलिए थमाया गया है ताकि ये लोग किताबें ना उठा लें और फिर बराबरी आकर हर जगह अपना प्रतिनिधित्व मांगना ना शुरू कर दें। सांप्रादायिकता मौजूदा भारत का सबसे बड़ा सवाल है।
इसे अनदेखा करके आप किसी और सवाल का हल नहीं ढूंढ सकते। वामन मेश्राम को मैं बार-बार कोट करता हूं, जो कहते हैं “सांप्रादायिकता बहुजनों की समस्या नहीं है। यह मुसलमानों के खिलाफ बहुजनों का इस्तेमाल किये जाने की समस्या है।“
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