
अघोषित इमरजेंसी का मीडिया और महिलाओं को सुविधा के मामले में भाजपा का असली रूप दिल्ली की महिला और एनसीआर की महिला अलग है जबकि सब डबल इंजन वाले राज्य हैं।
संजय कुमार सिंह
बिहार में जो हो रहा है वह दिल्ली में खबर नहीं है। वोटर लिस्ट के मुद्दे पर आज पहली बार बिहार बंद की अपील है। यह खबर भी आज दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं छपी। दूसरी ओर, नीतिश कुमार ने एलान किया है कि सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत का कोटा उन्हीं महिलाओं के लिए होगा जो बिहार में रहती हैं। द टेलीग्राफ ने इसे चुनावी मामला कहा है लेकिन नवोदय टाइम्स ने चार कॉलम में तान दिया है। अमर उजाला में न तो बंद की खबर है ना चुनाव प्रचार वाली यह खबर। ना ही कल सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की खबर थी। इंडियन एक्सप्रेस में महिलाओं के कोटा वाली खबर सिंगल कॉलम में है। साथ में एक खबर है जो बता रही है कि नेपाल-बिहार सीमा पर एक गांव की मुखिया को भी डर है कि वह इस बार वोट नहीं दे पायेगी। इसका कारण यह है कि वह मूल रूप से नेपाल की है। हालांकि बिहार के आठ सीमाई जिले के लोगों के बैवाहिक संबंध नेपाल के लोगों से हैं। ऐसे सैकड़ों अन्य लोग यहां हैं। खबर के अनुसार ये लोग पीढ़ियों से यहां रह रहे हैं। कानूनन माता पिता में से कोई एक पाकिस्तान का नागरिक हो तो भारत की नागरिकता या भारतीय मूल का नागरिक नहीं मानने का नियम है लेकिन नेपाल के लोगों के साथ ऐसा नहीं है। वे यहां रहते, नौकरी करते हैं और आम नागरिक के सभी अधिकार उन्हें मिले हुए हैं। आधार और मतदाता परिचय पत्र भी बने हुए हैं। भारत के लोग भी नेपाल में बिना पासपोर्ट आते जाते हैं। रहने वालों को मैं नहीं जानता लेकिन नेपाल के लोग तो भारत में रहते ही हैं। सामान्य तौर पर रहने वाला वोट दे सकता है, मुखिया है ही तो इस बार क्यों नहीं? अगर नियम कुछ और बनेगा या है तो उसे लागू करने का काम चुनाव आयोग का नहीं है और यह सिर्फ मतदान के मामले में नहीं हो सकता है। अगर ऐसा है भी तो स्पष्ट घोषणा होनी चाहिये। इन और ऐसे तमाम मामलों के बावजूद आज भी दिल्ली के ज्यादातर अखबारों में बिहार चुनाव और बंद को लेकर कोई खबर नहीं है। यह सब तब जब इमरजेंसी को बुरा कहा जाता है और अघोषित इमरजेंसी में खबर बिना किसी आदेश नहीं छप रही है।
अघोषित इमरजेंसी में सेंसर
वैसे, सेंसर और बिहार की खबरों को दिल्ली में अघोषित तौर पर ‘सेंसर’ किये जाने के दिन आज सेंसर से संबंधित एक खबर भी है। इसका आधार पहले की एक खबर है। बीबीसी की 6 जुलाई 2025 की एक खबर के अनुसार अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स के आधिकारिक एक्स (पूर्व ट्विटर) अकाउंट को भारत में अचानक रोक दिया गया है। शनिवार रात के बाद से जब देश में इंटरनेट यूज़र्स रॉयटर्स (@Reuters) और रॉयटर्स वर्ल्ड (@ReutersWorld) का एक्स हैंडल खोलने की कोशिश करते हैं, तो स्क्रीन पर एक संदेश आता है, “यह अकाउंट भारत में क़ानूनी मांग की वजह से रोका गया है।” एक्स प्लेटफ़ॉर्म के नियमों के मुताबिक़, यह संदेश तब दिखता है जब एक्स किसी वैध क़ानूनी मांग, जैसे अदालत के आदेश, की वजह से पूरे अकाउंट को ब्लॉक करने की कार्रवाई करता है। इसके बाद सोशल मीडिया पर विपक्षी नेताओं समेत कई लोगों ने चिंता जताई और इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल उठाने वाला कदम बताया। रायटर्स ने इस पर अपनी ओर से कुछ नहीं कहा था। शायद इसलिये भी कि, समाचार एजेंसी रॉयटर्स टेक न्यूज़, रॉयटर्स फ़ैक्ट चेक, रॉयटर्स पिक्चर्स, रॉयटर्स एशिया और रॉयटर्स चाइना सहित कई अन्य अकाउंट देश में काम कर रहे थे। बीबीसी ने अपनी खबर में कहा था, रॉयटर्स के अलावा तुर्की के सरकारी ब्रॉडकास्टर टीआरटी वर्ल्ड और चीन के अख़बार ग्लोबल टाइम्स के एक्स अकाउंट्स भी भारत में