नई दिल्ली। अडानी समूह की परियोजनाओं के लिए गुजरात सरकार ने केंद्र सरकार से उन वन भूमि के टुकड़ों को ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम (GCP) से हटाने का अनुरोध किया, जिन्हें वनीकरण के लिए आरक्षित किया गया था। दस्तावेजों के अनुसार, गुजरात सरकार ने साफ तौर पर कहा था कि इनमें से चार वन खंड अडानी कंपनी की परियोजनाओं के लिए ‘मांगे गए’ हैं। अंततः केंद्र सरकार ने अपने ही नियमों को दरकिनार करते हुए इन वन क्षेत्रों को कार्यक्रम से हटा दिया।
ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम की निगरानी करने वाली केंद्र की विशेषज्ञ संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन (ICFRE) ने शुरुआत में इस पर आपत्ति जताई थी। संस्था ने माना था कि जिन क्षतिग्रस्त जंगलों को और सघन व स्वस्थ बनाने के लिए कार्यक्रम में शामिल किया गया था, उन्हीं को काटने के लिए बाहर करना “स्वभाव से ही विरोधाभासी” है।
इसके बावजूद, दिसंबर 2024 में गुजरात सरकार ने नया तर्क पेश किया। उसने कहा कि जिन वन भूमि पर अब तक कोई वनीकरण प्रस्ताव नहीं आया है, उन्हें पूरे कार्यक्रम से ही हटा दिया जाए। इस बदले हुए तर्क में अडानी समूह का नाम सीधे नहीं लिया गया, लेकिन व्यवहार में वे चारों वन खंड भी इसमें शामिल थे, जिनके लिए पहले अडानी की ‘मांग’ दर्ज की गई थी। इसके बाद केंद्र सरकार ने 63.44 हेक्टेयर के चार वन खंडों समेत कई अन्य भू-भागों को ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम से बाहर कर दिया।
आरटीआई के जरिए हासिल दस्तावेजों से स्पष्ट होता है कि जुलाई 2024 में गुजरात वन विभाग ने ICFRE को पत्र लिखकर 13 वन खंडों को कार्यक्रम से हटाने का अनुरोध किया था। चार खंडों के सामने स्पष्ट रूप से लिखा गया था—“अडानी कंपनी के एफसीए (वन संरक्षण अधिनियम) प्रस्ताव में मांगे गए, इसलिए इन्हें रद्द किया जाए।”

खोजी वेबसाइट रिपोर्टर्स कलेक्टिव की रिपोर्ट के अनुसार, उसने जब इस बारे में सवाल पूछे तो गुजरात सरकार ने पहले इनकार किया कि उसने अडानी समूह के लिए कोई अनुरोध भेजा था। हालांकि, जब आधिकारिक रिकॉर्ड साझा किए गए, तो सरकार की ओर से कोई जवाब नहीं आया। पर्यावरण मंत्रालय की आंतरिक टिप्पणियों में भी दर्ज है कि गुजरात सरकार ने इन भू-खंडों को अडानी कंपनी के प्रस्ताव से जुड़ा बताया था।
चारों वन खंड कच्छ जिले के कच्छ ईस्ट डिवीजन में स्थित हैं। इनमें से दो मुंद्रा क्षेत्र में हैं, जिनमें से एक अडानी पावर के मुंद्रा पावर प्लांट के बेहद करीब है। बाकी दो भुज साउथ रेंज में हैं।
अडानी समूह से बार-बार संपर्क के बावजूद कंपनी ने परियोजनाओं का विवरण दिए बिना टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। समूह का कहना है कि जब तक उनसे जुड़ी किसी विशिष्ट परियोजना का नाम नहीं बताया जाता, वे प्रतिक्रिया नहीं दे सकते।
यह पूरा मामला सरकार के उस ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम पर गंभीर सवाल खड़े करता है, जिसे जंगलों के संरक्षण और वनीकरण के लिए पेश किया गया था, लेकिन जिसे उद्योगों की जरूरतों के आगे कमजोर पड़ते देखा गया।
इस प्रकरण पर द क्रेडिबल न्यूज का ट्वीट-
अडानी ग्रुप को जमीन देने के लिए गुजरात सरकार ने तोड़ा कानून: reporters collective की रिपोर्ट में हुआ खुलासा
- गुजरात सरकार ने केंद्र सरकार से ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम के तहत वृक्षारोपण के लिए आरक्षित वन भूमि के कई टुकड़ों को खोलने का अनुरोध किया है।
- सरकार ने कहा कि अडानी समूह ने अपनी परियोजनाओं के लिए इन वन भूखंडों में से चार की ‘मांग’ की है।
- इसके बाद गुजरात सरकार ने संशोधित स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया। उसने केंद्र सरकार को एक नए निवेदन में सूचित किया कि इन और अन्य भूखंडों पर कोई भी वनरोपण नहीं करना चाहता, इसलिए इन सभी को उस कार्यक्रम से हटा दिया जाना चाहिए।
- केंद्र सरकार ने अनुरोध को मान लिया। अपने मौजूदा नियमों को दरकिनार करते हुए, उसने ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम से जमीन के 13 टुकड़े जिसमें से लगभग 63.44 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाली चार भूखंडों को- जो मूल रूप से अदानी समूह के लिए अनुरोधित थे- कई अन्य भूखंडों के साथ हटा दिया।
ग्रीन क्रेडिट योजना क्या है- अक्टूबर 2023 में मोदी सरकार ने इस योजना को शुरू किया था। इसका उद्देश्य था कि सरकार खराब हालत वाली जमीनों पर पेड़ लगाएगी। जब कोई कंपनी जंगल काटने की इजाजत लेता है, तो उसे बदले में बराबर या दोगुनी जमीन पर पेड़ लगवाने होते हैं या “ग्रीन क्रेडिट” खरीदनी होती है।



