उत्तराखंड- अंकिता भंडारी को न्याय मिले या न मिले भाजपा नेताओं और पार्टी से जुड़े सेठों के हक में दनादन फैसले हो जा रहे हैं। ताजा प्रकरण में दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्यंत कुमार गौतम से जुड़ी एक्स और फेसबुक पोस्ट हटाने का निर्देश जारी कर दिया है। जबकि पूरे प्रदेश की जनता सड़कों पर है। नीचे पढ़ें…
उत्तराखंड | अंकिता भंडारी मर्डर केस… दिल्ली हाईकोर्ट ने BJP के राष्ट्रीय महामंत्री दुष्यंत कुमार गौतम से जुड़ी पोस्ट हटाने का आदेश दिया। BJP नेता ने याचिका में कांग्रेस AAP सहित कई लोगों के ट्विटर/फेसबुक प्रोफाइल को पार्टी बनाया था। उन्होंने कहा था कि इस केस में मेरा नाम बेवजह लिया गया है, जो मानहानि का केस बनता है।- सचिन गुप्ता, पत्रकार
गुरप्रीत गैरी वालिया-
अदालत ने कितनी जल्दी ऑर्डर दे दिया… दिल्ली हाईकोर्ट ने कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) सहित अन्य दलों को आदेश दिया है कि वे बीजेपी नेता दुष्यंत कुमार गौतम को अंकिता भंडारी हत्याकांड से जोड़ने वाले सभी सोशल मीडिया पोस्ट 24 घंटे के भीतर हटाएं।
देश में कौन कहता इंसाफ़ नहीं मिलता है… देखिए भाजपा के नेता को कितनी जल्दी इंसाफ़ मिला है।
डॉ मोनिका सिंह-
मैंने अपनी जिन्दगी में पहली बार महिलाओं को इतने बड़े स्तर पर किसी बेटी के लिए न्याय मांगते देखा है! पहाड़ की बेटी की अंकिता भंडारी मामले मे नेताओ की खुली धमकी।
“या तो अपनी बेटी बचाओ या अपनी सरकार बचाओ, इस सरकार के नेताओं ने हमारी बहन बेटियों की रेट 10000 – 20000 लगा रखी है तो इन नेताओ की बहन बेटियों की रेट ज़रूर पूछना चाहिए”
राहुल सैनी-
निर्भया के बाद देश की एक और बेटी अंकिता भंडारी के परिवार वालो को न्याय दिलाने के लिए जनता का हुजूम सड़कों पर है..! सरकार ने पैरामिलिट्री फोर्स तैनात की हुई है लेकिन ये हुजूम पीछे हटने का नाम नहीं ले रहा है..!
अंकिता ह*त्याकांड के खुलासे और उस VIP की गिरफ्तारी के लिए संघर्ष चल रहा है..! मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने लोग पहुंचे हैं। अंकिता को न्याय मिलना ही चाहिए एक भी दोषी बचने नहीं चाहिए..!
केपी मलिक-
क्या ‘विश्व गुरु’ की कगार पर खड़े देश की बेटी को मिलेगा न्याय?

उत्तराखंड की बहुचर्चित अंकिता भंडारी के मामले को लेकर राज्यभर में जन आक्रोश लगातार बढ़ रहा है। ख़ास से लेकर आम लोग इस मामले में सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं। उत्तराखंड में हो रहे प्रदर्शन और आंदोलन को देखते हुए बेटियों par हत्या का मामला एक बार फिर चर्चा में है। दरअसल उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी पर दोषी को बचाने के आरोप लग रहे हैं। अंकिता के माता-पिता और उत्तराखंड के लोग न्याय की मांग करते हुए सड़कों पर हैं।
मणिपुर की मनोरमा को सेना के जवानों ने उठाया, बलात्कार किया और जननांगों में गोलियां उतार दीं और सरकार आज भी उनके बचाव में अदालत में खड़ी है। विरोध में इरोम शर्मिला ने 12 साल अनशन किया, लेकिन ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ के नाम पर न्याय ठप्प।
ओडिशा की आदिवासी आरती मांझी को थाने में महीनेभर बलात्कार का शिकार बनाया गया, फिर जेल की हवा खाने को छोड़ दिया। आवाज उठाने वालों को दबाया गया और सरकार अब भी बलात्कारियों के लिए पैरवी कर रही। आरती आज भी जेल में सड़ रही है।
छत्तीसगढ़ की सोनी सोरी को गुप्तांगों में पत्थर ठूंसकर टॉर्चर किया गया, डॉक्टरों ने सबूत के तौर पर पत्थरों के टुकड़े सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाए, लेकिन पुलिसवालों को बचाने की सरकारी जंग जारी। सोनी जेल की सलाखों के पीछे।
उन्नाव की पीड़िता से सेंगर का मामला तो आपके सामने है ही, उसी कड़ी में उत्तराखंड की अंकिता भंडारी चली गई। परिवार इंसाफ के लिए भूखे मुंह ताक रहा है।
अब बताइए, कौन कहता है बलात्कार जुर्म है? अगर आप ‘सरकारी तमगे’ वाले हैं चाहे नेता, अधिकारी पुलिस या सुरक्षा बल से हो तो बलात्कार करो, सरकार खर्चे पर बचाएगी। समाज ‘बहादुरी का पुरस्कार’ देगा। बस, ‘राष्ट्रीय हित’ का लबादा ओढ़ लो!
लेकिन विवेक जागृत करो: अगर आप मुसलमान, दलित, ईसाई या आदिवासी हैं, तो आपकी बेटियों के साथ सरकारी खर्चे पर बलात्कार संभव है। ऊंची जाति या सत्ता के करीबियों की बेटियां? वो तो ‘विश्व गुरु’ की विरासत हैं!
गर्व कीजिए कि हम ‘विश्व गुरु’ बनने की कगार पर हैं। जहां न्याय ‘चुनिंदा’ हो, और बलात्कार ‘पदानुक्रम’ पर निर्भर। अब फैसला आपका: किसके साथ खड़े होगे, पीड़ितों के या तंत्र के?



