देहरादून- उत्तराखंड के देहरादून से पत्रकारों के लिए जिला सूचना विभाग द्वारा जारी एक संदेश वायरल हुआ है। मैसेज में कहा गया है कि माननीय मुख्यमंत्री जी की ओर से सभी मान्यताप्राप्त पत्रकारों के लिए उपहार का जुगाड़ कराया गया है। पत्रकारों से अनुरोध है कि वे अपना उपहार जिला सूचना कार्यालय देहरादून से प्राप्त कर लें।
इस मैसेज को वरिष्ठ पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ जी ने फेसबुक पर शेयर करते हुए लिखा है-
अच्छा हुआ ये दिन देखे बगैर हम पार कर आए. एक तरफ घरों पर उपहार पहुंचाए जाते थे. घर भर जाता था. फिर तय किया कि उनसे उपहार क्यों लें जिन्हें हम देंगे नहीं कभी. तरीका साफ था. लोग पता पूछने के लिए फोन करते हम पता नहीं देते.

फिर वो दिन हासिल किया जब सिर्फ अपनी खरीदी हुई चीज़ें ही आती हैं. लेकिन ऐसे उपहार लेने दफ्तर जाना पड़ेगा कभी सोचा तक न था. किसी की हिम्मत हो जाए ये संदेश भेजने की तो बस समझिए कि आपकी बिरादरी की हैसियत क्या हो गई है.
पोस्ट पर आई कुछ प्रतिक्रियाएं भी पढ़ें….
खुशदीप सहगल-
पत्रकारों का स्वर्णिम काल या भंडारा काल…ये वैसे ही है जैसे कोई सेठ ‘ग़रीबों’ के लिए भंडारे का आयोजन करता है और लाइन में लगा कर खाना बांटता है…
धिक्कार होगा देहरादून के उन कथित ‘मान्यता प्राप्त पत्रकारों’ पर जो इस तरह के असम्मानजनक न्योते के बाद भी ये उपहार लेने जाएंगे…साथ ही ये भी अंदाज़ लगाएं इनकी लेखनी में कितना दम होगा…?
सतीश त्यागी-
क्या कहें! हमारे रोहतक में एक दफा एक नेत्री ने जूतों का वितरण अपने घर से किया। कई बंधु तो जूतों के लिए संघर्ष करते भी दिखे!!
यह पत्रकारिता का पतन दर्शाता है… दुखद है. किसी ने बहुत खूब कहा है कि कोई आपका अपमान नहीं कर सकता, जब तक आप स्वयं न चाहें !! मर्जी है आपकी आख़िर इज़्ज़त है आपकी! – आशुतोष निवसरकार
संजय निगम-
कुछ लोग? यहाँ तो वो लोग भी जाएंगे जिनका नाम भी नहीं लिखा होगा और उनका नाम नहीं है उसको भी जुड़वाने का प्रयास करेंगे। तभी तो पिट रहे है पत्रकार। दरअसल पत्रकार जमात के अवशेष बचे है जिन्हें हम जैसे लोग पत्तलकार भी कहते है?




संतोष देव गिरि
October 25, 2025 at 9:39 pm
पत्रकारिता की गरिमा दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। अब ऐसे संपादक, मान्यता प्राप्त पत्रकार हो गये हैं जो पांच सौ लेकर सौ दो सौ का लिफाफा लेने के लिए घंटों बैठे रहते हैं। और तो और पर्व त्यौहार आते ही, कहीं कुछ जुगाड़ हो रहा है क्या….! के लिए लालायित दिख जाएंगे।
क्या कहा जाएं पत्रकारिता में “असली, नकली और फसली” की जमात बढ़ रही है।