रवींद्र सिंह-
ये वर्ष और बीता वर्ष कई अपनों को छीन ले गया. कुछ रिश्ते टूट गए, कुछ खो गए और कुछ बिछड़ गए. बहुत दूर निकल आया मैं. अब यहां से अपने भी अपने नज़र नहीं आते. हां कुछ पराए जिंदगी के सफ़र में मिले और अपनापन दे गए. उन्हें आज भी यादों में रखता हूं. और तुम उनमें से एक हो अमित.
याद है मुझे जब तुमने S1 में ऑडिशन दिया था और शेखर आनंद ने मुझसे पूछा था रवीन्द्र, कर पाएगा ये? पहले ऑडिशन में एक बार लड़खड़ाए और मैंने हिम्मत बंधाई थी तुमने दोबारा किया, पहले से थोड़ा बेहतर और मुझसे कहा था कि अब कैसा रहा, मैंने कहा बहुत अच्छा, तुम्हारी आवाज़ और प्रजेंटेशन अच्छा है. जल्द ही फ्लो में आ जाओगे. शेखर ने पूछा कैसा रहा, मैंने कहा अच्छा है, आगे और अच्छा करेगा. मौका मिलना चाहिए.
इसके बाद तुमने हमेशा बड़ा भाई कहकर ही पुकारा लेकिन इसके बाद जो तुमने मुझसे वादा किया था उसे तुम पूरा नहीं कर सके और यही बात मुझे आज चुभ रही है. अब तुम इस दुनिया में नहीं हो, और तुम्हारी ये कमी हर उस शख्स को खलेगी जिसने तुम्हारे साथ थोड़े बहुत भी पल बिताए हैं.
वादा याद दिलाऊं… तो मेकअप रूम में हम साथ थे और तुम्हें एक लड़की बहुत पसंद आ गई थी. तुम किसी के पास नहीं गए. बार-बार मुझसे जिद करने लगे कि भईया वो किसी से बात नहीं करती है सिर्फ आपसे करती है. आपकी रिस्पेक्ट करती है. प्लीज़ मेरी बात कीजिए.

मैं शादी करना चाहता हूं. मुझे बहुत पसंद है वो. इतना पीछे पड़े कि मुझे तुम्हें आश्वासन देना पड़ा. मैंने उससे बात की और तुम्हें सही रास्ता भी बताया कि आगे क्या करना है. उसके बाद तुम दोनों वैवाहिक बंधन में बंध गए. ये अलग बात है कि मैं उस मौके पर शामिल नहीं हो सका था.
लेकिन तुमने मुझसे वादा किया था कि उसका साथ जिंदगी भर निभाओगे, फिर उसे अकेला कैसे छोड़ गए. सैक्टर 37 में तुम्हारे विवाह के बाद मैं दोनों से मिला था, दोनों को खुश देखकर मैं अंदर ही अंदर बहुत खुश था क्योंकि तुम दोनों के प्रेम में आस्था थी, समझ थी और गहराई थी. उसके बाद हम साधना में मिले थे.
जब मेरा आगमन साधना में हुआ था. उस वक्त तुम इंचार्ज थे और मुझे तुम्हारी इस ऊंचाई पर गर्व था. नवीन जी उस वक्त चैनल हैड के तौर पर आए थे. तब उन्होंने कहा था कि रवीन्द्र तुम सीनियर हो और चार्ज संभालो. मेरा जवाब था कि अमित अच्छा कर रहा है उसे ही करने दो.
तुमने हमेशा बेहतर किया. हमने साधना में बहुत मज़े किए. कैंटीन से लेकर डिबेट तक. जबरदस्त काम का जुनून था. सबकुछ तो ठीक था, अब तो तुम एक अच्छे खासे मुकाम पर पहुंच चुके थे, फिर इतनी जल्दी क्या थी जाने की.
एक बार फिर बैठते, तुम कुछ शिकायतें रखते, थोड़ा नाराज़ होते लेकिन यूं चले जाना ठीक नहीं है. मिल नहीं सका और अंतिम यात्रा पर शामिल भी नहीं हो पाया जिंदगी भर इसका मलाल रहेगा. तुमने जिंदगी में एक अधूरापन छोड़ दिया है, जो पूरा नहीं होने वाला. ईश्वर तुम्हें अपने श्रीचरणों में स्थान दें, तुम वहां भी अपनी अलग पहचान बना ही लोगे. बहुत पीड़ा है मन में तुम्हारे जाने की, अब तुम्हें डांट भी नहीं सकता. जहां रहो खुश रहना भाई.
अलविदा. ऊँ शान्ति शान्ति शान्ति…
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