नहीं खुल रहे हैं। इन अकाउंट्स को खोलने पर भी एक जैसे ही संदेश दिखाई देते हैं। यह अलग बात है कि सरकारी प्रवक्ता ने पीटीआई को और इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता ने एएनआई से उसी दिन कहा था कि रॉयटर्स का अकाउंट रोकने के लिए भारत सरकार की तरफ़ से कोई क़ानूनी मांग नहीं की है। बीबीसी ने अपनी खबर में यह भी लिखा और बताया था कि सरकार की तरफ़ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सार्वजनिक तौर पर साझा नहीं की गई है। इस संबंध में आज देशबन्धु में पहले पन्ने पर छपी खबर यह रही

यह खबर आज कई अखबारों में है और इसके जरिये यह सफाई दी गई है। लेकिन सरकार की मांग के बिना अगर एक्स रायटर का अकाउंट बंद कर दे रहा है तो उससे सरकार की बदनामी हो रही है और सरकार को इससे फर्क नहीं प़ड़ता है तो लाख टके का सवाल है कि क्यों? और फर्क नहीं पड़ रहा है तो बंद कौन का रहा है और किसलिये? पर सरकार चुनाव जीतने के अलावा क्या कुछ करती है वह भी तो पता नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में भी पहले पन्ने की खबर का शीर्षक है, एक्स ने ‘सेंसरशिप’ का शोर मचाया सरकार ने कहा कि रायटर्स के हैंडल बंद करने की मांग नहीं की है। आप समझ सकते हैं कि मांग नहीं की होगी तो क्या हआ होगा और क्यों सब बिहार चुनाव से पहले हो रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स में खबर है, भारत में कई सारे अकाउंट ब्लॉक करने पर एक्स और केंद्र भिड़े। द हिन्दू में आज पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है और दो ही खबरें हैं। एक लीड और दूसरी सेकेंड। सेकेंड लीड बिहार सरकार या उसके साथ केंद्र की भाजपा सरकार की नई घोषणा का प्रचार है जो उसने महिला आरक्षण के बारे में अब किया है। द टेलीग्राफ में बिहार की घोषणा को चुनावी प्रचार बताने के साथ महाराष्ट्र में हिन्दी-मराठी विवाद और एक्स पर रायटर को ब्लॉक किये जाने से संबंधित समाचार भी है। टेलीग्राफ ने इसे लीड बनाया है और इसके साथ छपी सिंगल कॉलम की खबर में गृह मंत्रालय के सूत्रों से मिली खबर के हवाले से कहा गया है कि सोशल मीडिया पर देश विरोधी होने की आड़ में कार्रवाई की गई है। इस संबंध में उल्लेखनीय है कि बीबीसी ने 6 जुलाई की अपनी खबर में एक्स पर तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा के लिखे का हवाला दिया था। उन्होंने लिखा था, ”सरकार नफ़रत फैलाने वाले लाखों अकाउंट्स को तो बढ़ावा देती है लेकिन एक सम्मानित अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्था रॉयटर्स का अकाउंट बंद कर देती है। इन हरकतों से भारत दुनिया में और अलग-थलग पड़ता जा रहा है।”
भाजपा, ट्रोल और महिलाएं
यही नहीं, सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री कई ऐसे लोगों को फॉलो करते हैं जो महिलाओं को ट्रोल करते हैं। अल्ट न्यूज डॉट इन की दो अक्तूबर 2017 की एक खबर के अनुसार, आज की तारीख में श्री मोदी जी के 3 करोड़ 38 लाख फॉलोअर हैं और वह सिर्फ 1779 लोगों को फॉलो करते हैं। जिन लोगों को वह फॉलो करते हैं उनमें से कई सरकारी हैंडल, मंत्री, राज्यों के प्रमुख, वरिष्ठ पत्रकार और ऐसे अन्य प्रोफाइल हैं जिन्हें फॉलो करने की उम्मीद आप किसी देश के प्रधानमंत्री से करते हैं। हालांकि, इन 1779 लोगों में से कुछ मुट्ठीभर प्रोफाइल ऐसे भी हैं जिन्हें देखकर आप अपना सिर पीट लेंगे। नियमित रूप से गंदी गालियाँ देने वाले लोग, अफवाह को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाले लोग, महिलाओं से गहरी नफरत रखने वाले लोग, साप्रंदायिक जहर उगलने वाले प्रोफाइल… आपको ये सभी इस सूची में मिल जाएंगे। इस संबंध में पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी की एक किताब भी है, आई एम अ ट्रोल। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल कह चुके हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी महिलाओं को ट्रोल करने वालों को अनफॉलो करें। 19 सितंबर 2017 की इंडिया टुडे की एक खबर के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन पर 59 नए ट्विटर हैंडल फ़ॉलो करना शुरू किया। मोदी अब 1800 से ज़्यादा हैंडल फ़ॉलो करते हैं, और इस सूची में वे लोग भी शामिल हैं जिन्हें फ़ॉलो करने के लिए उनकी आलोचना होती रही है।
