त्रिभुवन-
एक न्यूज़ चैनल में आज शाम को एक एंकर महोदया ख़बर पढ़ रही थी। मैं हतप्रभ होकर सुनता रहा कि क्या ऐसी भाषा का प्रयोग समाचार प्रसारण में हो सकता है? ऐसी भाषा तो पांचजन्य और ऑर्गेनाइजर भी इस्तेमाल नहीं करते। भाजपा के सत्तासीन लोग तो इन दोनों के संपादकों को भी कोसते होंगे कि तुम से बढ़िया तो इस न्यूज़ चैनल वाले कर रहे हैं।
यह समाचार प्रसारण है या राजनीतिक प्रोपेगैंडा का निर्माण है। हेडलाइन में “यूपी में शाहीन बाग पैटर्न” कहा जाता है और तुरंत जोड़ा जाता है; “लेकिन योगी नहीं बनने देंगे उत्तरप्रदेश को शाहीन बाग।” यहाँ समाचार और सत्ता का भाषिक गठजोड़ साफ़ दिखाई देता है। आंदोलन या असहमति की संभावना को “साज़िश”, “नापाक़ मंसूबे” और “भड़काऊ गैंग” जैसे विशेषणों से चिह्नित कर देना तो भयावह है।
हम जिस “मैन्युफैक्चरिंग ऑफ़ कन्सेंट” की बात सुनते हैं, यहाँ वह प्रत्यक्ष दिखती है। “बच्चों से नफ़रती नारे”, “ज़ेहादी गैंग” जैसे शब्द केवल सूचना नहीं देते, दर्शक के मन में एक पूर्वनिर्धारित दुश्मन गढ़ते हैं। नवरात्र जैसे धार्मिक अवसर को भी राजनीतिक दंड-विधान की भाषा से जोड़ा जाता है: “नवरात्र में उद्दंड हुए तो योगी देंगे दंड”।
इस तरह धर्म, राजनीति और मीडिया का त्रिकोण दर्शक को अनुशासन और भय के मिश्रण से नियंत्रित करता है।
मुसलमानों को “भाई जान” कहकर बार-बार उपहास करना या “कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे” जैसी तुकबंदियाँ गढ़ना, भाषा का सामान्य राजनीतिक विमर्श नहीं है; यह “अपने को पराए बनाने का” का सुविचारित अभ्यास है। नागरिक को नागरिक नहीं, संदिग्ध समुदाय में तब्दील किया जाना एक ख़तरनाक़ खेल है।
मैं अवाक् होकर ख़बर सुन रहा था और साथ ही सुन रहा था जुमले जैसे कि “जहाँ फेंके पत्थर, हिसाब उसी सड़क पर”। ये भाषा न केवल कानून और व्यवस्था की भूमिका की अवमानना करती है, हिंसा को भी वैधता प्रदान करती हैं।
यहाँ महत्वपूर्ण सवाल यही है: जब मीडिया इस तरह भाषा का इस्तेमाल करता है, तो क्या वह लोकतंत्र के चौथे खंभे की भूमिका निभा रहा है या अमन चैन से रहते समाज को एक पुआल में बदल कर उसे माचिस की तीखी दिखाने का काम कर रहा है।
यूपी को सुलगाने की साज़िश, भड़काऊ गैंग, नापाक़ मंसूबे, बच्चों से नफ़रती नारे, ज़ेहादी गैंग, भाई जान अड़े हैं नॉनवेज पर दुकानें खुली रखने पर।
मेरे बगल मैं बैठे एक बच्चे ने किशोर ने प्रश्न किया, तो क्या नवरात्र पर मीट-माँस के साथ अब लहसुन-प्याज और अनाज की दुकानें भी बंद रहेंगी? मैंने पूछा कि क्यों? वह बोला, जब मीट-माँस नहीं खाते तो कह रहे हैं कि मीट-माँस की दुकानें बंद रहें तो नवरात्र पर तो हम लोग न लहसुन-प्याज खाते और न ही अनाज। तो फिर ये दुकानें भी तो मीट-माँस की तरह बंद रहेंगी ना!
उधर बगल में बैठे एक सज्जन ने कहा, बेटा, यह मामला खाने का नहीं; खाने से खेलने का है।




Prem Shankar Choubey
September 22, 2025 at 10:07 pm
बहुत ही निंदनीय। सबसे उत्कृष्ट भाषा तो ”सर तन से जुदा” है। …नवरात्र पर बोलना आसान है, कभी हज पर ज्ञान बांटने का नैतिक साहस दिखलाओ, भाषा की मर्यादा का एहसास स्वतः सुखद रूप से हो जाएगा।