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अखिलेश से शास्त्रार्थ में हारे अनिरुद्धाचार्य अब हिंदु-मुस्लिम के नाम रोटी कमा रहे हैं!

श्याम मीरा सिंह-

अनिरुद्धाचार्य परलोक के स्वप्न दिखाकर रोटी कमा रहे हैं कोई बात नहीं। मगर हर जगह अपना पौंगा ज्ञान देना शुरू नहीं कर देना चाहिए, ख़ासकर वहाँ जहाँ आपसे मांगा नहीं गया। ये आपका जातीय श्रेष्ठताभाव ही है कि आप अपने से अधिक प्रतिष्ठित नेता को मिलते ही उससे कुशल मंगल लेने के बजाय उसे उपदेश देना शुरू कर देते हैं। जबकि सामने वाला पुरुष आपसे कमतर या कम अनुभवी नहीं है।

अखिलेश यादव ने लोकजन में प्रसिद्ध एक पोंगापंथी को जिस दुत्कार भाव से जवाब दिया शायद ही फ़िलहाल कोई मेनस्ट्रीम नेता ऐसा जवाब देता। जो भाव अखिलेश ने दिखाया वह स्वयं के आत्मसम्मान का भाव था, जिसने लोकभय से एक एवरेज पाखंडी के सामने झुकने का ढोंग करने से भी इंकार कर दिया।

शिक्षा की जय हो, विज्ञान की जय हो


विवेक त्रिपाठी-

आधी रात में वासुदेव ने जब अपने पुत्र को देवकी के हाथ में दिया, तब पहला नाम मां ने क्या बोला!!

सवाल यही था न अखिलेश जी का.. और आचार्य अनिरुद्धाचार्य जी ने क्या जवाब दिया!!

उन्होंने कहा, भगवान के बहुत सारे नाम हैं.. कन्हैया कह के बोला..

जिस किसी को मेरी बात समझ में न आ रही हो वो ये वीडियो एक बार नहीं.. दो बार नहीं.. दस बार नहीं.. सौ बार सुन ले..

बहुत सारे लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि मैया ने क्या बोला.. तो सुनिए देवकी मैया ने कहा, लल्ला..

जी हां, लल्ला.. मेरा लल्ला..

देवकी और वासुदेव के दिव्य पुत्र ने जब जन्म लिया था, तब उनका कोई नाम नहीं था. वो देवकी और वासुदेव का आठवें पुत्र थे जिसकी बाकी के सात पुत्रों की तरह कंस मामा के हाथों हत्या होनी थी.. लेकिन वो पुत्र नहीं अवतार थे. साक्षात विष्णु अवतार.. उनके लिए लीलाएं रची जा चुकी थीं. पूरा एक कालखंड उनके वचनों और कथनों का था.. वासुदेव उन्हें आंधी-तूफान से भरी डरावनी रात में लकड़ी की टोकरी में रखकर नदी में छोड़ आए थे और किस्मत उस नवजात को नंदगांव ले गई.

ध्यान रहे, उस दिव्य बालक का अभी तक कोई नाम नहीं पड़ा था. नंद गांव में जब वो नंद और यशोदा के घर पहुंचे तब उन्हें कान्हा, कन्हैया, कृष्ण, कृष्णा, किसना जैसे तमाम नामों से पुकारा गया. इसलिए यहां आचार्य अनिरुद्धाचार्य जी का जवाब गलत साबित होता है..

एक बात बड़ी सामान्य सी है.. इसे अच्छी तरह से समझना चाहिए.. किसी भी बच्चे के पैदा होते ही उसका नामकरण नहीं होता. माताएं उसे स्थानीय भाषा के आधार पर लाड प्यार वाले नाम से पुकारती हैं. जैसे ब्रज में अगर कोई बच्चा होता है तो लड़के को लल्ला और लड़की को लल्ली कहकर पुकारते हैं. माता देवकी ने भी अपने पुत्र को सबसे पहले लल्ला कहकर ही पुकारा था. इसका किसी शास्त्र या धार्मिक दस्तावेजों में कोई प्रमाणिक वर्णन नहीं है. मैं तमाम विद्वानों से बातचीत के आधार पर ये दावा कर रहा हूं.

जैसे मैं कानपुर में पैदा हुआ था. वहां माताएं अपने बालकों को बबुआ या बउआ पुकारती हैं. बेटी होती है तो उसे बिट्टी, बिटिया, लाडो, गुड्डी-गुड्डो या गुड़िया कहा जाता है.

इसी तरह हर जगह क्षेत्रीय भाषा और बातचीत के शैली के आधार पर माता-पिता अपने बेटे-बेटियों को लाड के अलग-अलग नाम से संबोधित करते हैं.

अपने श्रोताओं को क्या समझा रहे हैं अनिरुद्धाचार्य? देखें…

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