वरिष्ठ पत्रकार और कार्यकर्ता गौरी लंकेश की 5 सितंबर को बेंगलुरु में हत्या के एक दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रतिद्वंद्वियों के निशाने पर आ गए। उन्हें कुछ ट्विटर हैंडल को फॉलो करने के लिए आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, जिन्होंने गौरी को गाली दी थी और उनकी हत्या का जश्न मनाया था। हालांकि, भाजपा ने प्रधानमंत्री मोदी का बचाव करते हुए कहा कि उन्होंने ट्विटर पर कभी किसी को ब्लॉक या अनफॉलो नहीं किया। पार्टी ने यह भी कहा कि मोदी का माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट पर किसी को फॉलो करना “चरित्र प्रमाण पत्र नहीं” है। 20 अक्तूबर 2024 की एक खबर के अनुसार, पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के आरोपी श्रीकांत पंगारकर जालना में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हो गए हैं। पार्टी नेता और पूर्व राज्य मंत्री अर्जुन खोतकर की मौजूदगी में वे शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल हुए थे। खोतकर ने पत्रकारों से कहा, ‘पंगारकर पूर्व शिवसैनिक हैं और पार्टी में लौट आए हैं. उन्हें जालना विधानसभा चुनाव कैंपेन के प्रमुख के रूप में नामित किया गया है।
दिल्ली की महिला बनाम एनसीआर की महिला
आज हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी एक खबर के अनुसार, सिर्फ दिल्ली में रहने वाली महिलाओं को बसों में मुफ्त यात्रा की इजाजत होगी। इसके लिए नया सहेली स्मार्ट कार्ड जारी किया जाना है। महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा की सुविधा देने की योजना में किये गये बदलाव से अब पिंक टिकट का सिस्टम खत्म हो जायेगा और जो रहेगा वह सिर्फ दिल्ली में रहने वाली महिलाओं के लिए है। जाहिर है, इससे एनसीआर के गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद और गुड़गांव में रहने वाली महिलाओं को दिल्ली सरकार की इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा। कहने की जरुरत नहीं है कि इससे महिलाओं के प्रति पार्टी समूह के नेताओं के रुख का पता चलता है। वैसे भी दिल्ली की बस में यात्रा करने के लिए मुंबई की महिलाएं तो आएंगी नहीं और एनसीआर की महिलाओं को यह सुविधा नहीं देने का सीधा मतलब है उतना ही देंगे जितना मजबूरी है। यह अलग बात है कि हरियाणा और उत्तर प्रदेश में डबल इंजन की सरकार है और सभी सांसद भी भाजपा के ही हैं। इस एक परिवर्तन से आप समझ सकते हैं कि सुविधायें देने के मामले में भाजपा की नीयत कैसी है। अगर मामला नीयत का नहीं है तो सरकारी खजाने का ही होगा और वह ज्यादा चिन्ताजनक है।
दि एशियन एज की खबर के अनुसार महाराष्ट्र में हिन्दी को लेकर विवाद बढ़ गया है और एमएनएस मुंबई की सड़कों पर उतर आया है। इस खबर के अनुसार, शिन्दे सेना के मंत्री रैली में शामिल हुए। उनके साथ धक्का-मुक्की हुई। पुलिस की अनुमति के बिना एक मार्च भी निकाला गया। खबर के अनुसार, रैली के लिए पुलिस की अनुमति के बिना एमएनएस कार्यकर्ताओं ने अपने विरोध प्रदर्शन को लेकर आगे बढ़ने का फैसला किया और मीरा भायंदर में बड़ी संख्या में इकट्ठा हुए। मुख्यमंत्री ने कहा है कि वे रैली के खिलाफ नहीं हैं। खबर के अनुसार, इस मार्च में मराठी लोगों की भारी भागीदारी रही और एमएनएस तथा शिवसेना (यूबीटी) के कार्यकर्ताओं ने इसमें बड़ी संख्या में हिस्सा लिया।



