हालांकि, देशबन्धु ने लिखा है – तमिलनाडु में इंडिया की सरकार। इसके अलावा, राहुल गांधी गुड़गांव में सरकार और प्रधानमंत्री पर बरसे, तीखा हमला बोला लेकिन खबर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिली। कर्नल सोफिया कुरैशी की खबर है तो लेकिन वैसी नहीं जैसी होनी चाहिए थी। पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार बनने और मुख्यमंत्री के शपथग्रहण की खबर है लेकिन विधायकों के चुनाव में जो लॉजिकल डिसक्रिपेंसी है उसकी चर्चा नहीं के बराबर है। कायदे से इसकी भी जांच होनी चाहिए और शपथग्रहण से पहले होनी चाहिए थी।
संजय कुमार सिंह
भाजपा ने शुभेन्दु अधिकारी को ही बंगाल ने नया मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय किया है। लेकिन तमिलनाडु का अभी तय नहीं है। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, तमिलनाडु में सरकार के गठन पर अनिश्चितता जारी। हालांकि, देशबन्धु की लीड का शीर्षक है, तमिलनाडु में इंडिया की सरकार। कल मैंने लिखा था, हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए ‘पश्चिम बंगाल सरकार बर्खास्त’ और यही सबसे बड़ी ‘खबर’ है। तमिलनाडु में सरकार बनना तय नहीं है, केरल में भी शपथग्रहण की खबर नहीं दिख रही है लेकिन यहां की सरकारों को बर्खास्त नहीं किया गया है। पश्चिम बंगाल की सरकार को कर दिया गया क्योंकि मुख्यमंत्री ने कह दिया था कि वे इस्तीफा नहीं देंगी। वे चुनाव हारी नहीं हैं, उन्हें हराया गया है। जाहिर है कि उनका कार्यकाल खत्म हो जाना था और उनके इस्तीफा नहीं देने का खास मतलब नहीं था। वैसा ही, तमिलनाडु और केरल में होगा। पर वहां भाजपा नहीं है तो खबरें नहीं हैं। इस्तीफा तो मुद्दा ही नहीं है। यह जरूर कहा जा रहा है कि ज्ञानेश SIR ने बंगाल जिताया होता तो तमिलनाडु कैसे हारते। मुद्दा यह है कि ज्ञानेश SIR की चलती तो भाजपा एक सीट पर भी नहीं अटकती। और अटक गई मतलब वहां मामला ज्ञानेश SIR के भरोसे नहीं था या रहा होगा। जिसके भरोसे हैं वह अब सक्रिय है और शायद इसीलिए फैसला नहीं हुआ है और सरकार बर्खास्त करने की जल्दी नहीं है। यह भी खबर नहीं है कि क्यों नहीं है या वहां क्या चल रहा है। मैं अमर उजाला की बात कर रहा हूं। यहां सेकेंड लीड तमिलनाडु की खबर है। शीर्षक है, विजय फिर राज्यपाल से मिले, आज भी शपथ लेने पर संशय। उपशीर्षक के जरिए अखबार ने बताया है कि राज्यपाल ने पूर्ण बहुमत के साथ आने के लिए कहा था (जैसे मास्टर साहब हों जो मन में आए कह सकते हैं) और माकपा, भाकपा व वीसीके का समर्थन मिल गया है (और इस तरह बहुमत हो चुका है)। गौर तलब है कि आज समर्थन की घोषणा करने वाले माकपा-भाकपा व वीसीके द्रमुक गठबंधन में थे और अब विजय को समर्थन दे रहे हैं लेकिन माकपा-भाकपा द्रमुक को नहीं छोड़ेंगे।
अमर उजाला ने सूत्रों के मुताबिक बताया है कि वीसीके सरकार में शामिल हो सकती है और एक पद मांगा है। गौरतलब है कि टीवीके को पांच सीटों से सबसे पहले कांग्रेस ने समर्थन दिया था और इसी से भाजपा का खेल खराब हो गया या राज्यपाल ने जो किया उसकी आलोचना हुई। द्रमुक को कांग्रेस का ऐसा करना (जो असल में भाजपा का विरोध है और घोषित तथा खुलेआम है) इतना बुरा लगा है कि दूसरे दलों ने भी इसी आधार पर टीवीके का समर्थन किया है और चूंकि उनकी दो-दो सीटों से बात बनने वाली नहीं थी इसलिए