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चंद्रग्रहण : धंधे के लिए टीवी और अख़बार कितना अवैज्ञानिक भारत बनाने पर तुले हैं!

ओम थानवी-

कल ढलती रात सूरज की रोशनी से धुर दमकता चाँद देखा। फिर बीच में हम आ गए। यानी पृथ्वी। चाँद पर पृथ्वी की सरकती छाया देखी। बारजे पर जाकर, रात सवा-एक बजे, उतरती छाया के रंग भी देखे।

आधी रात तक तो बच्चे भी कैमरे से खेलते रहे। मैंने कहा — आँख-भर देखो। जिसे जितना भी मिल जाय। यह सौंदर्य किसी भी कैमरे के लिए ‘अनिर्वचनीय’ होगा!

लेकिन हमारे चैनल क्या कर रहे थे? चंद्रमा की दूर-देशों में व्याप्त छवि देखने को टीवी खोला। हमारे ज़्यादातर चैनलों ने “पंडितों” को बिठाल रखा था। वे “ग्रहण-ज्ञान” के नाम पर निपट अंधविश्वास परोस रहे थे।

असली-नक़ली पंडित बेरोकटोक बोले चले जा रहे थे। किसी ऐंकर में न अक़्ल न साहस कि एक बार पूछ ही ले कि इस युग में आपकी अटपटी व्याख्याओं का आधार क्या है?

जो मीडिया रोज़ राशिफल-भविष्यफल बाँचता-बाँटता है, वह “ग्रहण” के वक़्त और क्या करेगा? धंधे के लिए टीवी और अख़बार कितना अवैज्ञानिक भारत बनाने पर तुले हैं!

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