Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

बिहार

तेजस्वी यादव को न पूरे यादव वोट मिले न पूरे मुस्लिम वोट!

बिहार की जनता समझ गई कि तेजस्वी सबको बेवकूफ बना रहा है, दबंगई और अंहकार इनके चेहरे पर लिखा था जिसे बिहारी वोटरों ने पढ़ लिया!

दयाशंकर शुक्ला ‘सागर’-

बिहार के नतीजे न चौंकाने वाले हैं और न अप्रत्याशित हैं। इतनी सीटें पाने की उम्मीद तो खुद बीजेपी नेतृत्व को भी नहीं थी। अमित शाह 160 की उम्मीद कर रहे थे। बिहारियों ने जिस बंपर ढंग से एनडीए को जिताया उससे साफ है इस बार जात-पात से ऊपर जाकर वोट पड़े।

नतीजे देखकर तो लगता है कि तेजस्वी यादव को न पूरे यादव वोट मिले न पूरे मुस्लिम वोट। तेजस्वी पर किसी ने यकीन नहीं किया। बाप के जंगलराज का भूत बेटे के सिर पर बेताल की तरह बैठा रहा। घबरा कर तेजस्वी ने हर घर सरकारी नौकरी देने का हवा-हवाई वादा कर दिया। इसके लिए तेजस्वी को सरकारी कर्मचारियों को जितना सालाना वेतन देना पड़ता उतना तो पूरे बिहार का सालाना बजट भी नहीं है।

बिहार की जनता समझ गई कि ये आदमी सबको बेवकूफ बना रहा है। इनसे कुछ नहीं होगा। दबंगई और अंहकार तेजस्वी यादव के चेहरे पर लिखा था जिसे बिहारी वोटरों ने पढ़ लिया। कांग्रेस को तो खैर बिहारी कहीं गिनती में नहीं रखते।

बिहारियों के सामने दूसरा विकल्प था-एनडीए। मोदी उन्हें हर महीने फ्री में राशन दे रहे हैं। विधवाओं को हर महीने पेंशन मिल रही है। गरीबों के फ्री में पीएम आवास योजना के तहत कच्चे पक्के मकान बन रहे हैं। हाईवे बन रहे हैं। नई ट्रेने चल रही हैं। मॉल बन रहे हैं। और चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री महिता रोजगार योजना के तहत महिलाओं के खाते में दस हजार रुपए आ गए।

बिहार में कुल पांच करोड़ वोटर हैं। जिनमें करीब डेढ़ करोड़ महिलाएं हैं। इन महिलाओं और उनके घरवालों ने एनडीए को वोट दिया। तो एनडीए के खाते में तीन, सवा तीन करोड़ वोट तो ऐसे ही चले गए। अगड़े, पिछड़े, अति पिछड़े सारे वोट मोदी-नीतीश कुमार के नाम पर पड़े।

बिहार के नतीजे संदेश देते हैं कि मोदी की साख बरकरार है। कम से कम उत्तर भारत की गरीब जनता के वोटों पर उनका एकछत्र राज है। नीतीश बाबू ने शराबबंदी कर सड़क छाप गुंडई पर काफी हर तक काबू पा लिया है। सड़क के शराबियों से लड़कियां खुश हैं और वे अब रात में भी पटना की सड़कों पर चाट पकौड़ी खा सकती हैं। और कैसा सुशासन चाहिए आपको?


प्रशाान्त कुमार की सबसे बड़ी कमी उनका ब्राह्मण सुलभ अहंकार है

प्रशान्त कुमार बहुत काबिल चुनाव मैनेजर हो सकते हैं लेकिन नेतृत्व का गुण उनमें बिलकुल नहीं है। वह अगर बिहार में 2030 में विधानसभा चुनाव लड़ेंगे तो भी उनकी पार्टी की यही हालत होगी। प्रशान्त किशोर के इरादे चाहे कितने नेक हों लेकिन वे यह उम्मीद नहीं कर सकते कि उनके साथ जो लोग जुड़ेंगे उनके इरादे भी उतने ही नेक होंगे। असहयोग आंदोलन के दौरान गांधी जी ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं और जनता से एफीडेबिट लेकर अहिंसा का लिखित वचन लिया था। फिर भी हिंसा हुई। चौरीचौरा में तो भीड़ ने थाने को जला दिया। हंटर कमीशन ने उनसे पूछा कि आपने यह कैसे उम्मीद कर ली कि हर आदमी आपकी तरह अहिंसा के लिए प्रतिबद्ध होगा। तब गांधी ने हंटर कमेटी के सामने स्वीकार किया कि उनसे ‘हिमालय जैसी भूल’ हो गई।

