नई दिल्ली। दिल्ली की रोहिणी अदालत ने बुधवार को निचली अदालत द्वारा 6 सितंबर को पारित उस एकतरफा आदेश (Ex-Parte Gag Order) को रद्द कर दिया, जिसमें चार पत्रकारों को अडाणी समूह के खिलाफ “मानहानिपूर्ण प्रकाशन” करने से रोका गया था।
जिला जज आशीष अग्रवाल ने पत्रकारों रवि नायर, अबीर दासगुप्ता, अयस्कांत दास और आयुष जोशी की अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि जिन लेखों और रिपोर्टों पर रोक लगाई गई थी, वे पहले से ही लंबे समय से सार्वजनिक डोमेन में मौजूद थे। ऐसे में सिविल जज को आदेश पारित करने से पहले पत्रकारों को सुनना चाहिए था।
जज अग्रवाल ने कहा, “अगर बाद में सुनवाई में यह पाया जाता कि लेख मानहानिपूर्ण नहीं हैं, तो पहले हटाई गई सामग्री को बहाल करना संभव नहीं होता। इसलिए ट्रायल कोर्ट को आदेश देने से पहले प्रतिवादियों को सुनने का अवसर देना चाहिए था। यह आदेश टिकाऊ नहीं है, इसलिए इसे रद्द किया जाता है।”

गौरतलब है कि इसी मामले में वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता की याचिका पर एक अन्य जज ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।
पत्रकारों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर ने दलील दी कि अधिकांश प्रकाशन जून 2024 से ही सार्वजनिक डोमेन में थे और इतनी देर बाद “अत्यावश्यक और असाधारण राहत” के तौर पर एकतरफा निषेधाज्ञा देना उचित नहीं था। उन्होंने कहा कि सिविल कोर्ट ने बिना ठोस कारण बताए यह मान लिया कि लेख असत्यापित और मानहानिपूर्ण हैं।
ग्रोवर ने यह भी कहा कि कोर्ट ने “ब्लैंकेट ऑर्डर” जारी कर दिया, जिसके चलते सैकड़ों वीडियो और पोस्ट हटाए गए। उन्होंने सवाल उठाया, “क्या इस देश में कोई ऐसा कानून है, जो प्रेस को किसी भी संस्था पर सवाल उठाने या लिखने से रोक सके? यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।”
वहीं, अडाणी एंटरप्राइजेज की ओर से वरिष्ठ वकील विजय अग्रवाल ने तर्क दिया कि हाल ही में कंपनी से जुड़ा एक पॉडकास्ट सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिससे तत्काल आदेश देना जरूरी हो गया। उन्होंने पत्रकारों पर “सोची-समझी साजिश” और “चाइनीज़ फंडिंग लेने” के आरोप भी लगाए।
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना पत्रकारों को सुने एकतरफा आदेश पारित करना न्यायोचित नहीं था। इस फैसले को पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है।
परंजॉय गुहा ठाकुरता से जुड़े केस की खबर यहां पढ़ें…