द्रमुक को उससे दिक्कत नहीं है। वे द्रमुक के साथ रहेंगी। देशबन्धु की एक खबर के अनुसार, कांग्रेस-द्रमुक के रास्ते अलग हो गए हैं। भले यह भाजपा के साथ नहीं जाए पर कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। कल ही राहुल गांधी ने गुड़गांव में आयोजित एक सद्भाव यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला। आज यह खबर तो पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन यह सूचना अन्य अखबारों के साथ अमर उजाला में भी है कि द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने कांग्रेस से अपना गठबंधन खत्म कर लिया है। ऐसा तमिलनाडु में अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके को समर्थन देने के बाद हुआ है।
अब डीएमके सांसद कनिमोझी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर पार्टी सांसदों के बैठने की व्यवस्था बदलने की मांग की है। कनिमोझी ने कहा है कि बदले हुए राजनीतिक हालात तथा कांग्रेस के साथ गठबंधन खत्म होने के बाद डीएमके सांसदों का कांग्रेस सांसदों के साथ बैठना उचित नहीं है। लोक सभा में 22 सांसदों वाली डीएमके, विपक्षी इंडिया गठबंधन की चौथी सबसे बड़ी पार्टी है। इसलिए यह खबर भी बड़ी है। राहुल गांधी ने जो कहा वह इन अखबारों और संपादकों के लिए भले पहले पन्ने लायक न हो आपके जानने लायक तो जरूर है। खबरों के अनुसार, राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि भाजपा ने “चुनाव चोरी करने का एक सिस्टम” बना लिया है और वे संस्थाओं (चुनाव आयोग, नौकरशाही) को नियंत्रित कर रहे हैं। उन्होंने पीएम मोदी और गौतम अडानी के बीच गहरा संबंध होने का आरोप लगाते हुए कहा कि “कंपनी का नाम अदाणी है, लेकिन इसे ‘मोडानी’ कहा जाना चाहिए”। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के तहत देश का डेटा और कृषि क्षेत्र अमेरिकी कंपनियों को सौंप दिया गया है। ‘एपस्टीन फाइल’ का जिक्र करते हुए उन्होंने पीएम मोदी के खिलाफ गंभीर टिप्पणी की और कहा कि भारत-अमेरिका डील दवाब में की गई है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा लोकतंत्र और किसानों पर हमला कर रही है।” राहुल गांधी ने विश्वास जताया कि जनता अब भाजपा के शासन से तंग आ चुकी है और उनका समय पूरा होने वाला है।
आप जानते हैं कि पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे वाले दिन द टेलीग्राफ की खबर और प्रस्तुति के बाद सरकार समर्थकों ने एलान कर दिया था कि कोलकाता का अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ भगवा हो गया है। हालांकि तथ्य और खबर के नजरिए से अखबार का आज का यह पन्ना देखने लायक है। सोशल मीडिया और खासकर एक्स पर कई लोगों ने लिखा है तथा वीडियो भी साझा किया है जिसमें प्रधानमंत्री ने सुवेन्दु अधिकारी के रिश्वत लेने का उल्लेख एक सार्वजनक सभा में किया था। कार्रवाई की खबर तो नहीं ही है, आज उन्हीं को मुख्यमंत्री बना रहे हैं। यह वैसे ही है कि 140 करोड़ लोगों के देश में गृहमंत्री बनाने के लिए पूर्व तड़ीपार को ही चुना गया। ठीक है कि वे अदालत से बरी हो गए थे लेकिन बरी कैसे हुआ जाता है और होते रहे हैं या मामला कैसे बनाया जाता है वह सब अब सार्वजनिक है। ऐसे में मीडिया का पक्षपात अब आपत्तिजनक है। इसका विरोध जरूरी है।

