Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सियासत

विश्वसनीय निदान की सरलतम पद्धति एक्युप्रेशर

शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाग का संबंध पूरे शरीर से होता है। इसी कारण जब शरीर के किसी भाग में तीव्र कष्ट होता है तो हमें कुछ भी अच्छा नहीं लगता। शरीर में प्रत्येक अंग, उपांग, अवयव, अन्तःश्रावी ग्रंथियों आदि से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण प्रतिवेदन बिन्दु हमारी हथेली और पगथली में होते हैं। जिस प्रकार किसी भवन की बिजली का सारा नियन्त्रण मुख्य स्विच बोर्ड से होता है, ठीक उसी प्रकार ये प्रतिवेदन बिन्दु शरीर के किसी न किसी भाग का प्रतिनिधित्व करते हैं।

शरीर के सूक्ष्म से सूक्ष्म भाग का संबंध पूरे शरीर से होता है। इसी कारण जब शरीर के किसी भाग में तीव्र कष्ट होता है तो हमें कुछ भी अच्छा नहीं लगता। शरीर में प्रत्येक अंग, उपांग, अवयव, अन्तःश्रावी ग्रंथियों आदि से संबंधित कुछ महत्त्वपूर्ण प्रतिवेदन बिन्दु हमारी हथेली और पगथली में होते हैं। जिस प्रकार किसी भवन की बिजली का सारा नियन्त्रण मुख्य स्विच बोर्ड से होता है, ठीक उसी प्रकार ये प्रतिवेदन बिन्दु शरीर के किसी न किसी भाग का प्रतिनिधित्व करते हैं।

सुजोक और रिफ्लेक्सोलाजी एक्युप्रेशर के सिद्धान्तानुसार हथेली और पगथली में दबाव देने पर जिन स्थानों पर दर्द होता है, उसका मतलब उन स्थानों पर विकार अथवा अनावश्यक विजातीय तत्त्वों का जमाव हो जाना होता है। परिणामस्वरूप शरीर में प्राण ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध हो जाता है। ये प्रतिवेदन बिन्दु बिजली के पंखों, बल्ब या अन्य उपकरणों के स्विच की भांति शरीर के अलग-अलग भागों से संबंधित होते हैं। जिस प्रकार स्विच में खराबी होने से उपकरण तक बिजली का प्रवाह सही ढंग से नहीं पहुँचता, ठीक उसी प्रकार इन प्रतिवेदन बिन्दुओं पर विजातीय तत्त्वों के जमा होने से संबंधित अंग, उपांग, अवयवों आदि में प्राण ऊर्जा के प्रवाह में अवरोध हो जाने से व्यक्ति रोगी बनने लगता है।

हथेली और पगथली में आगे पीछे सूक्ष्म से सूक्ष्म भाग में अर्थात पूरी हथेली और पगथली के पूरे क्षेत्रफल में अंगुलियों या अंगूठे से हम सहनीय गहरा दबाव देने पर जहाँ-जहाँ जैसा-जैसा दर्द आता है, वे सारे दर्द वाले प्रतिवेदन बिन्दु एक्युप्रेशर के सिद्धान्तानुसार रोग से संबंधित होते हैं। अर्थात् वे शरीर में रोग के परिवार के सदस्य होते हैं। 

एक्युप्रेशर द्वारा निदान क्यों विश्वसनीय?

1.   प्रत्येक व्यक्ति की हथेली और पगथली उसके स्वयं की होती है। अतः इस विधि द्वारा उस व्यक्ति का स्वयं से संबंधित शरीर के सभी रोगों का निदान होता है। जबकि लक्षणों पर आधारित निदान पूर्ण शरीर का नहीं हो सकता।

2.   कभी-कभी रोग के कारण कुछ और होते हैं और उसके लक्षण कहीं दूसरे अंगों पर प्रकट होते हैं। आधुनिक चिकित्सक ऐसे रोगों को प्रायः असाध्य बतला देते हैं। परन्तु हथेली और पगथली के समस्त प्रतिवेदन बिन्दुओं पर दबाव देने से जहाँ ज्यादा दर्द आता है, वे ही रोग का मुख्य कारण होते हैं, भले ही रोग के लक्षण कहीं अन्य भाग में प्रकट क्यों न हों?इसी कारण एक्युप्रेशर असाध्य रोगों के निदान की प्रभावशाली चिकित्सा पद्धति होती है।

