संजय कुमार सिंह
बिहार में चुनाव है, चाचा नेहरू के जन्म दिन, बाल दिवस पर दूसरी दीवाली। प्रधानमंत्री बिहार जीतने में व्यस्त हैं (दि एशियन एज)। कुछ अखबार चुनाव प्रचार कर रहे हैं। प्रचार वाली कई खबरें हैं, नुकसान वाली कम, चुनावी खबर हिन्दुस्तान टाइम्स और द टेलीग्राफ में लीड है। ट्रम्प टैरिफ से निर्यात 12 प्रतिशत कम होने की खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में लीड है। द हिन्दू की सेकेंड लीड के अनुसार, सितंबर में सेवा क्षेत्र में मंदी के कारण व्यापार घाटा बढ़कर 93 प्रतिशत (जी हां, यह टाइपिंग की गलती नहीं है) हो गया है। इसका कारण यह है कि महीने के दौरान निर्यात के मुकाबले आयात बहुत ज्यादा रहा। हालांकि, आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के बीच व्यापार घाटा 2.3 प्रतिशत कम हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने स्वीकार किया है कि जज से संबंधित उसका निर्णय सरकार की मांग पर बदला। संबंधित जज उस पीठ के भाग हैं जिसने कर्नल कुरैशी के मामले में मध्य प्रदेश के मंत्री के खिलाफ आदेश दिए थे। इस तरह, आज यह कोर्ट पर सरकार के दबाव का दूसरा मामला है। पहला हरित पटाखों की अनुमति है जो कई अखबारों की लीड है। दोनों खबरें बिल्कुल अलग दो अखबारों में छपी हैं। कल ही मैंने लिखा था कि अखबार एक जैसी खबरें एक साथ छापने का बहुत मामूली, जरूरी और सामान्य काम भी अब नहीं करते हैं। एक खबर से अदालत के मामले में सरकार के हस्तक्षेप की जानकारी मिलेगी जबकि दोनों के एक साथ होने से कोई शंका नहीं रह जाएगी और अदालती कामों में सरकारी हस्तक्षेप से कई ग्रीन चिट के राज भी समझ में आ जाएंगे। भले वह अलग मामला है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, आईपीएस अफसर की आत्महत्या के मामले में सरकार से लोहा ले रही उनकी आईएएस पत्नी अमनीत पी कुमार और इनके भाई व पंजाब के आप विधायक अमित रतन के खिलाफ भी एफआईआर हुई हैं। यह एएसआई संदीप कुमार लाठेर के आरोपों के आधार पर है। संदीप ने पूरन कुमार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर खुदकुशी कर ली थी। आज यह खबर नवोदय टाइम्स में भी है। अदालत पर सरकारी दबाव की आज की खबर के बाद दोनों पक्षों को अदालत के भविष्य के फैसले पर शक रहेगा और यह स्थिति देश में अराजकता बढ़ाने वाली होगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा के मुंहफट सांसद निशिकांत दुबे को उनकी ‘‘अत्यधिक गैर जिम्मेदाराना टिप्पणियों’’ के लिए फटकार लगाते हुए कहा था कि इनमें शीर्ष अदालत और उसके न्यायाधीशों पर आक्षेप लगाकर ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति झलकती है। साथ ही, इनमें संवैधानिक अदालतों की भूमिका और संविधान के तहत उन्हें सौंपे गए कर्तव्यों और दायित्वों के बारे में अज्ञानता भी दिखाई देती है। निशिकांत दुबे ने सर्वोच्च न्यायालय पर देश को अराजकता की ओर धकेलने तथा उस समय के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना पर गृहयुद्ध भड़काने का आरोप लगाया था। इससे पहले दुबे ने नेपाल में राजशाही को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया था। एकस पर उन्होंने लिखा था, कांग्रेस की विदेश नीति परिवार वादी ,भारत इसका ख़ामियाज़ा भुगत रहा है। दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र आज ख़त्म हो गया। निशिकांत दुबे यहीं नहीं रुके। उन्होंने यह भी कहा, “अगर नेपाल जैसी स्थिति भारत में बनी तो सबसे पहले गांधी परिवार देश छोड़कर जाएगा। इसके बाद परिवारवादी पार्टियों के नेता जैसे उद्धव ठाकरे, अखिलेश यादव, स्टालिन, लालू प्रसाद और ममता बनर्जी भी नजर नहीं आएंगे। सभी के मकान और दुकान जलाए जाएंगे और उन्हें दूसरे देशों में शरण लेनी पड़ेगी।” अब मुझे लगता है कि भाजपा और उसके लोगों को अपने काम और स्थितियों के मद्देनजर देश में अराजकता फैलने का अंदेशा है। दुबे जैसे लोग इसके लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश कर रहे हैं।
नवोदय टाइम्स में आज एक और महत्वपूर्ण खबर है जो किसी और अखबार में आज इतनी प्रमुखता से नहीं छपी है। इस खबर के अनुसार, दिल्ली में ट्रैफिक जाम के कारण दो किलोमीटर का सफर तय करने में लोगों को दो घंटे लगे। इसमें कहा गया है, दीवाली से पहले बुधवार शाम दिल्ली की सड़कों पर लोगों को भारी जाम का सामना करना पड़ा। गिफ्ट देने और खरीदारी के लिए घरों से निकले लोगों के साथ-साथ दफ्तरों से लौट रहे कर्मचारियों की भीड़ ने राजधानी की सड़कों पर अफरातफरी मचा दी। ट्रैफिक जाम इतना गंभीर था कि कुछ इलाकों में सेना के जवानों को भी सड़क पर उतरना पड़ा। सेना के कुछ अधिकारी और जवान भी जाम में फंस गए थे। इसके बाद उन्होंने मोर्चा संभालते हुए ट्रैफिक को निकालने में मदद की। दीवाली पर हरित पटाखे की सुप्रीम अनुमति अमर उजाला से लेकर देशबन्धु, नवोदय टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया और द हिन्दू में लीड है। पिछली बार आतिशबाजी पर रोक थी लेकिन भाजपा नेताओं ने भी आतिशबाजी की और किसी कार्रवाई की खबर नहीं है। उसमें मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंके जाने तथा उसके बाद की राजनीति के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने हरित पटाखों की अनुमति दी है तो उसके मायने हैं और यह सामान्य खबर नहीं है। लेकिन छपी सामान्य खबर की ही तरह है। चुनाव के समय यह निश्चित रूप से सरकार का प्रचार है पर अब वह सब मुद्दा नहीं है। चुनाव आयोग अपने काम से अपना रुख बता चुका है। कुल मिलाकर, दीवाली करीब है, प्रदूषण बढ़ रहा है, सुप्रीम कोर्ट ने हरित पटाखे चलाने की इजाजत दे दी है और प्रधानमंत्री बिहार जीतने में व्यस्त हैं। अखबारों ने अपने हिसाब से खबर दी है। इसमें चापलूसी दूसरे शब्दों में ताली-थाली बजाने में कोई संकोच नहीं है। अमर उजाला के पहले पन्ने पर विज्ञापन के कारण एक ही खबर है और वह असॉल्ट राइफल में लगने वाले नाइट साइट उपकरण की खरीद से संबंधित है। शीर्षक है, तारों की रोशनी में भेद सकेंगे लक्ष्य, 659 करोड़ का अनुबंध। मैंने खबर से समझने की कोशिश की कि इसमें स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत कितना है। खबर के अनुसार, रक्षा मंत्रालय ने बताया कि इस खरीद में 51 प्रतिशत से अधिकर स्थानीय सामग्री शामिल है। इसे रक्षा निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी ने 2019 का लोकसभा चुनाव घुसकर मारूंगा के नारे से जीता था। हालांकि, वोट चोरी के आरोपों और पुरानी खबरों के आलोक में यह जीत संदिग्ध है पर छह साल बाद इस खरीद से ‘घुस कर मारने’ के समय भारत की तैयारियों और हालात का अंदाजा लगाया जा सकता है। आपरेशन सिन्दूर का जो हुआ सो अपनी जगह है और आज अमर उजाला ने इस अनुबंध से मिलने वाली मजबूती भी गिनाई है। हरित पटाखों की खबर दूसरे पहले पन्ने पर है। उपशीर्षक में सुप्रीम कोर्ट की शर्तें हैं। इनमें प्रमुख है, दीवाली और एक दिन पहले सुबह छह से सात और रात आठ से दस बजे तक पटाखे चलाने की अनुमति है। देखना है इसका कितना पालन होता है। (जारी)
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मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