अमित शाह और सुवेन्दु अधिकारी के बेदाग होने के मामले को समझने के लिए आज इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर की चर्चा की जा सकती है। आप जानते हैं कि डिजिटल डिसक्रिपेंसी के कारण, सुप्रीम कोर्ट की जानकारी में पश्चिम बंगाल के 27.16 लाख वोट नहीं दे पाए और अब आंकड़ों से साफ है कि ये लोग वोट देते तो नतीजा कुछ और हो सकता था। अगर तृणमूल हारती भाजपा ही जीतती तो भी कई ऐसे लोग जीत गए हैं जो हारते या ऐसे लोग हार गए हैं जिन्हें जीतना चाहिए था। चुनाव के लिहाज से तो यह गड़बड़ है ही। देश में कई जगह प्रावधान है कि पांच साल विधायक रह चुके लोग जीवन भर पेंशन पाते हैं। इस तरह एसआईआर और लॉजिकल डिसक्रिपेंसी के कारण कुछ लोग जीवन भर पेंशन भी पाएंगे और कुछ सुपात्रों को वेतन भत्ता भी नहीं मिलेगा। जाहिर है यह भी लॉजिकल डिसक्रिपेंसी है और इसे भी ठीक किया जाना चाहिए। इसे रेखांकित किया जाना चाहिए था लेकिन यह खबर नहीं है।
इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर कहती है कि एसआईआर ट्रिब्यूनल से अलग होने वाले जज ने 1717 नाम क्लियर किए थे लेकिन चुनाव आयोग ने 1607 नाम ही मतदाता सूची में जोड़े। इस बारे में कल मैंने यहां लिखा था, हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने ‘निजी कारणों से’ एसआईआर के बंगाल ट्रिब्यूनल से इस्तीफा दिया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर कांग्रेस के मोताब शेख की अपील सुनने के लिए विशेष सत्र का आयोजन किया था। मोताब बाद में फरक्का से जीत गए और कांग्रेस के दो में से एक विधायक हैं। आप समझ सकते हैं कि जो लोग वोट नहीं दे पाए उसमें उनकी कोई गलती नहीं थी और सुप्रीम कोर्ट के बनाए ट्रिब्यूनल ने समय रहते सारे मामले नहीं निपटाए तो इनमें जो घुसपैठिये नहीं थे उन्हें वोट देने का अधिकार दिया जाना चाहिए था। कायदे से तय समय में इनके मामले निपटाए जाने चाहिए थे। नई दिल्ली डेट लाइन से दामिनी नाथ की खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल में वोटिंग खत्म होने से एक दिन पहले, मुख्य चुनाव अधिकारी के दफ़्तर के डेटा से पता चला कि अपीलीय ट्रिब्यूनलों ने 1,607 ऐसी अपीलें मंज़ूर कर ली हैं और उन्हें वापस वोटर लिस्ट में जोड़ दिया गया है जिन्हें विवादित SIR प्रक्रिया के तहत वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था। अपील इन्हीं लोगों ने की थीं। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को पता चला है कि जस्टिस (रिटायर्ड) टीएस शिवज्ञानम की अध्यक्षता वाले 19 ट्रिब्यूनलों में से सिर्फ़ एक ट्रिब्यूनल ने 5 अप्रैल से 27 अप्रैल के बीच 1,717 अपीलें मंज़ूर की थीं। अब यह सवाल उठ रहे हैं कि ऐसी 18 अन्य ट्रिब्यूनलों ने कितनी अपीलें मंज़ूर की होंगी, और कितने लोगों को समय रहते वोटर लिस्ट में जोड़ा जा सकता था। तब ये लोग वोट डाल सकते थे।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने शुक्रवार को रिपोर्ट दी थी कि जस्टिस शिवज्ञानम ने गुरुवार को ट्रिब्यूनल से इस्तीफ़ा दे दिया। इस संबंध में उनसे संपर्क करने पर उन्होंने ऐसा करने के कारण निजी बताया है। चुनाव आयोग ने इस मामले में टिप्पणी के अनुरोध का कोई जवाब नहीं दिया। पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी मनोज अग्रवाल से भी टिप्पणी के लिए संपर्क नहीं हो पाया। पता चला है कि जस्टिस शिवज्ञानम को