3.   रोग की प्रारम्भिक अवस्था में ही इस विधि द्वारा निदान संभव होता है। जहाँ-जहाँ पर दबाव देने से दर्द आता है, वे सभी प्रतिवेदन बिन्दु भविष्य में शरीर में रोग की स्थिति बनाते हैं। यदि रोग हो गया हों तो वे उसके कारण होते हैं, परन्तु यदि रोग के लक्षण प्रत्यक्ष बाह्य रूप से प्रकट न हुयें हों तो, भविष्य में होने वाले रोगों का कारण उन्हीं प्रतिवेदन बिन्दुओं में से होता है। रोग आने से पूर्व उसकी प्रारम्भिक अवस्था का निदान जितना सरल इस पद्धति द्वारा होता है, उतना प्रायः अन्यत्र कठिन होता है।

4.   इस विधि द्वारा रोगों के पूरे परिवार का निदान होने से निदान सही और विश्वसनीय होता हैं, जो अन्य चिकित्सा पद्धतियों में प्रायः संभव नहीं होता।

5.   हथेली और पगथली में दबाव देने पर जितने कम प्रतिवेदन बिन्दुओं पर अथवा जितना कम दर्द आता है, उतना ही व्यक्ति स्वस्थ होता है। जितने ज्यादा दर्द वाले प्रतिवेदन बिन्दु उतना पुराना रोग और स्वास्थ्य खराब होता है। इस प्रकार इस निदान पद्धति द्वारा जो रोग आधुनिक पेथालोजिकल टेस्टों अथवा यंत्रों की पकड़ में नहीं आते, उन रोगों के कारणों का सरलता पूर्वक निदान किया जा सकता है।

आजकल हम आधुनिक चिकित्सा पद्धति के निदान से इतने अधिक प्रभावित होते हैं कि जब तक उनके द्वारा रोग प्रमाणित नहीं हो जाता, तब तक हम रोग को रोग ही नहीं मानते। अधिकांश एक्युप्रेशर चिकित्सक भी प्रायः उन्हीं रोगों से संबंधित प्रमुख प्रतिवेदन बिन्दुओं पर उपचार कर रोगी को राहत पहुँचाने तक ही अपने आपको सीमित रखते हैं। सुजोक और रिफ्लोक्सोलोजी के चित्रों में बतलाये गये प्रमुख बिन्दुओं में दर्द की स्थिति देख अधिकांश एक्युप्रेशर चिकित्सक भी कभी-कभी रोग के नाम से निदान करते संकोच नहीं करते। जैसे किसी व्यक्ति के हृदय के प्रमुख प्रतिवेदन बिन्दु पर दबाव देने से दर्द आने की स्थिति में उसे हृदय का रोगी कह देते हैं। परन्तु ऐसा सदैव सही नहीं होता। हृदय में रोग होने पर निश्चित रूप से हृदय के प्रमुख प्रतिवेदन बिन्दु पर दबाने से दर्द आता है। परन्तु इसका विपरीत कथन कभी-कभी गलत भी हो सकता है, क्योंकि उस प्रतिवेदन बिन्दु का शरीर के अन्य भागों से भी कुछ  न  कुछ  संबंध अवश्य होता है। जैसे किसी व्यक्ति के पिता की मृत्यु होने पर पुत्र रोता है। इस कारण पुत्र को किसी अन्य कारण से रोते हुये देख यह कहना कि क्या आपके पिताजी की मृत्यु हो गयी है? कहाँ तक तर्क संगत है? अतः एक्युप्रेशर की इस पद्धति में आधुनिक चिकित्सा द्वारा कथित रोगों के नाम से निदान करना उसके मूल सिद्धान्तों के विपरीत होता है। निदानकत्र्ता मात्र इतना कह सकता है कि, दर्द वाले प्रतिवेदन बिन्दु, शरीर में उपस्थित रोग का प्रतिनिधित्व करते हैं, भले ही वे किसी भी नाम से क्यों न पुकारे जाते हों?

