Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

डीसीएम बृजेश पाठक के आवास पर ‘सुंदरकांड प्रकरण’ पर वरिष्ठ पत्रकार श्याम कुमार का स्पष्टीकरण

Older man with gray hair and mustache wearing glasses, a tan blazer, blue plaid shirt, turquoise patterned tie, and a fuzzy hat, seated by a wooden door.

श्याम कुमार-

‘सुंदरकांड प्रकरण’ पर स्पष्टीकरण

ब्रजेश पाठक के आवास पर आयोजित सुंदरकांड पाठ कार्यक्रम से मैं पुलिस द्वारा रास्ता बंद कर दिए जाने के परिणामस्वरूप भूख, प्यास और कमजोरी के कारण भीषण कष्ट झेलते हुए जिस प्रकार घर लौटा, उस पीड़ा का संक्षिप्त विवरण मैंने फेसबुक पर लिख दिया था। किन्तु मुझे कल्पना नहीं थी कि उस पर इतनी संख्या में महत्वपूर्ण प्रतिक्रियाएं मिलेंगी। अनेक फोन भी मेरे पास आए। लगभग सभी लोगों ने मुझे सलाह दी कि मैं इस भयंकर धूप और गरमी में बाहर न निकलूं। कुछ ने सवाल किया कि मैं ब्रजेश पाठक के यहां कार्यक्रम में गया ही क्यों? एक ने कहा कि अब मुझे शरीर पर अधिक बोझ नहीं डालना चाहिए। विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाओं के कारण मुझे कुछ बातें स्पष्ट करनी पड़ रही हैं।

पहली बात तो यह कि मेरी अवस्था 85 वर्ष है तथा मेरी पत्रकारिता को 65 वर्ष हो रहे हैं। मैं देश का वरिष्ठतम सक्रिय पत्रकार हूं। दूसरी बात, ब्रजेश पाठक के यहां सुंदरकांड पाठ के कार्यक्रम में मुझे नम्रता पाठक जी ने आमंत्रित किया था। वह हमेशा मेरा पिता की तरह इतना सम्मान करती हैं कि मैं उनकी बात नहीं काट सकता और इसीलिए मैं उस कार्यक्रम में गया। किसी ने लिखा कि प्यास लगी थी तो वहां पानी मांग लेते। वैसे तो ब्रजेश जी का लगभग पूरा स्टाफ मुझे पहचानता है, लेकिन उस दिन आयोजन में कोई मुझे नमस्ते तक करने नहीं आया तो मैं पानी किससे मांगता? ब्रजेश जी तो आयोजन के मेरुदंड होने के कारण बहुत अधिक व्यस्त थे।

जहां तक ‘रंगभारती’ के आयोजनों का प्रश्न है, कई दशकों से पूरे देश में वे आयोजन होते आ रहे हैं। ड्राइवर हटा चुका था, इसलिए जब मेरा शरीर शिथिल होने लगा और बाहर जाकर स्वयं दौड़धूप कर सारे इंतजाम कर पाना मुश्किल हो गया तो धीरे-धीरे वे कार्यक्रम बंद हो गए। यहां तक कि बगल वाले नगर कानपुर में लगभग पांच दशकों से संपन्न होने वाला सुविख्यात हास्य-उत्सव ‘गदहा सम्मेलन’ वहां लाजपत भवन प्रेक्षागृह का भाड़ा बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण अब नहीं कर पा रहा हूँ। अब केवल लखनऊ में आयोजित होने वाले ये चार प्रमुख कार्यक्रम शेष रह गए हैं- 23 जनवरी को संपन्न होने वाला उत्तर प्रदेश की वर्षगांठ का कार्यक्रम। वर्ष 1985 में मैंने देश में पहली बार उत्तर प्रदेश की वर्षगांठ मनानी शुरू की थी।

दूसरा आयोजन है एक अप्रैल को अखिल भारतीय स्तर पर होने वाला सुविख्यात ‘घोंघाबसंत सम्मेलन’ नामक हास्य-उत्सव, जिसे वर्ष 1961 में देश के प्रथम हास्य-कविसम्मेलन के रूप में मैंने प्रयागराज में शुरू किया था। तीसरा आयोजन है, 30 मई को हिंदी पत्रकारिता की वर्षगांठ के रूप में आयोजित होने वाला ‘हिंदी पत्रकारिता दिवस’। यह आयोजन मैंने वर्ष 1975 में शुरू किया था। चौथा आयोजन है चार अगस्त को फिल्म-जगत के महानतम पुरुष गायक किशोर कुमार के जन्मदिन का आयोजन। इसे मैंने विद्यार्थी जीवन में वर्ष 1957 में शुरू किया था।

किसी को शराब आदि की लत होती है तो किसी को अन्य कोई। किन्तु मुझे पैतृक परंपरा से प्राप्त समाजसेवा, परोपकार एवं सांस्कृतिक कार्यकलापों की लत रही है। अभी तक इन आयोजनों का व्यय मैं स्वयं वहन किया करता था, इसलिए कोई परेशानी नहीं होती थी। किन्तु कुछ वर्षों से मेरे पास धनाभाव हो जाने से काफी परेशानी होने लगी है। तमाम लोगों ने मुझसे बड़ी रकमें उधार ली थीं, जो लौटाई नहीं। एक सहकारी बैंक में मेरा एकाउंट था, किन्तु उस बैंक पर रिजर्व बैंक की रोक लग जाने से विकट समस्या हो गई। दूध मंगाना तक बंद करना पड़ा। ड्राइवर त्याग देना पड़ा। डॉक्टर ने मुझे स्कूटर चलाने को मना किया, परिणामतः अब कोई व्यक्ति मेरे बहुत पुराने स्कूटर पर बिठाकर मुझे ले जाए तो कहीं जा पाता हूं। नौकर हटा दिया और साफ-सफाई, पोंछा-धुलाई, पेड़ों में पानी देना आदि समस्त प्रकार के घरेलू काम अब मुझे स्वयं करने पड़ते हैं। पैसे के अभाव में कुछ साल आम खाने को भी तरस गया था।

