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सियासत

भाजपा से बंधा नहीं रहेगा आरएसएस!

कृष्णपाल सिंह-

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की हिन्दुओं के सर्वमान्य मार्गदर्शक संगठन के रूप में अपने को स्थापित करने की व्यग्रता छुपी नहीं रह गई है। उसके बदले तौर-तरीकों व सोच में इसको परिलक्षित किया जा रहा है। इसी योजना के तहत संघ ने अपने मुख्यालय पर पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को जो अब दिवगंत हो चुके हैं संघ के मंच से संबोधित करने के लिए बुलाया था। प्रणव मुखर्जी कांग्रेस के थे इसलिए कांग्रेस ने बड़ी कोशिश की थी कि प्रणव मुखर्जी इस आमंत्रण को अस्वीकार कर दें लेकिन प्रणव मुखर्जी पार्टी की मंशा को अनदेखा करके संघ के कार्यक्रम में सम्मिलित हुए और उनके मंच से अपने विचार भी रखे।

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने प्रणव मुखर्जी के अपने यहां आगमन को अपनी एक बड़ी नैतिक उपलब्धि के रूप में संजोया। इस क्रम को और आगे बढ़ाने के लिए संघ ने राहुल गांधी को भी अपने मंच पर आने के लिए निमंत्रित किया लेकिन राहुल गांधी को यह बिल्कुल भी स्वीकार नहीं हुआ और उनके मामले में संघ को निराश हो जाना पड़ा।

पर सर्व स्वीकार्यता पाने की संघ की यह ललक अभी भी कायम है जिसके पीछे उसका बड़ा रणनीतिक दांव है। सो गत दिनों संघ ने नागपुर में अपने मुख्यालय पर आयोजित वनवासी सम्मेलन में कांग्रेस के एक समय आदिवासी चेहरा रहे अरविंद नेताम को बुलाने में सफलता प्राप्त कर ली। संघ का कद उसकी इस विशाल हृदयता से बहुत ऊंचाई छू सकता है जो इसके पीछे संघ के उद्देश्य के अनुरूप होगा। कोई बड़ी बात नहीं है कि इस उद्देश्य की पूर्णता के लिए संघ इस धारणा को खत्म करने की दिशा में भी कोई बड़ा कदम उठाये कि वह किसी पार्टी विशेष को राजनीति में पोषित करने वाला संगठन है। इस दिशा में फिलहाल संघ का एक निश्चय सामने आया है कि वह अपने प्रचारकों की सेवाएं भारतीय जनता पार्टी में संगठन मंत्री के रूप में देने की परंपरा को खत्म करेगा।

सभी दल उसके अपने हैं, यह साबित करके ही वह हर दल में अपने लिए सकारात्मक भाव पैदा करने में सफल हो सकता है। इस कवायद में संघ भारतीय जनता पार्टी से किस हद तक दूर जाने का उपाय करेगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है।

लेकिन फिलहाल बात संघ के वनवासी सम्मेलन की। इसमें मोहन भागवत ने जो बौद्धिक दिया उसके निहितार्थों की सूक्ष्म पकड़ की जाये तो संघ प्रमुख की इसमें बहुत ही विवेक पूर्ण सम्मति झलकती है जो अत्यंत सुखद है। साथ ही साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्यक्तिवादिता को एक बार फिर उन्होंने झटका दिया है जिसके चलते मोदी स्वयं को इस पृथ्वी पर अवतरित दैवीय पुरुष के रूप में देखने के मनोरोग से ग्रस्त होकर सारी संस्थाओं और गुणी व्यक्तियों की उपयोगिता को ठिकाने लगाने में कसर नहीं छोड़ रहे। हालांकि वर्तमान दौर में वैचारिक विषैलेपन को पोर-पोर में समा चुकी एक बड़ी जमात देश में तैयार हो गई है जो संघ प्रमुख के बौद्धिक की व्याख्या अपने चश्मे से प्रस्तुत करके अर्थ का अनर्थ करने में जुटी हुई है।

संघ प्रमुख ने अपने उक्त बौद्धिक में द्वितीय विश्व युद्ध के समय ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विस्टेन चर्चिल से जुड़ा एक प्रसंग सुनाया। संघ प्रमुख ने इस प्रसंग में बताया कि हिटलर की लदंन में भीषण बमबारी के कारण ब्रिटेन हिल गया था। चर्चिल का मंत्रिमंडल इसके जारी रहने पर देश में महाविनाश की कल्पना करके सिहर रहा था। उसने चर्चिल को मशविरा दिया कि देश पर से इस विनाशलीला को टालने के लिए हिटलर से कोई संधि कर ली जाये इसी में गनीमत है। अपने मंत्रिमंडल के इस प्रस्ताव की जानकारी देने के लिए चर्चिल किंग के पास गया। उन्होंने कहा कि आप उन लोगों के बिहाफ पर काम कर रहे हैं जिन्होंने आपको चुना है। इसलिए उनकी राय इस बारे में क्या है इसे जानकर आप कोई फैसला करें।

किंग की राय का मर्म चर्चिल को भी समझ में आ गया। इसके बाद चर्चिल ने लोकल ट्रेनों में यात्रा करके आम लोगों से वार्ता की जिनका कहना था कि स्वाभिमान के लिए इस लड़ाई को परिणाम की परवाह किये बिना जारी रखना होगा। अगर हम हार भी जाते हैं तो हमारी आने वाली पीढ़ियां इस लड़ाई को लड़ेंगी और अन्ततोगत्वा हम जीतेंगे। इस रायशुमारी के बाद चर्चिल ने संधि करने की बजाय पूरे दम से लड़ने का एलान कर दिया। इसको लेकर उसका अभिनंदन हुआ जिसमें लोगों ने कहा कि हमारा प्रधानमंत्री शेर है तो चर्चिल ने कहा कि शेर मैं नहीं आप लोग हैं जिनकी दहाड़ मेरे मुंह से निकली है। संघ प्रमुख ने कहा कि इस कहानी की नसीहत है कि समाज में असली बल किसी देश के समाज का बल होता है।

देखा जाये तो संघ प्रमुख ने इस बौद्धिक में एक तो जनता की मंशा के परे जाकर संघर्ष विराम करने के लिए मोदी को आइना दिखाया। दूसरे उन्होंने समाज के बल को असली बताकर मोदी के व्यक्तिवाद को बुरी तरह झिड़क डाला।

अपने बौद्धिक में मोहन भागवत ने हिन्दू अभिमान के नाम पर हो रही उद्दंडता को भी आड़े हाथ लिया। होना तो यह चाहिए था कि संघ प्रमुख ने इस सिलसिले में जो बातें कहीं सरकार में बैठे होने के नाते व्यवस्था की स्थिरता के लिए उन्हें सत्ताधारी नेताओं और भाजपा के नेतृत्व द्वारा कहा जाता लेकिन उद्दंडता और अराजकता को मौन सहमति और प्रोत्साहन देकर देश का नेतृत्व और सत्तारूढ़ पार्टी स्थिति बिगाड़ने की मूढ़ता कर रही है। मोहन भागवत ने बहुत ही तार्किक ढंग से भूमिका बांधते हुए इस सिलसिले में कहा कि एक वर्ग की भलाई में दूसरे वर्ग के नुकसान को न देखने से असंतोष पैदा होता है जो जायज है।

जाहिर है कि इसमें पिछली सरकारों द्वारा अपनाई गई तुष्टीकरण नीति से हिंदु समाज में पैदा होते रहे आक्रोश की ओर इशारा किया लेकिन इसके आगे उन्होंने यह जोड़ा कि इस असंतोष और आक्रोश की वजह से समाज के एक वर्ग की दूसरे वर्ग से लड़ाई उचित नहीं है। संघ प्रमुख ने स्पष्ट कर दिया कि अपनी सरकार बन जाने को मौका मानकर बदले की भावना में अंधा होना उन्हें गवारा नहीं है।

