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आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म जैसी थ्योरी को मानने वाले इसे अवश्य पढ़ें

सागर डी-

आत्मा की अमरता की थ्योरी पर मेरा यकीन उठता जा रहा है। जब आप मस्तिष्क के काम करने के तरीके का एनालिसिस करते हैं तो पाते हैं कि आत्मा जैसी कोई चीज़ नहीं। वह आपकी चेतना, आपका कांशस या आपका मन है जो आपको आत्मा के होने का अहसास दिलाता है।

आत्मा या चेतना और कुछ नहीं बल्कि आपका अपना दिमाग है। वही आपको जीवन भर नियंत्रित करता है। सुख, दुख पाप पुण्य सब उसके कब्जे में है। जिसे हम चेतना कहते हैं वो कोई बाहरी चीज या तत्व नहीं है बल्कि दुनियावी चीजों को अनुभव करने का एक तरीका या एक व्यवस्था है। मन संवेदनाओं, यादों, विचारों और भावनाओं का एक लगातार बहता हुआ दरिया है। जिस तरह नदी में पानी की कोई भी बूंद स्थाई नहीं होती। हर पल नया पानी आता रहता है। उसी तरह हमारे मन में भी सेंसेशंस यानी संवेदनाओं और विचारों का प्रवाह लगातार बदलता रहता है। अच्छे बुरे कर्म आपका मन आपसे कराता है।

मस्तिष्क के निर्जीव हो जाने को चिकित्सक ‘ब्रेन डेथ’ कहते हैं। दिमाग के मर जाने पर आत्मा की भी मौत हो जाती है।


मनोज अभिज्ञान-

आत्मा की धारणा से जुड़ा सबसे बड़ा और भावनात्मक तर्क अक्सर पुनर्जन्म के ‘उदाहरणों’ के रूप में सामने आता है। जैसे कोई बच्चा पिछले जन्म की बातें बता रहा हो, कोई व्यक्ति अपने सपनों में किसी पुराने जीवन की घटनाएं देख रहा हो, या कोई औरत अचानक किसी अजनबी गांव में पहुंचकर लोगों को उनके रिश्तों सहित पहचान ले रही हो। ये किस्से, जो अधिकतर पत्रिकाओं, टीवी कार्यक्रमों या लोककथाओं में सुनने को मिलते हैं, लोगों को यह विश्वास दिलाते हैं कि आत्मा शरीर के मरने के बाद भी ज़िंदा रहती है और कहीं न कहीं फिर जन्म लेती है। लेकिन इन उदाहरणों की जांच करें तो वे अक्सर अधूरी, अनुमान आधारित, सांस्कृतिक रूप से प्रेरित और वैज्ञानिक परीक्षणों से कोसों दूर होते हैं। फिर भी, इन कथाओं का मनोवैज्ञानिक प्रभाव इतना गहरा होता है कि आत्मा की अमरता की कल्पना लोगों को भावनात्मक सुकून देती है। यही कारण है कि पुनर्जन्म की ये कहानियां आत्मा के अस्तित्व का सबसे लोकप्रिय लेकिन सबसे कमजोर तर्क बनकर टिकी रहती हैं।

बात तब की है जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। वह दौर आज भी स्मृतियों में ताजा है, जब मनोहर कहानियां और सत्यकथा जैसी पत्रिकाएं हर महीने किसी न किसी रहस्यलोक का दरवाज़ा खोल देती थीं। बाकी बच्चे जब कॉमिक्स पढ़ा करते थे, तब मैं मनोहर कहानियां और सत्यकथा ही नहीं, माया जैसी राजनीतिक पत्रिकाएं भी पढ़ा करता था। बाद में वेदप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, जेम्स हेडली चेज़, और अगाथा क्रिस्टी के लागभग सारे उपन्यास पढ़ गया। आज मनोहर कहानियां और सत्यकथा दिल्ली प्रेस से छपती हैं लेकिन तब मित्र प्रकाशन, इलाहाबाद से छपने वाली इन लोकप्रिय पत्रिकाओं में जहाँ एक ओर खून, बदला, जुर्म और जासूसी की कहानियाँ पाठकों को बाँध लेती थीं, वहीं लगभग हर दूसरे-तीसरे अंक में पुनर्जन्म की कोई ऐसी कहानी होती थी जो रोंगटे खड़े कर देती थी। कोई बच्चा पिछले जन्म में हुई अपनी हत्या का राज खोलता, तो कोई औरत सपनों में किसी अनजान गांव की पुकार सुनते-सुनते अपने पिछले जन्म के रिश्तों तक पहुँच जाती, और पाठक, आंखें चौड़ी किए, पन्ना दर पन्ना इस रहस्य को चाट जाते।

