ज्ञानेश्वर वात्सायन-
डॉ अजय कुमार, Ex IPS, आज जमशेदपुर (झारखंड) में विधान सभा का चुनाव लड़ रहे हैं. आज के डॉ अजय कुमार को मैं उतना करीब से नहीं जानता, लेकिन इतिहास पता है. लाल डायरी देख ठीक से बताएंगे, वैसे 1993 या 1994 होगा. जमशेदपुर बर्बाद हो गया था. खून बह रहा था सड़कों पर. कुछ भी नहीं बचना था. टाटा खत्म, तो जमशेदपुर भी खत्म. पुलिस – प्रशासन नहीं, गैंगस्टर का राज हो गया था जमशेदपुर में.
टाटा घराने ने तत्कालीन मुख्य मंत्री लालू यादव से कह दिया था, हम सब कुछ बंद कर जा रहे हैं. लालू टाटा के इस फैसले से हांफने लगे थे. टाटा ही चला जाता, तो टाटानगर क्या और जमशेदपुर क्या ?
लालू यादव ने टाटा घराने से कहा, मत जाइए, आप जो कहेंगे, वो करेंगे. तब जमशेदपुर को एक बेहद सख्त मिजाज एसपी की जरुरत थी. टाटा ने कहा, मुझे डॉ अजय कुमार दो. तब डॉ अजय पटना के सिटी एसपी थे. बड़े एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की इमेज बन गई थी.
सबसे बड़े डॉन नुनु सिंह को भी अंधेरी रात में बांस की सीढ़ियों पर चढ़ मार चुके थे. इसके पहले कितने, गिनती मुश्किल है. अपराधियों के शरीर पर गाड़ियां भी उन दिनों खूब चढ़ती थी.
लालू यादव ने टाटा में टाटा को बचाने के लिए डॉ अजय कुमार को जमशेदपुर एसपी बनाने की बात मान ली. डॉ अजय ने चार्ज लेने के पहले लालू यादव से वचन लिया, आप न कोई दखल देंगे और न किसी की पैरवी करेंगे. जहां मर्जी होगी, हम घुसेंगे.
इसके बाद डॉ अजय कुमार जमशेदपुर पहुंचे. चार्ज लेने के 48 घंटे के भीतर अर्से से कोहराम मचाते अपराधी बाप-बाप करने लगे. दोनों तरफ कार्रवाई. कोई इधर गिरा, कोई उधर गिरा. अब पुलिस वाले और आम लोग नहीं, अपराधी मारे जा रहे थे. पुलिस की बंदूकें गरज रही थी. अपराधियों के घर-ठिकाने जेसीबी से मिट्टी के मलबे में बदले जा रहे थे. जिन्हें पुलिस की गोली से बचना था, वे देश-दुनिया के किसी बिल में जाकर दुबक जा रहे थे. जमशेदपुर का नाम भी नहीं लेना चाहते थे. पटना में मंत्रियों के बंगले तक की तलाशी हो जा रही थी.
तब इस प्रकार जमशेदपुर को बचाया था डॉ अजय ने और फिर टाटा घराना भी रहा. आगे टाटा ने डॉ अजय को अपना बनाया. वे लोक सभा भी पहुंचे, अब फिर से विधान सभा लड़ रहे हैं.



