अपूर्व भारद्वाज-
अमित शाह देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री नहीं बनाना चाहते थे, न ही उन्हें केंद्र में लाना चाहते थे। उन्हें मजबूरी में ऐसा करना पड़ा क्योंकि उन्हें डर था कि अगर वे मुख्यमंत्री नहीं बने, तो उन्हें बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना पड़ता। इस पद पर वे भूपेंद्र यादव या विनोद तावड़े को बिठाना चाहते थे।
2019 को याद कीजिए, कैसे अमित शाह ने हरियाणा में दुष्यंत चौटाला से मिलकर तीन दिन में सरकार बनवा दी थी। लेकिन महाराष्ट्र में झांका तक नहीं। दरअसल, अमित शाह 2019 से ही महाराष्ट्र में ओबीसी या मराठा को मुख्यमंत्री बनाने के मूड में थे क्योंकि वे महाराष्ट्र की राजनीति को अच्छे से समझते हैं।
इसलिए इस बार बीजेपी ने चुनाव देवेंद्र फडणवीस के नाम पर नहीं, बल्कि मराठा प्राइड के नाम पर शिंदे के नेतृत्व में लड़ा था। ओबीसी को एकजुट करने की पूरी रणनीति अमित शाह के खास सिपहसालार विनोद तावड़े ने अंजाम दी, और देवेंद्र फडणवीस कहीं भी पिक्चर में नहीं थे।
देवेंद्र फडणवीस यह बात जानते थे, इसलिए उन्होंने इस बार बहुत दिमाग से खेला। बहुत कम लोगों को पता है कि लोकसभा चुनाव हारने के बाद लाडली बहन का आइडिया फडणवीस ने ही शिवराज के जरिए शिंदे को दिया था। शिवराज को अमित शाह ने अपने लाडले मोहन यादव के कारण मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया था।
अमित शाह जानते हैं कि उनके बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने की राह में चार लोग बाधा हैं। उनमें से शिवराज और वसुंधरा को वे लूप लाइन में डाल चुके हैं। योगी को यूपी चुनाव से पहले हटाने की हर संभव कोशिश करते, लेकिन देवेंद्र फडणवीस ने तथाकथित चाणक्य को पहले ही फेल कर दिया।
अमित शाह मोदी को समझाते रह गए कि ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनाने से ओबीसी और मराठा नाराज हो जाएंगे। लेकिन देवेंद्र, नरेंद्र की तरह क्रोनी कॉर्पोरेट की आंख का तारा हैं। देवेंद्र, नरेंद्र की कोई बात नहीं टालते। वे डिमोट होकर डिप्टी सीएम इसलिए बने थे कि जब मौका आएगा, तो चौका मारेंगे।
हुज़ूरे आला आज तक खामोश बैठे हैं,
इसी ग़म में सजाई थी हमने
महफ़िल लूट ले गया कोई।