इन कहानियों का जादू ऐसा था कि असल-झूठ का फर्क जैसे गौण हो जाता था। पत्रिकाएं उन किस्सों को इस अंदाज़ में पेश करती थीं कि लगता था, ज़रूर कुछ तो है! संवादों का लहजा, बीच-बीच में पुलिस की जांच, और आखिरी लाइन में ‘फिर वह बच्चा आज भी अपने पिछले जन्म के घर में खेलता है’ जैसी बातों ने पुनर्जन्म की अवधारणा को लोकप्रिय मिथक बना दिया। वैज्ञानिक सोच उस समय पीछे छूट जाती, और कल्पना की उड़ान पर पाठक किसी और कहानी के लिए अगले अंक की प्रतीक्षा करने लगता।

पुनर्जन्म के ये उदाहरण दरअसल सिर्फ ‘दावे’ हैं, प्रमाण नहीं। अब तक जितने भी पुनर्जन्म के किस्से सामने आए हैं, वे अनुभवजन्य (anecdotal) हैं। यानी किसी व्यक्ति ने कुछ यादें बताईं, और किसी दूसरी जगह उसका आंशिक मिलान पाया गया। लेकिन इनमें से किसी एक भी मामले में ऐसा नहीं हुआ कि कोई शख्स पिछली जिंदगी के पूरे जीवन का स्पष्ट विवरण दे पाया हो, सबकुछ सही-सही और स्वतंत्र रूप से जांचे जाने योग्य तरीके से। जो कथाएं दिखाई देती हैं, वे अक्सर सुनी-सुनाई, टुकड़ों में मेल खाती, या संभावित तरीके से प्रेरित की गई जानकारियाँ होती हैं।

अक्सर देखा गया है कि ये किस्से छोटे बच्चों के साथ जुड़े होते हैं। बच्चे कल्पनाशील होते हैं, और कभी-कभी असल या काल्पनिक घटनाओं को मिलाकर बातें करते हैं। यदि परिवार या समाज पुनर्जन्म की धारणा में पहले से विश्वास करता है, तो बच्चा उस माहौल से प्रभावित होकर ऐसी बातें कर सकता है, और फिर बड़े उसे दिशा देने लगते हैं, कभी-कभी अनजाने में, कभी-कभी जानबूझकर।

कई मामलों में यह देखा गया है कि जिसे पुनर्जन्म कहा जा रहा है वह असल में cryptomnesia होता है, यानी किसी पुरानी बात को व्यक्ति अनजाने में अपनी समझकर दोबारा बता देता है। इसके अलावा déjà vu जैसी मनोवैज्ञानिक अवस्थाएँ भी होती हैं, जब व्यक्ति को लगता है कि उसने वर्तमान स्थिति पहले भी देखी है, जबकि वह वास्तव में पहली बार हो रही होती है। यह मस्तिष्क-जनित भ्रम है, पूर्वजन्म की याद नहीं।

जब कोई मामला मीडिया में आता है, तो समाज उसे चमत्कार मानने लगता है। सत्यापन की प्रक्रिया अधूरी होती है, परन्तु सामाजिक पूर्वाग्रह उसे प्रमाण में बदल देता है। जैसे, भारत और श्रीलंका में जहाँ पुनर्जन्म की मान्यता गहरी है, ऐसे दावे अधिक मिलते हैं। जबकि पश्चिमी देशों में, जहाँ पुनर्जन्म को गंभीरता से नहीं लिया जाता, वहाँ ये दावे लगभग न के बराबर होते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि यह अनुभव सांस्कृतिक रूप से निर्मित है, न कि सार्वभौमिक सत्य।

पुनर्जन्म की वैज्ञानिक पुष्टि कभी नहीं हुई है। यदि पुनर्जन्म सच होता, तो उसे नियंत्रित परिस्थितियों में दोहराया जा सकता, वैज्ञानिक परीक्षणों में इसकी स्पष्ट पुष्टि होती। परंतु आज तक ऐसा नहीं हुआ। विज्ञान के पास इस बात का कोई सबूत नहीं है कि चेतना शरीर के मरने के बाद भी बनी रहती है। जब मस्तिष्क की सारी विद्युत-रासायनिक क्रियाएं बंद हो जाती हैं, तो ‘मैं’ नाम की अनुभूति भी समाप्त हो जाती है। इसलिए पुनर्जन्म की कथाएं दिलचस्प हो सकती हैं, लेकिन वे आत्मा या चेतना की अमरता का प्रमाण नहीं देतीं। वे समाज, मनोविज्ञान और सांस्कृतिक प्रभावों का सम्मिश्रण होती हैं।

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