रायपुर। छत्तीसगढ़ में कोयला खनन परियोजनाओं को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। राज्य में पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की अनुमति दी गई है, जिसमें हसदेव अरण्य क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित बताया जा रहा है। मीडिया प्लेटफॉर्म द सूत्र में अरुण तिवारी द्वारा की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 से जनवरी 2026 के बीच राज्य में 2.33 लाख से अधिक पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई, जिनमें से करीब 1.95 लाख पेड़ अब तक काटे जा चुके हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, इन कटान का बड़ा हिस्सा उन कोल ब्लॉकों से जुड़ा है जहां खनन परियोजनाओं के संचालन में Adani Group की भूमिका माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर (MDO) के रूप में बताई जाती है। यही वजह है कि पर्यावरण कार्यकर्ता और स्थानीय आदिवासी समुदाय लंबे समय से इन परियोजनाओं को लेकर विरोध दर्ज कराते रहे हैं।
हसदेव अरण्य में सबसे ज्यादा कटाई
रिपोर्ट में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ के घने वन क्षेत्र Hasdeo Aranya में एक लाख से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं। यह इलाका देश के महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है और यहां बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय निवास करते हैं।
हसदेव क्षेत्र में कोयला खनन को लेकर पहले भी कई बार विवाद सामने आ चुके हैं। पर्यावरण संगठनों का कहना है कि खनन परियोजनाओं के कारण न केवल जंगलों का नुकसान हो रहा है बल्कि वन्यजीवों के आवास और स्थानीय जल स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं।
कई जिलों में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई
रिपोर्ट के अनुसार छत्तीसगढ़ के कई जिलों में बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई दर्ज की गई है। इनमें प्रमुख रूप से सरगुजा, रायगढ़, कोरबा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और कांकेर शामिल हैं।
- सरगुजा – लगभग 73,888 पेड़
- रायगढ़ – करीब 51,851 पेड़
- कोरबा – लगभग 19,150 पेड़
- दंतेवाड़ा – करीब 15,481 पेड़
- नारायणपुर – करीब 17,836 पेड़
- कांकेर – लगभग 9,952 पेड़
इनमें से कई क्षेत्रों में कोयला खनन परियोजनाएं संचालित या प्रस्तावित हैं।
कई कंपनियों की परियोजनाएं, अडानी की प्रमुख भूमिका
रिपोर्ट में बताया गया है कि इन परियोजनाओं में कई सरकारी और निजी कंपनियां शामिल हैं। इनमें SECL, NTPC, जिंदल स्टील एंड पावर तथा अन्य ऊर्जा परियोजनाएं शामिल हैं।
हालांकि, जिन कोल ब्लॉकों में खनन किया जा रहा है, उनमें से कई में Adani Group माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर के तौर पर काम कर रहा है। इसी वजह से पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि बड़े पैमाने पर खनन के लिए जंगलों की कटाई तेज हुई है।
सरकार का पक्ष
छत्तीसगढ़ सरकार का कहना है कि खनन और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए वन भूमि के उपयोग की अनुमति नियमों के तहत दी जाती है। राज्य के वन मंत्री केदार कश्यप के मुताबिक, सभी मंजूरियां कानूनी प्रक्रिया के तहत दी जाती हैं।
पर्यावरण संगठनों की चिंता
पर्यावरण विशेषज्ञों और हसदेव बचाओ आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई से क्षेत्र का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ सकता है। उनका दावा है कि जंगल खत्म होने से वन्यजीवों के साथ-साथ स्थानीय आदिवासी समुदायों की आजीविका भी प्रभावित होगी।
मीडिया प्लेटफॉर्म द सूत्र की इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद एक बार फिर यह सवाल उठने लगा है कि ऊर्जा और औद्योगिक परियोजनाओं के विस्तार के बीच पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों का संतुलन कैसे बनाया जाएगा।




Uma Shankar
March 12, 2026 at 7:10 am
“अडानी” नहीं “अदाणी” लिखिए। नीरेंद्र नागर जी इतने बड़े पगलैट/मूर्ख नहीं हैं कि आपको बार-बार समझाना पड़े। वह आपके और अन्य मीडिया घरानों के लिए भाषा-सुधार का काम करते रहे हैं। सुबोध जी इसलिए आपके बारे में अनाप-शनाप लिखते फिरते हैं क्योंकि आप भाषा के बारे में नहीं जागरूक हैं। एक और बात, दूसरों के ट्विटर/फ़ेस्बुक पोस्टों को कॉपी करते समय आवश्यक तब्दीलियाँ भाषा करें तथा ज़रूरत पड़ने पर “(sic)” का उपयोग करें, ताकि पता रहे कि उस व्यक्ति ने यह शब्द/नाम ग़लत लिखा है।
Uma Shankar
March 13, 2026 at 2:37 pm
Sic नहीं, बल्कि “(रेक्टेऽ: )” का उपयोग करें।