एक बार तो पैसे के घोर अभाव में यह स्थिति हो गई थी कि मैं लेबर चैराहे पर जाकर मजदूरी करने तक की सोचने लगा था। लखनऊ के आयोजनों में अब मेरी कोशिश होती है कि कोई महाशय हाॅल का भाड़ा जमा कर दें, कोई सम्मान-स्मृतिकाओं (मोमेंटो) का भुगतान कर दें, कोई भोजन-पैकेटों की व्यवस्था कर दें, आदि। लेकिन इसमें काफी पापड़ बेलने पड़ते हैं। अनेक समृद्ध लोगों ने ‘रंगभारती’ के कार्यक्रमों में मदद हेतु मंच पर बड़ी-बड़ी घोषणाएं कीं और कहाकि वे ‘रंगभारती’ के कार्यक्रम पहले की तरह शानशौकत से चलाते रहने में पूरा आर्थिक सहयोग प्रदान करेंगे।

लेकिन सच्चाई यह है कि वास्तव में मदद करने के लिए सच्चा मन और बड़ा कलेजा होना चाहिए। मेरे गृहनगर प्रयागराज में मसुरियादीन नामक एक करोड़पति व्यवसायी थे। चूंकि वह करोड़पति थे, इसलिए प्रायः आयोजनों में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाए जाते थे। आयोजन में वह फ्रिज आदि बड़ी-बड़ी चीजें भेंट करने की घोषणा कर दिया करते थे, जिन पर खूब तालियां बजती थीं, लेकिन बाद में जब आयोजक उनके घर घोषणा वाला सामान लेने जाते थे तो वह आज के नेताओं की तरह झांसा दे दिया करते थे।

मैं अपनी वरिष्ठता एवं सम्मान से समझौता नहीं कर पाता, इसलिए अधिक कठिनाई होती है। मंत्रियों के यहां तो उनके अहंकार के आगे सम्मान पा सकना लगभग असंभव होता है। मंत्री सूर्यप्रताप शाही के चाचा रवींद्र किशोर शाही भी मंत्री थे और मेरा सम्मान करते थे। एक बार मैं सूर्यप्रताप शाही के आवास पर गया। वह लोगों से मिल रहे थे। मैं बैठा रहा। फिर वह उठे और कार पर बैठकर चल दिए। मैंने उन्हें फोन किया और इस आचरण के लिए फटकारा। किन्तु मंत्रियों के चरणों पर नित्य हरसमय इतने लोग गिरते रहते हैं कि उनका अहंकारग्रस्त होना, झूठ बोलते रहना तथा झांसा देना उनकी स्वाभाविक क्रिया बन जाती है।

वर्तमान चुनाव-प्रणाली में नेताओं के लिए सिर्फ ‘वोट और नोट’ का महत्व रह गया है। हाल में विधान भवन में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के सुरक्षागार्ड ने मुझे धक्का दे दिया था, जिस पर लोगों में नाराजगी हुई थी। पत्रकार मनोज सामना मुझे लेकर विधानपरिषद में केशव प्रसाद मौर्य के कक्ष में गए। वहां केशव प्रसाद मौर्य ने गार्ड के व्यवहार पर क्षमा मांगने के साथ मुझे किसी दिन अपने आवास पर आने को आमंत्रित किया। उसके बाद उन्हें मैंने दो पत्र लिखे कि वह मिलने का समय बता दें, ताकि मैं आवास पर मिलने आ सकूं। लेकिन उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। केशव प्रसाद मौर्य मेरे गृहनगर प्रयागराज के हैं, तब यह हाल है!

मेरे राष्ट्रवादी होने के कारण अनेक सेकुलरिए एवं मुसलिमजन मुझसे बहुत नाराज हैं। यह भ्रम फैला दिया गया कि मुझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं भारतीय जनता पार्टी से भारी आर्थिक सहायता मिलती है। जबकि दोनों से मुझे कभी एक पैसे की भी सहायता नहीं मिली। राज्यपाल श्री राम नाईक मुझे बहुत अधिक मानते थे, किन्तु उन्होंने भी कभी कोई आर्थिक मदद नहीं की। उन्होंने इतना अवश्य किया था कि जब योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने मुख्यमंत्री को मुझे सलाहकार बनाने के लिए लिखा था, हालांकि मुख्यमंत्री ने उनकी वह बात नहीं मानी थी।

विगत वर्षों में अर्थाभाव आदि के कारण मुझे जो कष्ट और अपमान झेलने पड़े हैं, उनकी लंबी गाथा है। मेरे साथ इतने दुर्व्यवहार हुए कि मेरी आवाज तक नष्ट हो गई, जबकि मैं गायक था। मैंने जिनका भला किया, उनसे भीषण यातनाएं मिलीं। ऐसे तमाम दुखद वृत्तांत हैं, जिनकी इक्का-दुक्का लोगों को ही कुछ जानकारी है। वे सारे वृत्तांत लुप्त ही रह जाएंगे। मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि परोपकार की प्रवृत्ति में मुझे जीवन में सिर्फ तबाही मिली तथा अब यह हाल है कि मदद तो दूर, अपनापन पाने तक को तरसना पड़ रहा है।

मूल खबर…

लखनऊ के बुजुर्ग पत्रकार की आपबीती : बुरी दशा में ब्रजेश पाठक के यहां से लौटा!

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन