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अडानी की अड़ंगेबाजी के बाद यूट्यूबर्स को क्या-क्या दिक्कतें होंगी? पढ़िए

उद्योगपति गौतम अडानी ने पत्रकार से यूट्यूबर्स बने कई नामों को अदालती पेंच में फंसा दिया है। कोर्ट ने अडानी का नाम तक लेने से मना कर दिया है। यहां तक की अब तक जितने भी वीडियो अडानी का नाम लेकर अपलोड किये गए हैं उन सबको हटाने का फरमान भी जारी हुआ है। इसके बाद अब यूट्यूबर्स को किन दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा? पढ़ें…


अजीत अंजुम-

राहुल गांधी अगर किसी भाषण में अडानी का नाम लेंगे तो अब हम नहीं दिखा सकते.

विपक्ष का कोई नेता संसद में भी अडानी का नाम लेकर कोई आरोप लगाएगा तो अब हम नहीं दिखा सकते.

इंडिया गठबंधन का कोई नेता अडानी पर आरोप लगाते हुए कोई पीसी करेगा तो भी हम नहीं दिखा सकते.

इंडियन एक्सप्रेस या कोई देशी-विदेशी अख़बार अडानी पर खुलासे करेगा तो भी हम उस पर वीडियो स्टोरी नहीं कर सकते.

अडानी की कंपनियों को मिलने वाले ठेके या फायदे के बारे में किसी नेता के बयान या किसी खोजी रिपोर्टर के इन्वेस्टीगेशन पर हम अब वीडियो नहीं बना सकते.

अडानी के ख़िलाफ़ किसी अमेरिकी कोर्ट के आदेश पर हम कोई वीडियो नहीं बना सकते.

कुल मिलाकर कोर्ट के फैसले का हवाला देकर मोदी सरकार की तरफ़ से जो फरमान आया है, उसका मतलब अब यही है. न्यूज़ चैनल तो वैसे भी ये सब नहीं दिखाते हैं, अब यूट्यूब और फ़ेसबुक पर ऐसी खबरों के लिए दरवाजे बंद किए जा रहे हैं.

हमें ऐसे ही सारे वीडियो डिलीट करने के आदेश मिले हैं.


ध्रुव राठी-

Adani is MISUSING a court order to get 130+ youtube videos blocked.

He claims that all these videos are defaming him, when in fact most of them are just factually reporting news about him. I will not accept this ridiculous censorship demand and will challenge this in the court.


सोहित मिश्रा-

जैसे Harry Potter फिल्म में कोई Voldemort का नाम नहीं लेता था, He who must not be named, इसी तरह से भारत के देसी Voldemort का भी नाम लेना गुनाह है!

चाहे अमेरिका में मामले चल रहे हों, केन्या से लेकर ऑस्ट्रेलिया तक आंदोलन हो रहे हियँ, मुंबई के धारावी में लोग प्रदर्शन कर रहे हों, देसी Voldemort का नाम लेना मना है! अगर आप नाम लेते हैं तो आपके वीडियो को डिलीट करवाया जाएगा, इंस्टाग्राम से पोस्ट हटवाया जाएगा, क्योंकि हमारे देश में बोलने की आज़ादी गोदी मीडिया को है, पत्रकारों को नहीं!


मनोज कुमार झा-

आज के नाम…. जब पूरा पारिस्थितिकी तंत्र राजनीति की आत्ममुग्ध शैली में विश्वास करने लगता है, तो लोकतंत्र एक कोने में रोता है। यह महज एक रूपक नहीं है, लेकिन हमारे समय की एक दर्दनाक सच्चाई भी है। क्योंकि लोकतंत्र एक नाटकीय क्षण में नष्ट नहीं होता; यह धीरे-धीरे मुरझाता है जब संस्थाएँ, मीडिया, बुद्धिजीवी और यहाँ तक कि नागरिक भी व्यक्तित्व के उस पंथ को आत्मसात कर लेते हैं जो वास्तविकता की जगह दिखावे को जगह देता है।

आत्ममुग्ध राजनीति आत्म-प्रचार, निरंतर छवि प्रबंधन और एक व्यक्ति को राष्ट्र के एकमात्र रक्षक के रूप में प्रस्तुत करने पर फलती-फूलती है। नेता का व्यक्तित्व संविधान से भी बड़ा हो जाता है। हर नीति, चाहे वह कितनी भी साधारण क्यों न हो, एक भव्य दृष्टिकोण के रूप में बेची जाती है। हर चुनावी मुकाबले को एक व्यक्ति के प्रति वफादारी पर जनमत संग्रह में बदल दिया जाता है। असहमति जताने वालों को विरोधी नहीं, बल्कि दुश्मन बताया जाता है।

खतरा सिर्फ़ नेता के अहंकार में नहीं है। असली ख़तरा उस पारिस्थितिकी तंत्र में है जो इसे सामान्य बनाता और बढ़ाता है। संस्थाएँ झुकने लगती हैं, इसलिए नहीं कि वे रातोंरात नष्ट हो जाती हैं, बल्कि इसलिए कि उनके संरक्षक सत्ता से निकटता के लिए स्वेच्छा से स्वायत्तता त्याग देते हैं। मीडिया सवाल पूछने के अपने कर्तव्य को पहुँच के विशेषाधिकार के लिए बेच देता है। प्रचार से घिरे और करिश्मे से मंत्रमुग्ध नागरिक, व्यक्तित्व को नीति समझने की भूल करने लगते हैं। ऐसे माहौल में, सच्चाई आख्यान के अधीन हो जाती है, और जवाबदेही एक शिकार बन जाती है।

इतिहास हमें दिखाता है कि लोकतंत्र अब तख्तापलट के ज़रिए शायद ही कभी ढहते हैं; वे भीतर से तब क्षीण होते हैं जब समाज मज़बूत नेतृत्व के वेश में सत्तावादी प्रवृत्तियों को अपना लेते हैं। सत्ता में एक आत्ममुग्ध व्यक्ति मान्यता के बिना फल-फूल नहीं सकता, और यह मान्यता तब निर्मित होती है जब पूरा पारिस्थितिकी तंत्र—पार्टी कार्यकर्ताओं से लेकर कॉर्पोरेट घरानों तक, नौकरशाही से लेकर नागरिक समाज तक—नेता की आत्म-छवि को प्रतिध्वनित करता है।

लेकिन लोकतंत्र बेज़ुबान नहीं है। भले ही वह कोने में रोता हो, वह नागरिकों द्वारा उसकी सिसकियाँ सुनने का इंतज़ार करता है। यह हमें याद दिलाता है कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना भी करिश्माई क्यों न हो, संस्थाओं के सामूहिक ज्ञान और असहमति की भावना से बड़ा नहीं है। आत्ममुग्ध राजनीति का प्रतिकार निराशावाद में नहीं, बल्कि साहस में निहित है—संस्थाओं का, पकड़े जाने का विरोध करने का साहस, मीडिया का, सत्य को पुनः प्राप्त करने का साहस, और नागरिकों का, वाहवाही के बजाय जवाबदेही की माँग करने का साहस। जय हिन्द


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