
आयुष सिंह-
नई दिल्ली। देश के सबसे प्रतिष्ठित औद्योगिक घरानों में माने जाने वाले टाटा समूह के भीतर इन दिनों सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। टाटा ट्रस्ट्स में चल रहे आपसी मतभेद और बोर्ड नियुक्तियों पर खींचतान अब इतनी बढ़ गई कि केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा।
Financial Express, Mint और Economic Times की रिपोर्टों के मुताबिक मंगलवार को टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा, टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन, ट्रस्टी वेनु श्रीनिवासन और दारियस खंबाटा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात की। यह बैठक इतनी अहम मानी जा रही है कि इसे टाटा समूह के “गवर्नेंस संकट” पर सरकार का सीधा हस्तक्षेप कहा जा रहा है।
बैठक में सरकार ने साफ संदेश दिया —
“Do what it takes… restore stability.”
यानी जो भी करना पड़े, करो — लेकिन समूह की स्थिरता और भरोसा वापस लाओ।
विवाद की जड़ क्या है
टाटा ट्रस्ट्स के भीतर दो धड़े बन चुके हैं।
पहला धड़ा — नोएल टाटा, वेनु श्रीनिवासन और विजय सिंह का है, जो पुराने “Tata way” यानी पारदर्शी और सामूहिक निर्णय प्रणाली का समर्थन करते हैं।
दूसरा धड़ा — मेहली मिस्त्री, जहांगीर एच.सी. जहांगीर, दारियस खंबाटा और प्रमित झावेरी — ट्रस्ट की नियुक्तियों, सूचना साझा करने और निवेश निर्णयों में अधिक भागीदारी की मांग कर रहा है।
Financial Express के अनुसार, नोएल टाटा द्वारा टाटा संस बोर्ड के लिए सुझाए गए तीन नाम — बेहराम वकील, टी.वी. नरेंद्रन और उदय कोटक — को इन चार असंतुष्ट ट्रस्टियों ने अस्वीकार कर दिया।
इसी बीच राल्फ स्पेथ, अजय पिरामल और लियो पुरी जैसे सदस्यों के इस्तीफे से बोर्ड में खाली सीटें बन गईं, जिससे विवाद और तेज हो गया।
सरकार क्यों उतरी बीच में
मंत्रालयों के सूत्रों के हवाले से Reuters ने लिखा है कि सरकार को डर है कि अगर ट्रस्ट्स में टकराव जारी रहा तो यह पूरे टाटा समूह की साख और संचालन क्षमता पर असर डालेगा — विशेषकर तब जब समूह की कंपनियां रक्षा, ऊर्जा और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
Economic Times ने खुलासा किया कि अमित शाह और निर्मला सीतारमण की बैठक में समूह नेतृत्व को कहा गया —
“Bring back harmony. The government will not allow internal feuds to weaken a national institution like Tata.”
दूसरे शब्दों में, केंद्र सरकार ने इस विवाद को केवल एक कॉरपोरेट झगड़े के रूप में नहीं, बल्कि “राष्ट्रीय महत्व के संस्थान की स्थिरता” के रूप में देखा है।
आगे क्या
अब नजरें 10 अक्टूबर को प्रस्तावित टाटा ट्रस्ट्स की बैठक पर हैं, जिसमें इस टकराव को सुलझाने की कोशिश की जाएगी।
अगर दोनों धड़ों में सहमति नहीं बनती, तो मामला अदालत या फिर किसी नियामकीय हस्तक्षेप तक पहुंच सकता है।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या टाटा समूह, जिसने दशकों तक “Trust” और “Integrity” को अपनी पहचान बनाया, अब उसी Trust के भीतर अविश्वास की लड़ाई में फंस गया है?
देखें कुछ अख़बारों की कतरन-

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आयुष सिंह एक खोजी पत्रकार, टेक उद्यमी और उभरते लेखक हैं, जो दर्शन, तकनीक और समाज के संगम पर कार्य कर रहे हैं। [email protected]
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