प्रशाान्त कुमार की सबसे बड़ी कमी उनका ब्राह्मण सुलभ अहंकार है। जिस तरह वह अपने वोटरों, कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को ज़लील कर रहे थे उससे साफ था कि न केवल बिहार बल्कि देश के किसी राज्य में उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है। भारत में जो जितना शातिर आदमी होगा वह उतना बड़ा और लोकप्रिय नेता होगा। शातिर बनने के लिए आपको पब्लिक के सामने अति विनम्र और बेशर्म बनना होगा। राजनीति में तो वोट के लिए गधे को भी बाप बनाना पड़ता है। अच्छे लोग चाहे वे कितने सच्चे क्यों न हों, उनके इरादे चाहे कितने नेक हो, जनता उन्हें पसंद नहीं करती। पीठ पीछे जनता को दोनों हाथों से लूटो लेकिन उनके सामने विनम्र बने रहो। यही भारत की राजनीति में सफलता का मंत्र है। प्रशांन्त बिहार में रुकेंगे या राजनीति से तोबा कर लेंगे? मैं नहीं जनता। लेकिन राजनीति उनके बस की नहीं है। वह एक सलाह के करोड़ों रुपए लेते हैं लेकिन यह सलाह मैं उन्हें बिलकुल मुफ्त में दे रहा हूं।


सुधीर राघव-

बिहार ने खुलकर बता दिया है कि पलायन, रोजगार और सुराज उनके लिए कोई मुद्दा नहीं है। बिहारियों का सबसे बड़ा धेय है, अनंत सिंह जैसे रंगदारों और गुंडों की जीत सुनिश्चित करना।

जनता के सुराज का सपना, रोजगार और पलायन जैसी बातें उनके लिए कोई मायने नहीं रखतीं। असल में जिसे पलायन कहकर बदनाम किया जा रहा है, वह उनका देशाटन है। ट्रेनों में ठुंसकर, लटककर छठ पर लौटना उनका एडवेंचर है। उसमें कोई खलल स्वीकार्य नहीं।

रोजगार बिहार के लिए कोई जरूरत ही नहीं है। रोजगार तो उन्हें पंजाब, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर – उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के दुर्गम इलाकों में भी मिल जाता है, जहां कोई और काम करके राजी नहीं होता।

बिहार की महिलाओं के लिए चुनाव के समय मिले दस हजार रुपए ही भविष्य की सबसे बड़ी हकीकत हैं। इस रुपया के आगे-पीछे उन्हें कुछ भी सोचने की जरूरत नहीं है।

सोचने के लिए प्रदेश के रंगबाज नेता हैं न! जो विधानसभा में भी खड़े होकर कह सकता हो कि ‘बाहर गिराना चाहिए।’

… स्त्री कल्याण की ऐसी अवधारणा तो कभी जेपी, डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद भी न सोच पाए थे। चुनाव के समय 10 हजार रुपया और ‘बाहर गिराना’ स्त्री कल्याण की इतनी उच्चतम अवधारणा मगध की महान भूमि पर ही संभव है। इसके आगे कौशल, अवध, हस्तिनापुर, कैकेय, किष्किंधा सब नतमस्तक हैं।

प्रशांत किशोर तुम अभी किशोर ही निकले, जवान न हो पाए! इसलिए पूरा बिहार घूमकर भी तुम बिहार को नहीं समझ सके।

वैसे भी बिहार घूमने से समझ नहीं आता। घूमकर कैसे समझोगे? बिहार का मन तो खुद बाहर बसा है। बिहार को बाहर से समझो, जैसे मोदी समझता है! पंजाब के गांव का छोटे से छोटा जमींदार भी बिहार को समझता है, भले ही वह कभी बिहार न गया हो। गुजरात का एक एक फैक्ट्री वाला, दुकान वाला, चाय की पटरी वाला भी बिहार को समझता है और प्रशांत किशोर पूरा बिहार घूमकर भी बिहार को नहीं समझ सका।

प्रशांत जिस दिन तुम बिहार को समझ लोगे, उस दिन किशोर से जवान हो जाओगे! अगर बिहार में नेता ही बनना है तो रंगबाज हो जाओगे।

मुझे लगता है प्रशांत कि अब तुम्हें भी रोजगार के लिए किसी दूसरे राज्य की कंपनी या राजनैतिक पार्टी को कंसल्टेंसी सेवाएं ही देते रहना होगा! दूसरे राज्यों में बिहारियों के लिए बहुत रोजगार है। इसलिए बिहार में रोजगार और सरकारी नौकरियां पैदा करने की कोई जरूरत नहीं है! बिहार की जनता ने यह संदेश तुम्हारे मुंह पर चिपका दिया है! अब चैन से बैठो!


संबंधित खबर…

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन