दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (DUJ), इंडियन विमेंस प्रेस कॉर्प्स (IWPC) और नेशनल अलायंस ऑफ जर्नलिस्ट्स (NAJ) ने मीडिया पर बढ़ते प्रतिबंधों और हमलों की कड़ी आलोचना की है। संगठनों का कहना है कि हाल ही में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP) के नियमों की अधिसूचना और कश्मीर टाइम्स पर की गई छापेमारी मीडिया की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाली घटनाएँ हैं।
पत्रकार संगठनों के अनुसार, 14 नवंबर 2025 को अधिसूचित DPDP नियम सूचना के अधिकार को कमजोर करेंगे और पत्रकारों के लिए सरकारी अनियमितताओं तथा राजनीतिक वर्ग से जुड़े मामलों की जानकारी प्राप्त करना कठिन बना देंगे। गोपनीयता की आड़ में यह कानून सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को उजागर करने वाले पत्रकारों को दंडित करने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। संगठनों का कहना है कि यह कदम मीडिया को नियंत्रित करने और विवादित मुद्दों पर उसकी आवाज़ दबाने की एक और कोशिश है। उनका मानना है कि डिजिटल युग में दुनिया भर में सरकारें पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ी हैं, जबकि भारत उल्टी दिशा में जा रहा है।
उधर, जम्मू स्थित कश्मीर टाइम्स के कार्यालय पर 20 नवंबर को हुई छापेमारी को संगठनों ने कश्मीर में मीडिया पर लगातार बने खतरे का नया उदाहरण बताया है। कश्मीर टाइम्स, जो 1955 से प्रकाशित हो रहा है, विज्ञापन बंद होने के कारण पूरी तरह डिजिटल हो चुका है। अक्टूबर 2020 में इसके श्रीनगर कार्यालय को सील कर दिया गया था और जब्त किए गए कंप्यूटर और उपकरण अब तक वापस नहीं किए गए। इससे पहले अख़बार की संपादक अनुराधा भसीन को बिना नोटिस उनके आवास से बेदखल कर दिया गया था।
राज्य जांच एजेंसी (SIA) ने दावा किया है कि जम्मू स्थित कार्यालय से AK-47 के कारतूस, पिस्टल राउंड और हैंड ग्रेनेड पिन सहित गोलाबारूद बरामद किया गया है। एजेंसी ने अख़बार के खिलाफ देशविरोधी गतिविधियों को ‘प्रश्रय देने’ का मामला दर्ज किया है। दूसरी ओर, कश्मीर टाइम्स के संपादकों ने आरोपों को असत्य बताते हुए कहा कि यह कार्यालय पिछले तीन–चार साल से पूरी तरह निष्क्रिय पड़ा है और लगाए गए आरोप मनगढ़ंत हैं।
पत्रकार संगठनों ने इन घटनाओं को गंभीर बताते हुए कहा है कि सरकार की जिम्मेदारी पारदर्शिता बढ़ाने की है, न कि सार्वजनिक हित के मुद्दों पर पर्दा डालने की।



