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बिहार

बीजेपी को भी नीतीश कुमार से सीखना चाहिए, पहला सबक तो यही है कि छवि साफ सुथरी रखनी है!

समरेंद्र सिंह-

अब कह सकते हैं कि कोई मुकाबला ही नहीं था। नीतीश कुमार जी के पक्ष में लहर थी। जो मुकाबला दिख रहा था वो इसलिए कि दिल्ली-एनसीआर में पत्रकारों और बुद्धिजीवियों का एक धड़ा ऐसा चाह रहा था कि नीतीश कुमार चुनाव हार जाएं और यही दिखा रहा था कि वो चुनाव हार रहे हैं। मानना पड़ेगा कि ये धड़ा अब भी बहुत प्रभावी है। भ्रम तो फैला ही देता है। खैर, जनता ने ये भ्रम एक बार फिर दूर कर दिया है।

जैसा कि मेरे मित्र सुकेश रंजन जी ने बिहार दौरे के बाद बताया कि इस बार चुनाव के केंद्र में नीतीश कुमार जी ही थे। नतीजे भी यही गवाही दे रहे हैं कि नीतीश कुमार को बचाने के लिए बिहार की जनता ने दिल खोल कर वोट दिया है। नीतीश पर जनता का विश्वास बहुत गहरा है।

तेजस्वी यादव और राहुल गांधी को बहुत कुछ सीखना चाहिए। तेजस्वी यादव के लिए तो ये अस्तित्व का सवाल है। चुनाव कैसे लड़ा जाता है और जनता का विश्वास कैसे जीता जाता है उन्हें ये सीखना होगा। जब ऐसे वादे किए जाते हैं, जिन्हें पूरा करना संभव ही नहीं है तो अविश्वास बढ़ जाता है। वही हुआ। उन्होंने ऐसे वादे किए और ऐसे नारे गढ़े जिन पर जनता ने भरोसा नहीं किया। बल्कि अविश्वास और गहरा हो गया।

बीजेपी को भी नीतीश कुमार से सीखना चाहिए। पहला सबक तो यही है कि छवि साफ सुथरी रखनी है। भ्रष्ट नेता और मूर्ख नेता छवि खराब करते हैं। बचना चाहिए। इस बार तो नीतीश कुमार जी ने बचा लिया। अब भी नहीं सुधरे तो आगे कौन बचाएगा?

पीके और जनसुराज के नेताओं के लिए भी बड़ा सबक है। विकास जरूरी है। आर्थिक सुधार जरूरी हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य जरूरी हैं, लेकिन सामाजिक क्रांति, सामाजिक सुधारों के साथ। कम शब्दों में जाति और धर्म का सियासत में अपना महत्व है। भारतीय समाज में हिस्सेदारी और भागीदारी के सवाल को खारिज करके या नजरअंदाज करके राजनीति नहीं हो सकती है।

और हां, विनम्र होना तो बहुत जरूरी है। खुद को महान और जनता को मूर्ख समझने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। पीके जवान हैं, उम्र बहुत है, अपने में और अपनी रणनीति में सुधार करेंगे तो आगे कुछ रच सकेंगे, वरना नेता बनने की चाह में न जाने कितने खप गए। ये भी खप जाएंगे।

अंत में, इस शानदार जीत के लिए नीतीश कुमार जी और नरेंद्र मोदी और जेडीयू और बीजेपी की पूरी टीम को एक बार फिर बहुत-बहुत बधाई! जय हो!!


हार जीत लगा रहता है, लेकिन कोशिश तो करनी ही चाहिए। हार के डर से कोशिश नहीं करने वाला इंसान कुछ खास रच नहीं सकता। पीके ने कोशिश की, लेकिन मुकाबला जैसे जैसे आगे बढ़ा वो पिछड़ते चले गए। फिर भी मुझे लग रहा था कि जन सुराज को 7 से 10 प्रतिशत के बीच वोट मिल सकता है। और भविष्य की नींव तैयार हो सचती है। मगर ऐसा नहीं हुआ।

मतलब मेरा आकलन गलत था। जन सुराज का प्रदर्शन बहुत खराब रहा। कुछ समय पहले जन सुराज के एक नेता से बात हो रही थी तो वो बदलाव को लेकर काफी उत्साहित थे तो मैंने उन्हें आगाह किया था। मैंने कहा कि असर होगा लेकिन कोई बदलाव नहीं होगा, वो थोड़ा नाराज हुए। फिर भी मैंने उनको कहा कि पीके के पास उम्र है और वो जमीन तैयार कर रहे हैं। आपके पास समय है क्या?

दरअसल, पीके ने अपने आसपास लोगों में जितनी उम्मीद जगाई, उतनी उम्मीद वो जमीन पर जगाने में नाकाम रहे। कारण कई हो सकते हैं। एक बड़ा कारण तो वो कैंपेन है जो सकारात्मक से धीरे धीरे नकारात्मक होता चला गया। वो जनता पर ही अहसान जताने लगे। जैसे धरती पर भगवान उतर आया हो। फिर उन्होंने केजरीवाल मॉडल को अपना लिया। दूसरों को काटने लगे, छोटा करने लगे। केजरीवाल के उस मॉडल की पहले ही हवा निकल चुकी है।

दूसरा बड़ा कारण जंगलराज का भय है। यादव और मुसलमान छोड़ दें तो लोग अब भी लालू यादव जी की आहट से डरते हैं। मेरा जन्म बिहार में हुआ है। बचपन का एक हिस्सा वहां बीता है। उसके बाद भी लगातार बिहार आता जाता रहा हूं।

1998 में कॉलेज के एक दोस्त के बड़े भाई की शादी में शामिल होने के लिए बिहार जा रहा था। ट्रेन लेट हो गई। दोपहर की जगह पटना रात में पहुंची। मुझे मुजफ्फरपुर जाना था। रास्ता पूछने के लिए रेलवे स्टेशन के बूथ से दोस्त के घर फोन किया। दोस्त के बड़े पिता जी ने फोन उठाया, रास्ता बताने के साथ उन्होंने कहा बउआ सवेरे आना। अभी सेफ नहीं है। वेटिंग रूम में ही रहना। रात प्लेटफॉर्म पर बितानी पड़ी। ये भय है।

बिहार में इमरजेंसी नहीं हो तो लोग अंधेरा होने के बाद निकलते नहीं थे। अपराध ज्यादा था। साधन कम थे। रास्ते गड़बड़ थे। तनख्वाह भी देर से आती थी। अपहरण उद्योग था। इसलिए सक्षम मां-बाप बच्चों को बाहर भेज देते थे। आज भी बहुत से लोग उस माहौल की आशंका मात्र से कांपने लगते हैं।

पीके उम्मीद नहीं जगा सके और जैसे जैसे मतदान करीब आया बिहार के लोगों पर डर हावी हो गया। इस डर ने लोगों को नीतीश की अगुवाई वाले एनडीए की ओर धकेल दिया।

फिर शराबबंदी के खिलाफ बयान भी एक मूर्खतापूर्ण बयान था। शराबबंदी एक सही फैसला है। इससे बाहर का माहौल ठीक हुआ है। और जो पीता है, वो डरा रहता है। डराता नहीं है। डर डर कर पीता है। महिलाओं के लिहाज से शराबबंदी का फैसला बेहतर है। उनकी जिंदगी सुधरी है। कुछ लोग खासकर सभ्रांत लोग नशेड़ियों के हवाले से तर्क देकर इसका विरोध करते हैं। ज्यादातर तर्क बचकाने हैं। पीके के उस एक बयान ने जनसुराज की लंका लगाने का काम किया है। डर बढ़ाने का काम किया।

कम शब्दों में नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता, सुशासन और लाभकारी योजनाओं के साथ जंगलराज का भय – कुछ बड़े फैक्टर साबित हुए।

डर से अधिक ताकतवर इमोशन कोई नहीं। हम सब जानते हैं कि 70-80 प्रतिशत सांप जहरीले नहीं होते हैं। मगर उनको देखते ही शरीर में जो डर उत्पन्न होता है वो भागने या फिर मारने को प्रेरित करता है। बिहार की जनता में जंगलराज का भय कुछ ऐसा ही है।

मुझे लगता है कि 21वीं सदी में जन्में वोटरों का अनुपात 20वीं सदी में जन्में वोटरों की तुलना में जितना बढ़ेगा जंगलराज का असर उतना घटेगा। गैर एनडीए दलों की संभावनाएं उतनी बढ़ेंगी, बशर्ते वो जनता के बीच लगातार काम करें।

तेजस्वी यादव और पीके को सबक मिला है। राहुल गांधी इन सबसे ऊपर उठ चुके हैं। जनता भी मान चुकी है कि गदहा को बहुत सीखाने से वो घोड़ा नहीं बन जाएगा। लेकिन तेजस्वी और पीके के मामले में ऐसा नहीं हो। वो सीख कर काम करेंगे तो लाभ होगा, हताश या निराश हो कर बैठ जाएंगे या फिर जनता को दोष देंगे तो घाटा उनका ही है। जनता जो विकल्प मौजूद होगा, उसमें से अपने लिए बेहतर ही चुनेगी।


मेरा और #LiveCities का बहिष्कार करने वाली पार्टी को बिहार की जनता ने निपटा दिया है. बहुत-बहुत धन्यवाद बिहार. मेरे अनुमान और जनता की नब्ज पढ़ने में की गई मेहनत का मजाक उड़ाने वाले भी औंधे मुंह गिरे हैं. इसमें कई मेरे अपने पेशे के दूसरे भी हैं, जो रोज कांटे की लड़ाई और महागठबंधन की जीत बता रहे थे.
आज सुबह जब घर से कार्यालय के लिए निकला था, तो मन सशंकित था, लेकिन विश्वास पूर्ण था अपने गणित पर. यह भी तय कर रखा था कि यदि अनुमान का अंतिम फलाफल 95 प्रतिशत से कम रहा, तो आगे पोलिटिकल रिपोर्टिंग और एनालिसिस छोड़ देंगे. पहले की तरह सिर्फ क्राइम रिपोर्टिंग करेंगे. लेकिन, आप सबों ने ऐसा नहीं होने दिया. आगे भी सच बताने की जिद है, बताते भी रहेंगे, चाहे जिसको अच्छा-बुरा लगे. अंत में, मेरे उन गुरुओं का वंदन, जिन्होंने सच पढ़ने का तरीका हमें बताया है.

-ज्ञानेश्वर वात्स्यायन


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