
अगर कांग्रेस कुछ गलत कर रही है तो सरकार रोक क्यों नहीं रही है, कार्रवाई कौन करेगा? वैसे भी उपशीर्षक में लिखा है, जनसांख्यिकी बदलने की घुसपैठियों की साजिश को कामयाब नहीं होने देगी भाजपा। यानी सरकार घुसपैठियों को ना तो घुसपैठ करने से रोकेगी ना वापस भेजने के लिए कुछ करेगी, जो करेगी वह भाजपा और इसकी घोषणा प्रधानमंत्री कर रहे हैं। इसका प्रचार करने के लिए अखबारों को गैर जरूरी सरकारी विज्ञापन दिये जा रहे हैं। क्यों नहीं माना जाये कि इनका असली मकसद यही है। वैसे भी प्रधानमंत्री सरकारी दौरे पर भाजपा का प्रचार क्यों कर रहे हैं। क्या इंदिरा गांधी ने इससे बड़ा अपराध किया था कि उनका चुनाव रद्द हो गया था। ऐसे प्रधानमंत्री या ऐसी पार्टी के खिलाफ कार्रवाई नहीं होनी चाहिये – पर कौन करेगा?
संजय कुमार सिंह
नवोदय टाइम्स के पहले पन्ने पर आज यह खबर कई कारणों से आपत्तिजनक है। भले इन दिनों चुनाव प्रचार नहीं चल रहा है इसलिये यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं माना जाये लेकिन ऊपर सरकारी विज्ञापन, नीचे अपना प्रचार, विपक्ष पर आरोप – भ्रष्टाचार नहीं तो क्या है? ऐसा दूसरे अखबारों में भी है। असम का यह भाषण आज दिल्ली के लगभग सभी अखबारों में पहले पन्ने पर है। “ना खाउंगा, ना खाने दूंगा” जैसी गैरजरूरी घोषणा के बाद साथ सपनों का भारत और चौराहे पर आ जाउंगा – यह जनता से धोखा भी है। दाईं ओर का शीर्षक विपक्ष पर झूठा आरोप है। अगर यह सही है, कानूनन अपराध है तो कार्रवाई की जानी चाहिये उसकी खबर छपती ही और ऐसे विज्ञापनों की जरूरत ही नहीं थी। वैसे भी, यह विज्ञापन सरकारी धन की बर्बादी और सरकारी विज्ञापन से अपना और पार्टी का चुनावी लाभ सुनिश्चित करना है। गैर जरूरी सरकारी विज्ञापन अपने आप में भ्रष्टाचार है और मीडिया का मुंह बंद रखने के लिए फेंका जाने वाला टुकड़ा है। वैसे भी जीएसटी में सुधार हुआ उसकी खबर छप गई है, विज्ञापन भी छप चुका है। दरों में कमी हुई है इसे बताया जाना कतई जरूरी नहीं है। कीमतें बढ़तीं तो भले कारण बताया जाता। कीमतें कम हुई हैं यह खरीदारी के वक्त पता चलता तो ज्यादा खुशी होती। विज्ञापनों के जरिये बताना चुनावी लाभ लेने की कोशिश न भी हो तो धन की बर्बादी है और अगर पैसे फेंकने का यह फल मिले तो क्यों नहीं माना जाये कि इसी उद्देश्य से फेंका गया है। जो भी हो यह अनैतिक और अनुचित है। सच्चाई यह है कि नोटबंदी के समय 50 दिनों में सपनों का भारत देने का वादा पूरा नहीं हुआ है और नीयत में खोट साबित भले न हुआ हो वोट चोरी पर संतोष जनक जवाब नहीं है और अब अनैतिक प्रचार और विपक्ष की आलोचना तो हो ही रही है।
आइये, अब इस खबर को देख लें शीर्षक के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है, कांग्रेस आतंकियों का समर्थन कर रही है। अव्वल तो यह भाषण सुदूर असम में दिया गया है और दिल्ली के अखबार में इतनी प्रमुखता से छापने का रिवाज रहा नहीं है। 2014 के बाद स्थितियां बदली हों तो उसके कारणों पर भी विचार करना होगा और वह भी मुद्दा होगा पर उसकी चर्चा फिर कभी। अभी तो यह कि प्रधानमंत्री कहना क्या चाहते हैं। खबर के अनुसार असम के मंगलदोई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को आरोप लगाया और इसे अखबार के संवाददाता ने नहीं किसी अनाम समाचार एजेंसी ने कवर किया है। समाचार एजेंसियों में सरकार प्रेरित और प्रोत्साहित भी हैं लेकिन अभी उनकी भी बात करने की जरूरत नहीं है। जो संपादित और सुविचारित खबर छपी है उसके अनुसार, कांग्रेस देश की सेना का समर्थन करने के बजाय पाकिस्तान द्वारा पोषित आतंकवादियों का समर्थन कर रही है। मोदी ने ….कांग्रेस पर घुसपैठियों और राष्ट्र-विरोधी ताकतों को संरक्षण देने का आरोप लगाया। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि भाजपा घुसपैठियों को जमीन हड़पने नहीं देगी और न ही जनसांख्यिकी बदलने की उनकी साजिश को कामयाब होने देगी। गौर करने वाली बात है कि खबर के अनुसार प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि भाजपा ऐसा नहीं करने देगी। सवाल उठता है कि सरकार क्या कर रही है वह क्यों नहीं रोक रही है और सरकारी दौरे पर प्रधानमंत्री भाजपा के एजंडे पर काम क्यों कर रहे हैं? आगे लिखा है, ‘कांग्रेस भारतीय सेना का समर्थन करने के बजाय पाकिस्तान द्वारा पाले गए आतंकवादियों का समर्थन करती है। कांग्रेस ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचे को नष्ट करने वाले हमारे सशस्त्र बलों का समर्थन करने के बजाय घुसपैठियों और राष्ट्र-विरोधी ताकतों को बचाने में लगी रही।
कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने कहा है तो यह खबर है। लेकिन यह कोई पहली बार नहीं है कि प्रधानमंत्री ऐसी बात कर रहे हैं। इसमें जो भी फैसला हो वह संपादकीय विवेक का मामला है और अगर इस खबर के साथ विज्ञापन नहीं होता तो यह माना जा सकता था कि निर्णय संपादक का है लेकिन विज्ञापन के साथ ऐसी खबर छपे तो पैसे के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है। वैसे भी सबको पता है कि कांग्रेस ने ऐसा कोई विरोध नहीं किया था। प्रधानमंत्री को अगर पता है कि कांग्रेस पाकिस्तान द्वारा पाले गये आतंकवादियों का समर्थन करती है तो रोकना सरकार का काम है। सीमा पार रह रहे आतंकियों को कांग्रेस यहां से कैसे समर्थन दे सकती है और अगर पाकिस्तान के पाले आतंकी यहां हैं तो क्यों हैं और कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है। जाहिर है, प्रधानमंत्री राजनीतिक भाषण और बयानबाजी कर रहे हैं। यह तथ्यों के लिहाज से गलत भी हो सकता है और इसलिए इसे और कम से कम इस शीर्षक को इतनी प्रमुखता से छापना असामान्य है क्योंकि यह विपक्ष के लिए नुकसानदेह है। दिलचस्प है कि अखबार का उपशीर्षक है – कहा, जनसांख्यिकी बदलने की घुसपैठियों की साजिश को कामयाब नहीं होने देगी भाजपा। जाहिर है कि घुसपैठियों को रोकना और सीमा से बाहर करना सरकार का काम है वह अपना काम नहीं कर रही है या सरकार के लिए ऐसा मामला ही नहीं है। नरेन्द्र मोदी सत्ता में आने से पहले तब की सरकार पर घुसपैठियों को संरक्षण देने और उनका वोट बैंक बनाने का आरोप लगाते थे। बात तब भी वही थी लेकिन जब वे सत्ता में नहीं थे तो यह माना जा सकता था कि जो सत्ता में है वही घुसपैठ करा रहा है या होने दे रहा है।
अब जब नरेन्द्र मोदी सत्ता में हैं और घुसपैठ हो रही है तो माना जा सकता है कि सरकार घुसपैठ होने दे रही है और प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि भाजपा जनसांख्यिकी बदलने की घुसपैठियों की साजिश को कामयाब नहीं होने देगी। यह मोहल्ला स्तर की राजनीति हो सकती है, राष्ट्रीय स्तर पर की जा रही है। सत्तारूढ़ दल की योग्यता-प्रतिभा अगर यही है तो विदेश नीति के क्षेत्र में इसका असर दिख रहा है। पहले माना जाता था कि वोटर इसे नहीं समझ रहे हैं या इसे ही पसंद करके वोट दिये जा रहे हैं। पर अब वोट चोरी के आरोप के बाद सब कुछ साफ है। विज्ञापनों के कारण अगर मीडिया सरकार का समर्थन कर रहा था पर जिस सरकार का समर्थन कर रहा है वह अयोग्य और अक्षम तो है ही, वोट चोरी से जीतने की आरोपी है। चुनाव आयोग को नियंत्रण में कर लेने और सुप्रीम कोर्ट पर दबाव बनाने के उदाहरणों के बावजूद कर रहा है तो बताना और इसका विरोध करना जरूरी है। जनता को इसे समझना होगा।
इस खबर के साथ दो सूचनाएं हाईलाइट की गई हैं। पहली, मां कामख्या के आशीर्वाद से ही सफल रहा (ऑपरेशन) सिन्दूर। मुझे ऑपरेशन सिन्दूर को सफल कहने का कोई कारण समझ में नहीं आता है। जब इसे मां कामख्या से जोड़ दिया गया है तो मेरा ऐसा कहना धार्मिक आस्था का भी मामला हो सकता है लेकिन मीडिया इसे जस का तस हाईलाइट कर दे – इससे जरूरी था कि इस पर चर्चा करता। और चर्चा होगी तो मैं यही कहता कि आपरेशन सिन्दूर गैर जरूरी था, जम्मू में नुकसान बहुत ज्यादा हुआ और ट्रम्प के अचानक युद्ध विराम की घोषणा के बाद युद्ध रुक जाना बेहद शर्मनाक रहा। सफल होने का तो कोई कारण ही नहीं है। वैसे भी भिन्न धर्म के लोगों की भागीदारी वाले किसी अभियान में धर्मनिरपेक्ष भारत के प्रधानमंत्री का ऐसा कहना गैर जरूरी है। जम्मू में हुए नुकसान के मद्देनजर ऑपरेशन सिन्दूर को भूलना चाहिये न कि मां कामख्या का आशीर्वाद बताना चाहिये। ऐसे में प्रधानमंत्री का यह कहना भी अटपटा है कि, शिव भक्त हूं, अपमान को पी जाता हूं। अगर ऐसा था तो मां को गाली दिये जाने के कई दिनों बाद चीन से लौटकर उसपर क्यों बोले और अपमान बुरा नहीं लगा है, पी गये हैं तो जो गिरफ्तार किया गया उसे छोड़ने की अपील कीजिये, सबको अच्छा लगेगा और यकीन हो जायेगा। लेकिन उन्होंन कहा है, ‘कांग्रेस मुझे कितनी भी गालियां दे, मैं शिव का भक्त हूं मैं इन्हें विष की तरह पी जाता हूं, पर बेशर्मी के साथ किसी का अपमान हो तो वह बर्दाश्त नहीं होता।’ मुद्दा कांग्रेस के गाली देने का है ही नहीं। गाली देने वाला गिरफ्तार किया जा चुका है और उसे किसी भी तरह कांग्रेस से नहीं जोड़ा जा सका है। जहां तक, ‘बेशर्मी के साथ किसी का अपमान हो तो वह बर्दाश्त नहीं होता’ जैसी बात है, प्रधानमंत्री को उनकी बात करनी चाहिये जिनका अपमान उनने खुद किया है। इसके सैकड़ों उदाहरण हैं। आग लगाने वालों को कपड़ों से पहचानना और ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले तो बहुत सभ्य किस्म के अपमान हैं। जहां तक शिवभक्त होने की बात है, शिव पुराण और अन्य पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि रावण भी शिव का परम भक्त था।
कोलकाता से छपने वाले द टेलीग्राफ की लीड प्रधानमंत्री का यही भाषण है। इंफाल डेटलाइन से छपी इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, मोदी ने ‘घुसपैठियों को बचाने वालों’ को चेतावनी दी। मुख्य शीर्षक है, चुनावी मुद्दा : असम की नाज़ुक नस। यह अंग्रेजी और हिन्दी पत्रकारिता का अंतर हो सकता है। इसमें प्रधानमंत्री ने जो कहा वही छपा है लेकिन उसकी सच्चाई के साथ। जबकि हिन्दी का अखबार प्रधानमंत्री और भाजपा का खुलकर प्रचार करता दिख रहा है। द टेलीग्राफ में सरकारी विज्ञापन नहीं होते हैं इसलिए जीएसटी वाला विज्ञापन भी नहीं है। कहने वाले कह सकते हैं कि विज्ञापन के साथ और बिना विज्ञापन के अखबारों की भाषा और शैली अलग है। पर ऐसा होना नहीं चाहिये। और यह न सिर्फ सरकार को करना चाहिये, मीडिया को भी विज्ञापनों के लिए पत्रकारिता को शूली पर चढ़ाने से बचना चाहिये। हिन्दी अखबारों में उत्तर प्रदेश के अखबार अमर उजाला में भी असम की यही खबर लीड है। आज यहां विज्ञापन नहीं है और लीड का शीर्षक भी विज्ञापन वाले नवोदय टाइम्स से अलग है, घुसपैठिये और जनसांख्यिकी बदलने की साजिशें देश के लिए खतरा। उपशीर्षक है, असम से पीएम ने कांग्रेस पर साधा निशाना, कहा – पाकिस्तान का हर झूठ बन जाता है उसका एजेंडा। यह सब तब है जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से दोस्ती मोदी जी की थी और दुबई में ही सही, कल पाकिस्तान से मैच हो ही गया। जो लोग पहले पाकिस्तान से मैच खेलने का विरोध करते थे वे बचाव करने में लगे थे।
देशबन्धु की लीड क्रिकेट मुकाबले की ही है। शीर्षक पीड़ितों का यह कहना है कि, अभी हमारे आंसू भी नहीं सूखे हैं। पाकिस्तान के साथ किसी भी प्रकार का संबंध नहीं होना चाहिये। पर प्रधानमंत्री ने कहा है कि ऑपरेशन सिन्दूर सफल रहा। यह सवाल हमेशा रहेगा, भले इसका जवाब मन की बात में भी नहीं दिया जाये कि जब पीड़ितों के आंसू भी नहीं सूखे थे तब उनके लिए ऑपरेशन सिन्दूर नाम का अभियान चलाने वाले प्रधानमंत्री कैसे कह रहे थे कि मां कामख्या के आशीर्वाद से सफल रहा। कहने की जरूरत नहीं है कि पहलगाम आतंकी हमला 22 अप्रैल 2025 को अनंतनाग ज़िले के पहलगाम के पास बैसरन इलाके में हुआ था। 26 नागरिक मारे गए थे, ज़्यादातर पर्यटक थे। शुरू से ही पाकिस्तानी आतंकियों की संलिप्तता की आशंका जताई गई। ऑपरेशन महादेव तीन महीने बाद 28 जुलाई 2025 को हुआ। सुरक्षा बलों ने ऑपरेशन चलाकर तीन आतंकियों को मार गिराया। एजेंसियों का कहना है कि यही तीनों आतंकी पहलगाम हमले में शामिल थे। लेकिन सवाल उठता है कि तीन महीने, जंगल में पुलिस के घेरे जाने के बावजूद ये जिन्दा कैसे रहे? इतने समय का राशन कोई लेकर नहीं आया होगा और रेस्त्रां में खाने की सुविधा मिली नहीं होगी। इसलिये शक है कि मारे गये लोग कोई और थे। वैसे भी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इनकी पाकिस्तानी नागरिकता प्रमाणित करने के लिए बायोमैट्रिक डाटा, मोबाइल इंटरसेप्ट, दस्तावेज़ और पाकिस्तानी रिकॉर्ड जुटाए गए हैं। इसके बावजूद प्रेस सूचना ब्यूरो की प्रेस रिलीज़ में कहा गया कि ये आतंकी “पहलगाम हमले” में ही शामिल थे और ऑपरेशन महादेव उसी का प्रतिशोध था। अभी तक स्वतंत्र न्यायिक जांच रिपोर्ट की खबर नहीं है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड भी प्रधानमंत्री का असम का भाषण है। शीर्षक है, मोदी ने असम में दावा किया, कांग्रेस ने घुसपैठियों की मदद की। अगर ऐसा हो भी तो सवाल यही रहेगा कि 10 साल कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर सेकेंड लीड है। और मास्टहेड के नीचे जीएसटी का सरकारी विज्ञापन है। शीर्षक के अनुसार, प्रधानमंत्री ने असम विधानसभा चुनाव से पहले दोहरा पिच बनाया। इंट्रो है, कांग्रेस पर निशाना साधा : ‘चाहती है कि भारत का भविष्य घुसपैठिये निर्धारित करें’। यह खबर गुवाहाटी डेटलाइन से है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतवार को असम में 18,530 करोड़ रुपये की कई परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास किया। उन्होंने राज्य के लोगों को संबोधित करते हुए दो मुद्दों – विकास और “घुसपैठ” पर ज़ोर दिया। असम में विधानसभा चुनाव अगले साल मार्च‑अप्रैल में होने हैं। प्रधानमंत्री मणिपुर का दौरा करने के बाद शनिवार को असम पहुँचे। यहाँ उन्होंने महान गायक, संगीतकार व फिल्म निर्माता भूपेन हज़ारिका की जन्म शताब्दी समारोह में हिस्सा लिया। हिन्दुस्तान टाइम्स में जीएसटी का सरकारी विज्ञापन है और प्रधानमंत्री के दौरे की खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक के अनुसार प्रधानमंत्री ने कहा, कांग्रेस ने असम में अवैध प्रवासियों का समर्थन किया। गुवाहाटी डेटलाइन से उत्पल पराशर की खबर इस प्रकार है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इतवार को कांग्रेस पर असम में घुसपैठ को बढ़ावा देने, भूमि अतिक्रमण को बढ़ावा देने और “भारत विरोधी” विचारधारा से जुड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने विकास और अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त रुख के लिए भाजपा की “डबल इंजन” सरकार को श्रेय दिया।
यहां यह तथ्य है कि 2016 से असम में भाजपा की सरकार है। दो बार चुनाव जीतने के बाद अब प्रधानमंत्री अगले साल होने वाले चुनाव का प्रचार कर रहे हैं हालांकि, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा पहले कांग्रेस में थे। उनपर भ्रष्टाचार के आरोप थे फिर भी वे भाजपा में हैं और मुख्यमंत्री बना दिये गये हैं लेकिन असम में जो बुरा हुआ है उसके लिए कांग्रेस को दोषी ठहरा रहे हैं। असम में 2001 से 2016 तक कांग्रेस की सरकार थी और तरुण गोगोई मुख्य मंत्री थे। नरेन्द्र मोदी की बातों पर यकीन करने का मतलब होगा कि “भारत विरोधी” विचार धारा के बावजूद कांग्रेस तीन बार चुनाव जीती और 2016 में जब भाजपा जीती तो पांच साल सर्बानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री रहे लेकिन 2021 में भाजपा को सत्ता पूर्व कांग्रेसी हिमंत विस्व सरमा को सौंपना पड़ा। राज्यों में सरकार बनाने के लिए भाजपा जो सब करती रही है, उसमें विधायकों की खरीद और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे लोगों को भाजपा में शामिल करना शामिल है। द हिन्दू में जीएसटी का विज्ञापन नहीं है। खबर वही है जो दूसरे अखबारों में है लेकिन शीर्षक वह है जो विपक्ष को न्यूनतम नुकसान पहुंचाये। कहने की जरूरत नहीं है पेशेवर पत्रकारिता का मकसद खबर देना होता है, प्रचार करना नहीं। अखबार ने विपक्षी दल का नाम लिये बगैर जो शीर्षक लगाया है वह हिन्दी में कुछ इस तरह होगा – प्रधानमंत्री ने सीमा पर जनसांख्यिकी बदलने की साजिश का आरोप लगाया है। उपशीर्षक से प्रधानमंत्री की बातों को खबर या शीर्षक बनाने के तरीके का भी अंदाजा लगता है। उपशीर्षक हिन्दी में ऐसे लिखा जायेगा – उन्होंने कहा कि असम में साजिश राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है और इसके लिये देश भर में जनसांख्यिकी मिशन की जरूरत है। उन्होंने कांग्रेस पर घुसपैठियों को सुरक्षा और संरक्षण देने का आरोप लगाया।
कहने की जरूरत नहीं है कि असम में घुसपैठ की समस्या है और उससे कांग्रेस की सरकार भी जूझती रही है। अब अगर 10 साल से भाजपा की सरकार है तो उसे बताना चाहिये कि उसने घुसपैठ रोकने या उससे निपटने के लिए क्या किया। पर वह अभी भी कांग्रेस पर आरोप लगा रही है जबकि राज्य में विदेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर राज्य में 1979–1985 तक लंबा छात्र आंदोलन चला है। आंदोलन का नेतृत्व ऑल असम स्टूडटेंस यूनियन (आसू) और ऑल असम गण संग्राम परिषद (एएजीएसपी) ने किया था। प्रफुल्ल महंत और समुज्जवल भट्टाचार्य इसके नेता थे। जो बाद में क्रम से मुख्यमंत्री और आसू के अध्यक्ष बने। आंदोलन की मुख्य मांग “विदेशियों की पहचान और निर्वासन” थी। असम के लोगों का आरोप था कि बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों (विशेष रूप से मुस्लिम बांग्लादेशियों) ने जनसांख्यिकी असंतुलन पैदा किया और भूमि तथा संसाधनों पर कब्जा किया। स्थानीय असमिया संस्कृति और भाषा को खतरे में डाला। इसलिये वे चाहते थे कि 1951 को आधार वर्ष माना जाए और उसके बाद आने वाले सभी विदेशी घुसपैठिए माने जाएँ। इन घुसपैठियों को वोटर लिस्ट से हटाया जाए और देश से निकाला जाए। आखिरकार इसका नतीजा असम समझौता के रूप में सामने आया इसपर 15 अगस्त 1985 को दस्तखत हुए। इसकी खास बातें इस तरह थीं – 1971 को कट‑ऑफ वर्ष माना गया। इसके अनुसार, 25 मार्च 1971 से पहले असम आने वालों को भारतीय नागरिक माना जाना है। इसके बाद आए लोगों को विदेशी मानकर निकाला जाएगा। एनआरसी को अपडेट किया जाएगा। दूसरी ओर, प्रफुल्ल महंत असम के मुख्यमंत्री बने (1985–1990 और फिर 1996–2001)। लेकिन हुआ क्या? 2019 में अपडेटेड एनआरसी प्रकाशित हुआ। लगभग 19 लाख लोगों को बाहर कर दिया गया, जिनमें बड़ी संख्या हिंदू बंगाली भी थे। एनआरसी पर कानूनी विवाद, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप चलते रहे। अब तक एनआरसी औपचारिक रूप से लागू नहीं हुआ है। सीएए यानी नागरिकता संशोधन अधिनियम–2019 आया। इसमें गैर-मुस्लिम प्रवासियों को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया। लेकिन यह असम आंदोलन की भावना के खिलाफ था। आंदोलन धर्म नहीं, अवैध घुसपैठ के खिलाफ था। इसलिए जनसांख्यिकी असंतुलन आज भी मुद्दा है लेकिन क्या इसके लिए सिर्फ कांग्रेस दोषी है? इसके बावजूद, दि एशियन एज बाकी अखबारों से एक कदम आगे है। इसकी मानें तो प्रधानमंत्री ने कहा है, नेहरू और कांग्रेस की गलतियों से असम प्रभावित हुआ।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


