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आज के अखबार : एक सहमति जो स्पष्ट नहीं है लीड बन गई, इससे दूसरी देसी सौदेबाजी को समय मिल गया  

Front page of The Telegraph with a bold 'DEALS' headline over a map of India, paired with photos and side articles and a fountain-pen graphic at the bottom center.

सौदों पर द टेलीग्राफ की लीड आंखें खोलने वाली है पर क्या पाठक समझेंगे?

संजय कुमार सिंह

आज जब मेरे दस में से नौ अखबारों की लीड अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध विराम पर सहमति की खबर है लेकिन कलकत्ता का द टेलीग्राफ सबसे अलग है। दैनिक भास्कर की लीड सहमति की खबर ही है लेकिन औरों से अलग है। मुझे लगता है कि युद्ध विराम पर सहमति होती रही है पर युद्ध विराम हुआ नहीं। इस बार सहमति इतनी बड़ी खबर क्यों है, इसपर गूगल जेमिनाई (एआई) का जवाब भी दिलचस्प है। सबकी चर्चा करूंगा लेकिन सबसे पहले द टेलीग्राफ। कहने की जरूरत नहीं है कि देश की सबसे बड़ी (और पठनीय) खबर भी तृणमूल सांसदों की गद्दारी और भाजपा का उन्हें गले लगाना है। आज उस खबर को प्रमुखता नहीं मिली है। द टेलीग्राफ की लीड दो खबरों की है, उसमें भी एक तृणमूल की है लेकिन एक और खबर है जो दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। तथ्य है कि दल बदल कानून के प्रभाव से बचने के लिए तृणमूल के बागियों की संख्या कम से कम 19 होनी चाहिए। दावा 20-22 का भी रहा है लेकिन फोटो में कहीं 17 से ज्यादा लोग नजर नहीं आ रहे हैं। अगर दो लोग और नहीं मिले तो 17 सांसदों की सदस्यता खतरे में पड़ सकती है और भाजपा की रणनीति तो नाकाम होगी ही। इसे टालने के लिए दो और सांसदों को लुभाने की हर संभव कोशिश होगी और द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, चर्चा है कि बाकी तृणमूल सांसदों में वरिष्ठतम सुदीप बंदोपाध्याय कैबिनेट मंत्री बनाया जा सकता है। आप जानते हैं कि मंत्री बनाया जाना दल तोड़ने को पक्का करने की रणनीति का भाग हो सकता है। पर सब चल रहा है, खुल्लम खुल्ला दूसरे अखबारों ने खबर नहीं छापी है। द टेलीग्राफ की आज की लीड का शीर्षक सिर्फ एक शब्द है, अंग्रेजी का डील्स यानी सौदे। आसान बनाने के लिए आप इसे समझौते कह सकते हैं। सबके फायदे का समझौता। जनादेश की उपेक्षा का सौदा। भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़कर, भाजपा विरोधी वोटों से जीते सांसद भाजपा में शामिल हो गए और भाजपा ने उन्हें स्वीकार कर लिया है। तकनीकी तौर पर नहीं किया है लेकिन जो हुआ वह भाजपा का ही किया धरा है और छिप-छिपा कर भी नहीं किया गया है। इसलिए वह अलग मुद्दा है।

अभी तो यह कि द टेलीग्राफ ने आज अमेरिका और ईरान के बीच शुरुआती समझौते को लीड बनाया है और लिखा है, इससे उनके अस्थिर युद्धविराम का विस्तार होगा और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फिर से खुलेगा। लेकिन महत्वपूर्ण चुनौती बनी रहेगी और यह युद्ध समाप्त करना है। इसमें यह सवाल शामिल है कि क्या इजराइल लेबनान में अपनी आक्रामकता कायम रखेगा? दूसरी खबर टीएमसी के बागी सांसदों के एक अनाम सी अज्ञात पार्टी में विलय की है। अखबार ने इसे मौकापरस्ती का अंधेरा दरवाजा खोलना कहा है। इस तरह, डील्स के तहत जो दो खबरें हैं उनमें पहली का शीर्षक है, कुछ लोगों ने यह उम्मीद दिखाई कि युद्ध और मौतें बंद होंगी। खबर के साथ छपी दो तस्वीरों में पहली, दक्षिणी लेबनान में युद्ध प्रभावित इमारतें हैं तो दूसरी तस्वीर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया के मुख्यालय की है। आप समझ सकते हैं कि यह खबरों की प्रस्तुति का कितना प्रभावी अंदाज है खासकर तब जब सरकार ने न सिर्फ मीडिया संस्थानों को परेशान किया है और बंद भी करवाया है बल्कि कुछेक को बेचने पर मजबूर भी किया है। द टेलीग्राफ के पहले पन्ने की चौथी खबर भी आज खास है। इसके अनुसार, उड़ीशा के कंधमल की 17 साल की एक लड़की के मां-बाप उसकी शादी करना चाहते थे और लड़की इसके लिए तैयार नहीं थी। मां-बाप की जबरदस्ती से बचने के लिए उसने इंटरनेट से चाइल्ड हेल्पलाइन का नंबर 1098 निकाला और उसपर कॉल करने के बाद उसे बचा लिया गया। जन जागरूकता और शिक्षा की ऐसी खबरों को प्रमुखता दी जानी चाहिए पर ऐसा होता नहीं है और द टेलीग्राफ अपवाद है। काश हिन्दी अखबारों में ऐसी खबरें छप रही होतीं और हिन्दी पढ़ने वाले बच्चों को भी इतना जागरूक बनाया जाता।

दि एशियन एज की लीड अमेरिका और ईरान के बीच शांति करार के लिए सहमति बनने की खबर सात कॉलम की लीड है। शीर्षक में ही लिखा है कि करार पर दस्तखत शुक्रवार को जीनिवा में होंगे। आज मंगलवार ही है। इसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस शांति करार की तारीफ की है और खाड़ी में शांति व स्थिरता की अपील की है। दि एशियन एज ने इस खबर को लीड के साथ तीन कॉलम में छापा है जबकि अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों के मारे जाने की खबर पर प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया ऐसे नहीं छपी है (शायद आई ही नहीं है)। कल कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने प्रेस कांफ्रेंस में मारे गए नाविकों के बिलखते परिवार को दिखाया था और बताया था कि प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर हैं। वह खबर आज यहां पहले पन्ने पर नहीं है। देश की खबर की बात की जाए तो दि एशियन एज में मणिपुर में कुकी, नागा के झगड़े में गोली चलने से तीन लोगों के जख्मी होने की खबर तीन कॉलम में है। इसके अलावा, और भी खबरें हैं। पहले कुछ खास खबरों की चर्चा करूंगा और आप समझिए कि इन खबरों को छोड़कर अमेरिका ईरान के बीच करार की खबर को लीड बनाना कितना सही है। आज जो खबरें प्रमुख हैं उनमें दो देशबन्धु में छपी हैं। एक टॉप पर है, राम मंदिर दान चोरी का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। दूसरा बॉटम है, कल कोटा में प्रतिरोध का बिगुल बजाएंगे राहुल गांधी। दैनिक भास्कर की एक खबर है, नीट री-एग्जाम का पेपर दिलाने का झांसा, उम्मीदवारों के पासवर्ड हैक किए; तीन गिरफ्तार। खबर के अनुसार, नीट उम्मीदवारों के 150 अकाउंट हैक, फीस रिफंड के खाते बदले। कहने की जरूरत नहीं है कि फीस रीफंड की राशि लाखों में नहीं होनी है और शिकायत करने पर पकड़ा ही जाना था, अपराध कितनी कम राशि के लिए किया गया और डिजिटल इंडिया में संभव हुआ। यह हालत है और सिर्फ इस मामले में कार्रवाई से कुछ नहीं होना है। हालात सुधारने की जरूरत है। यही नीट के पर्चों के मामले में है। सरकार की कथित सख्ती की घोषणा, वायु सेना के जरिए प्रश्नपत्र पहुंचाने की योजना के बावजूद ना किसी को डर है ना लोगों को यह भरोसा कि प्रश्नपत्र लीक नहीं हो सकता है या दिलाने के लिए पैसे मांगने वाला झांसेबाज हो सकता है।

हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर के अनुसार, एनटीए ने स्वीकार किया है कि नीट के पोर्टल में दोष हैं और 19 साल के लड़के ने रीफंड के पैसे प्राप्त कर लिए। आप समझ सकते हैं कि मोदी सरकार ने कैसा डिजिटल इंडिया बनाया है। सीबीएसई की साइट का आपने पहले सुना था अब यह एनटीए का पोर्टल है। इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने की एक खबर बता रही है कि मणिपुर हिंसा में घायल लोगों को अस्पताल में दाखिल कराने के लिए इंफाल में अस्पताल के बाहर विरोध हुआ और भीड़ बढ़ने से तनाव फैल गया। यह लोगों की नाराजगी का स्तर है और सरकार की लाचारी का तो है ही। ऐसे में अमर उजाला ने बताया है कि युद्ध विराम करार भारत के लिए बड़ी राहत की बात है। इससे तेल आपूर्ति सुधरेगी, महंगाई घटेगी। यह भी बताया गया है कि कच्चे तेल की कीमतों में पांच फीसदी गिरावट। यह इस तथ्य के बावजूद है कि सरकार कच्चे तेल की कीमत कम होने पर भी उपभोक्ताओं के लिए कीमत कम नहीं करती रही है। अब तो यह पुरानी बात हो गई। फिर भी देखता हूं किस चीज की कीमत कम होती है और भारत के लिए यह कैसे बड़ी राहत है। लीड का शीर्षक दैनिक भास्कर में अलग और अनूठा है। दैनिक भास्कर ने बताया है, डील सील …. ट्रम्प ने डिजिटल साइन किए, 19 जून को जिनेवा में औपचारिक कार्यक्रम। कहने की जरूरत नहीं है कि यह पहले बताए गए दि एशियन एज के शीर्षक से अलग है और कारण बताता है कि यह क्यों दूसरे समझौतों से महत्वपूर्ण है। मुख्य शीर्षक है, ईरान को 28 लाख करोड़ देकर जंग से छूटेंगे ट्रम्प। एक बॉक्स में डील के 14 प्वाइंट बताए गए हैं। सबसे दिलचस्प है, ट्रम्प का दावा …. होर्मुज खुलेगा, ईरान से अमेरिकी नाकाबंदी खत्म होगी। इसपर ईरान का जवाब है …. अमेरिका की नीयत परखेंगे, फिर होर्मुज खोलने का फैसला।