मूल रूप से चुनाव आयोग की 20 मार्च की अधिसूचना के अनुसार उत्तर 24 परगना और कोलकाता के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने कुल मिलाकर 1,777 अपीलों का निपटारा किया। पता चला है कि नागरिकों द्वारा नाम हटाए जाने के ख़िलाफ़ दायर सभी 1,717 अपीलें इन्होंने मंज़ूर कर लीं। बीरभूम ज़िले में नाम जोड़े जाने के ख़िलाफ़ चुनाव आयोग द्वारा दायर 60 अपीलें ख़ारिज कर दीं। इन्हें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस ज़िले का अधिकार सौंपा गया था।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड तमिलनाडु का मामला है और इसके अनुसार वीसीके ने समर्थन के बारे में फैसला नहीं किया है इसलिए एक विधायक की कमी थी और विजय ने राज्यपाल से तीसरी बार मुलाकात की। हिन्दुस्तान टाइम्स ने बंगाल और तमिलनाडु को मिलाकर लीडर बनाया है। बताया है कि विजय राज्यपाल से फिर मिले पर राज्यपाल ने सरकार बनाने का औपचारिक निमंत्रण नहीं दिया है। दि एशियन एज में बंगाल लीड है और तमिलनाडु सेकेंड लीड। अलग-अलग खबरों में बंगाल की खबर तो वही है लेकिन तमिलनाडु के बारे में कहा गया है कि वामपंथियों (भाकपा-माकपा) के समर्थन के बावजूद विजय बहुमत नहीं प्राप्त कर पाए हैं। नवोदय टाइम्स में दोनों खबरें अलग-अलग पर बराबर में हैं। लेकिन बंगाल की खबर बड़े फौन्ट में तथा तमिलनाडु की खबर छोटे फौन्ट में है। जगह भी कम है। द टेलीग्राफ का पहला पन्ना और सुवेन्दु का घंटा आप देख ही रहे हैं। तमिलनाडु के बारे में इसका शीर्षक है, सहयोगियों के भ्रम ने विजय के मुख्यमंत्री बनने की कोशिशों को रोक रखा है। मुझे लगता है कि यह शीर्षक वास्तविकता के सबसे करीब है। ऊपर अन्य अखबारों की खबरों और शीर्षक का यही मतलब निकलता है जो यहां साफ-साफ कह दिया गया है।
कर्नल सोफिया कुरैशी का मामला तो लोग भूल ही गए होंगे। स्वतः संज्ञान लेने वाले जज का ना सिर्फ तबादला हुआ, सुनिश्चित किया गया कि उन्हें कालेजियम में शामिल होने लायक भी नहीं रहने दिया जाए। फिर भी संबंधित मंत्री के खिलाफ कार्रवाई की मंजूरी अभी भी नहीं मिली है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की दलील नहीं मानी और मध्य प्रदेश सरकार से कहा है कि वह इस मामले में निर्णय लें। आप जानते हैं कि आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल ने निर्वाचित मुख्यमंत्री रहते हुए सरकार के काम को जैसे किया उसपर विवाद खड़ा करके उसे भ्रष्टाचार का मामला बनाकर न सिर्फ अभियोजन की मंजूरी दे दी गई बल्कि उन्हें और उनके सहयोगियों को जेल भी रहना पड़ा। बाद में कोर्ट ने कह दिया कि मामला ही नहीं है। दूसरी ओर, भाजपा के मंत्री के मामले में स्वतः संज्ञान लेने वाले जज का तबादला हो गया, अभियोजन की मंजूरी नहीं मिली। इलाहाबाद के एक जज के खिलाफ मामला था तो कार्रवाई ही नहीं हुई और वे रिटायर हो गए। एक जज के घर के बाहर के कमरे में नोटों के बंडल खुले में रखे होने के खिलाफ कार्रवाई में इतनी जल्दबाजी में और ऐसे हुई कि उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और जजों के मामले में ही उपराष्ट्रपति की नौकरी चली गई। सरकार किन मामलों में जरूरत से ज्यादा तेजी दिखाती है और किन मामलों पर बैठ जाती है उसे समझने की जरूरत है। पर वह छिपा हुआ नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



