सरकारी विज्ञापनों के खर्च को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। सूचना का अधिकार (RTI) के तहत सामने आई जानकारी के मुताबिक, छत्तीसगढ़ की विष्णु सरकार ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के सिर्फ पहले तीन महीनों में ही मीडिया विज्ञापनों पर ₹18.57 करोड़ रुपये खर्च कर दिए हैं। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर शुरुआती तीन महीनों में इतना खर्च हुआ है, तो पूरे 16 महीने में कुल राशि कितनी होगी?
RTI के जवाब में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, यह राशि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों के प्रचार पर खर्च की गई है। इसमें अखबारों, टीवी चैनलों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स को दिए गए भुगतान शामिल हैं।
विज्ञापन वितरण पर उठे सवाल
इस खर्च को लेकर सबसे बड़ा सवाल विज्ञापन वितरण की पारदर्शिता को लेकर उठ रहा है। RTI में यह भी पूछा गया है कि विज्ञापन किन मानकों के आधार पर दिए गए? क्या इसके लिए कोई स्पष्ट नीति है या फिर मनमाने तरीके से चुनिंदा मीडिया संस्थानों को लाभ पहुंचाया गया?
स्थानीय मीडिया संगठनों और पत्रकारों का कहना है कि विज्ञापन बांटने में ट्रांसपेरेंसी की कमी है। कई छोटे और स्थानीय मीडिया संस्थानों को नजरअंदाज किया गया, जबकि कुछ बड़े और प्रभावशाली संस्थानों को लगातार मोटे पैकेज मिले।
तीन महीने में ₹18.57 करोड़ का मतलब क्या?
अगर सरकार का यही रफ्तार से खर्च जारी रहा, तो अनुमान है कि 16 महीनों में यह राशि ₹90 से ₹100 करोड़ के पार जा सकती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या यह पैसा वास्तव में जनहित की जानकारी देने पर खर्च हो रहा है या फिर सरकार की छवि चमकाने के लिए?
मुख्य बिंदु जो सवाल खड़े करते हैं-
- सिर्फ तीन महीनों में ₹18.57 करोड़ का भुगतान
- विज्ञापन वितरण की स्पष्ट नीति सार्वजनिक नहीं
- छोटे व स्थानीय मीडिया को नजरअंदाज करने के आरोप
- TRP, रीडरशिप और रीच जैसे मानकों की जानकारी नहीं
- सरकारी धन के उपयोग पर पारदर्शिता का अभाव
जनहित या प्रचार मशीन?
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी विज्ञापन जनता को योजनाओं की जानकारी देने के लिए होते हैं, न कि राजनीतिक प्रचार के लिए। लेकिन जिस तरह से भारी-भरकम रकम खर्च हो रही है, उससे यह बहस तेज हो गई है कि सरकारी विज्ञापन अब जनसूचना से ज्यादा सत्ता की ब्रांडिंग का जरिया बनते जा रहे हैं।
अब सवाल सिर्फ खर्च का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है—कि जनता के टैक्स का पैसा आखिर किसे, क्यों और किस आधार पर दिया जा रहा है।
दरअसल छत्तीसगढ़ के जनसंपर्क द्वारा डॉ रवि मित्तल के नेतृत्व में प्रति माह लाखों करोड़ों रुपए उन कथित न्यूज़/टीवी चैनलों को बाँटे जा रहे हैं जिनका ना तो कभी नाम सुने हैं और ना ही वे कभी टीवी पर दिखाई देते हैं।
टीवी न्यूज़ चैनलों के नाम पर छत्तीसगढ़ की जनता की गाढ़ी कमाई वो लोग लूट कर ले जा रहे हैं जिनका छत्तीसगढ़ से कोई संबंध नहीं है,वहीं दूसरी तरफ़ लाखों सब्सक्राइबर वाला छत्तीसगढ़ी यूट्यूबर धक्के खाते घूम रहा है जिसे यह लोग पाँच दस हज़ार का भी विज्ञापन नहीं देते हैं। -कुणाल शुक्ला, आरटीआई एक्टिविस्ट