इसके बावजूद द हिन्दू में पांच कॉलम की लीड का शीर्षक है, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध खत्म करने तथा होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) को फिर से खोलने पर समझौता। अमेरिकी उपराष्ट्रपति के अनुसार, रविवार को शुरुआती समझौते पर डिजिटल रूप से हस्ताक्षर किए गए; ईरान और पाकिस्तान के अनुसार, 19 जून को जिनेवा में आमने-सामने हस्ताक्षर होंगे; तेहरान का कहना है कि फ्रीज की गई संपत्ति की वापसी और हर्जाना समझौते का ‘ज़रूरी’ हिस्सा हैं, और होर्मुज जलडमरूमध्य में नेविगेशन सेवाओं के लिए शुल्क लिया जाएगा। द हिन्दू ने रॉयटर्स की फोटो छापी है। इसका कैप्शन है, सोमवार को लेबनान के बेरूत के पास एक व्यक्ति ‘थैंक यू ईरान’ लिखे बैनर के सामने विक्ट्री साइन (जीत का निशान) बनाता हुआ दिख रहा है। ‘थैंक यू ईरान’ जो लिखा है उसका अनुवाद और लिप्यांतरण है। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, अमेरिका और ईरान में युद्ध खत्म करने, होर्मुज फिर खोलने पर सहमति हुई। हिन्दुस्तान टाइम्स ने बैनर शीर्षक लगाया है – भंगुर शांति के लिए रूपरेखा तैयार की गई। टाइम्स ऑफ इंडिया में चार कॉलम की लीड का शीर्षक है, अमेरिका-ईरान शांति करार पर सहमत हुए; 19 जून को स्विटजरलैंड में दस्तखत होंगे। द हिन्दू ने मुख्य खबर के साथ दो और खबरें छापी है। एक का शीर्षक है, ट्रंप की घोषणा के बावजूद जहाज़ सतर्क और मोदी ने समझौते का स्वागत किया, स्थिरता की उम्मीद जताई। चेन्नई डेटलाइन से पहली खबर इस प्रकार है, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को ईरान के साथ समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने और अमेरिकी नाकेबंदी हटाने की मंज़ूरी दे दी है, लेकिन आंकड़ों से पता चला कि इस जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही सीमित ही रही। दूसरी खबर लंदन डेट लाइन से इस प्रकार है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को ईरान और अमेरिका के बीच पश्चिम एशिया में टकराव खत्म करने के लिए हुए समझौते का स्वागत किया। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समझौता क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाल करेगा और साथ ही आवाजाही की आज़ादी भी सुनिश्चित करेगा।

आज की इस बहुप्रचारित खबर पर मैंने एआई, गूगल जेमिनाई से पूछा, अमेरिका और ईरान के बीच सहमति की चर्चा तो कई बार हुई है लेकिन सहमति हुई नहीं और युद्ध जारी है। आज जिस सहमति की खबर है उसपर भी दस्तखत नहीं हुए हैं और 19 को होने की सूचना है। फिर यह खबर ज्यादा बड़ी या विश्वसनीय क्यों है। पहले कितनी बार सहमति क्यों नहीं हुई। संक्षिप्त जवाब इस प्रकार है – इसके पीछे कई ठोस कूटनीतिक और आर्थिक कारण हैं। इस युद्ध के कारण स्ट्रैट ऑफ होर्मुज बंद हो गया था, जिससे दुनिया का 20% तेल और गैस का व्यापार ठप हो गया था। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़े इस विनाशकारी मंदी के दबाव ने दोनों पक्षों को वास्तविक समझौता करने पर मजबूर किया है। 19 जून को आधिकारिक दस्तखत होने से पहले ही दोनों पक्षों ने इसके जमीन पर दिखने वाले प्रभाव शुरू कर दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की मंजूरी दे दी है, और जलमार्ग को पूरी तरह टोल-फ्री खोलने की बात कही है। ख़बरों के अनुसार, कूटनीतिक स्तर पर इस अंतरिम समझौते को दोनों देशों के मुख्य नेतृत्व (जैसे अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी वार्ताकार) द्वारा डिजिटल रूप से पहले ही एक आधार दे दिया गया है। 19 जून को स्विट्जरलैंड में होने वाला कार्यक्रम केवल इसका एक औपचारिक और सार्वजनिक समारोह है। इस समझौते को कराने में पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब और तुर्की जैसे क्षेत्रीय देशों ने बेहद सक्रिय भूमिका निभाई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने इसकी पुष्टि की है, जिससे इसकी विश्वसनीयता कई गुना बढ़ जाती है। समझौते के तहत ईरान के फ्रीज किए गए करीब 24 अरब डॉलर के एसेट्स) को जारी करने की रूपरेखा तैयार हुई है, जिसमें वार्ता शुरू होने से पहले ही एक बड़ा हिस्सा जारी करने की संभावना है। आर्थिक रूप से टूट चुके ईरान के लिए यह पीछे न हटने की बड़ी वजह है। (एआई के जवाब से मैं सहमत नहीं हूं। इसे खबर की गंभीरता का आकलन करने के लिए एक गैर अखबारी राय माना जा सकता है)।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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