निशिकांत दुबे, प्रेम पाठक, विजय शाह और ऐसे लोगों की लंबी फेहरिस्त है जिनकी बदजुबानी भाजपा के नेतृत्व के लिए बहुत प्रिय हो गई है। एक समय था जब प्रज्ञा ठाकुर ने महात्मा गांधी के विरुद्ध बहुत ही अभद्र भाषा में वक्तव्य दिया था तो मोदी का गुस्सा फूट पड़ा था। इसके बाद अनुमान किया गया था कि प्रज्ञा ठाकुर पर कोई कार्रवाई होगी लेकिन प्रज्ञा ठाकुर पांच वर्ष तक बदस्तूर भाजपा की सांसद बनी रहीं क्योंकि इस बीच में मोदी ने ऐसे लोगों की उच्छृंखलता में पार्टी की लौ और तेज करने का ईंधन देख डाला था। इसके चलते ऐसे रणबांकुरों को सिर माथे लेकर प्रमोट करना उन्होंने भाजपा की नीति बना दिया था।

लेकिन अब मोहन भागवत ने कहा कि गाली-गलौच की भाषा का इस्तेमाल करना, भावातिरेक में आतताई बन जाना और प्रतिक्रिया में कानून हाथ में लेकर कुछ भी करने लग जाना उचित नहीं है। कोई भी समझ सकता है कि किसी मुसलमान को पकड़कर उससे जबरन जय श्रीराम बुलवाना और उसकी पिटाई करना, स्कूलों में मुस्लिम बच्चों को हिन्दू बच्चे से थप्पड़ लगवाना, मुस्लिम बस्ती में छतों पर चढ़कर अपने धार्मिक झंडों को लहराने की कोशिश करना और हर जगह मुसलमान को देखते ही हिंसक प्रतिक्रिया करने लग जाना हिन्दुत्व के प्रदर्शन के लिए फैशन बनता जा रहा है हालांकि ऐसा करने वालों की संख्या बहुत कम है पर कानून व्यवस्था का पालन कराने वाली एजेंसियां ऊपर के इशारे के कारण इन मामलों में कोई एक्शन नहीं करती जिससे ऐसी विकृत मानसिकता का प्रसार बढ़ता ही जा रहा है।

मोहन भागवत पहले भी इन कारगुजारियों को निंदित करने के लिए कह चुके हैं कि हिन्दुओं का नेता बनने के लिए ऐसे कृत्य किये जा रहे हैं जो नितांत गलत हैं। वे हर मस्जिद और दरगाह के नीचे मंदिर खोजने की प्रवृत्ति के खिलाफ भी बोल चुके हैं। स्पष्ट है कि ऐसे हिन्दुत्व को टोकना मोहन भागवत अपनी लाइन के रूप में निर्धारित कर चुके हैं जो संघ की छवि के मद्देनजर महत्वपूर्ण है। इसलिए वनवासी सम्मेलन में उन्होंने जो बौद्धिक दिया उसका कोई अर्थ नहीं है। यह तथाकथित अपने लोगों को आत्मनिरीक्षण के लिए तत्पर करने का उनका सोचा समझा स्टैण्ड है।

इस बीच भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के लिए नरेंद्र मोदी और संघ के विचारों में अंतर्विरोध खत्म नहीं हुआ है क्योंकि मोदी स्वतंत्र विचारों वाले पार्टी के तपे-तपाये किसी नेता को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का संघ का निर्देश ठुकरा चुके हैं जबकि संघ चाहता है कि अपनी कुंठाओं और ग्रन्थियों के कारण मोदी जो कर रहे हैं उससे दूरगामी तौर पर भाजपा और संघ का गंभीर नुकसान होने वाला है। लेकिन पहलगाम के नरसंहार के बाद के घटनाक्रम के कारण मोदी ने स्थितियों को अपनी ओर मोड़ लिया है और संघ की अवज्ञा के दुस्साहस में उन्हें कोई हिचक नहीं रह गई है।

निरुपाय संघ ऐसी स्थिति में भाजपा के क्रिया कलापों से उदासीन होकर नैतिक चेतना के प्रसार के दायित्व को निभाने के लिए अपने तरीके से जुट पड़ा है। संघ प्रमुख इस दिशा में बीजारोपण कर रहे हैं जिनके कितने प्रभावी परिणाम होंगे यह जानने को प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

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