हथेली और पगथली के सभी भागों में दर्द वाले प्रतिवेदन बिन्दुओं का पता लगाने के पश्चात्, प्रत्येक दर्द वाले प्रतिवेदन बिन्दु पर दिन में एक या दो बार बीस से तीस सैकण्ड तक, सभी प्रतिवेदन बिन्दुओं पर जमा हुये विजातीय पदार्थों को दूर करने हेतु, अपनी अंगुलियों और अंगूठे से सहनीय घुमावदार दबाव देने से, धीरे-धीरे विजातीय तत्त्व वहाँ से दूर होने लगते हैं। परिणाम स्वरूप शरीर के संबंधित रोग ग्रस्त भागों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह नियमित और संतुलित होने लगता है तथा रोगी रोग मुक्त होने लगता है, तथा प्रत्यक्ष रोग न भी हो तो भविष्य में रोग होने की सम्भावनाएँ नहीं रहती है।

उपचार यथा संभव रोगी को स्वयं ही करना चाहिये। स्वयं द्वारा निदान और उपचार करने से व्यक्ति सभी दर्दस्थ प्रतिवेदन बिन्दुओं पर समान दबाव दे सकता है और रोग में जैसे-जैसे राहत मिलती जाती है, उसका आत्म विश्वास और सजगता बढ़ती जाती है। दूसरा व्यक्ति प्रायः सभी दर्दस्थ बिन्दुओं पर दबाव नहीं देता। अतः यथा संभव जितना उपचार रोगी स्वयं कर सकें,उतना तो कम से कम उसको स्वयं ही करना चाहिये, अन्य साधक तथा चिकित्सक का रोग से संबंधित प्रमुख प्रतिवेदन बिन्दुओं के दबाव हेतु शीध्र राहत मिलने तक ही सहयोग लेना चाहिए। क्योंकि अधिकांश  चिकित्सक भी एक्युप्रेशर सिद्धान्तों के अनुसार न तो रोगों का पूर्ण निदान ही करते हैं और न उपचार। आधुनिक चिकित्सा के निदान को आधार मानकर ही प्रायः नामधारी रोगों के प्रमुख प्रतिवेदन बिन्दुओं का उपचार करते हैं। सहयोगी रोगों की उपेक्षा करने से उनका उपचार कभी-कभी आंशिक और अस्थायी भी होता है एवं अधिक समय ले सकता है।

परन्तु आजकल हम नामधारी रोग को सीधा नियन्त्रण में करने का प्रयास करते हैं, जो न्यायोचित नहीं होता। सहयोगियों को दूर किये बिना जिस प्रकार नेता पर नियन्त्रण करना कठिन होता है। प्रायः हम अखबारों में पढ़ते हैं और टी.वी. पर देखते हैं कि प्रदर्शनों के समय प्रदर्शनकारियों के नेता को पुलिस सीधा कैद नहीं करती। पहले प्रदर्शनकारियों को प्रार्थना कर शान्त करने का प्रयास करती है, फिर लाठी चलाती है, अश्रु गैस छोड़ती हैं और जब सारी भीड़ चली जाती है तो नेता को आसानी से कैद किया जा सकता है। ठीक उसी प्रकार रोग के परिवार के सहायक रोगों से संबंधित सभी प्रतिवेदन बिन्दुओं का उपचार करने से मुख्य रोग की ताकत स्वतः समाप्त हो जाती है तथा वह शीघ्र नियन्त्रण में लाया जा सकता है। जिस प्रकार जनतंत्र में सहयोगियों का समर्थन न मिलने से नेता की ताकत समाप्त हो जाती है, नेता को पद त्याग करना पड़ता है। ठीक उसी प्रकार अप्रत्यक्ष सहयोगी रोगों के दूर हो जाने से मुख्य रोग से शीघ्र एवं स्थायी मुक्ति मिल जाती है। यही एक्युप्रेशर चिकित्सा का मूल सिद्धान्त है।

उपचार हेतु हथेली और पगथली में बारी-बारी से आगे-पीछे समस्त प्रतिवेदन बिन्दुओं पर अपनी सहन शक्ति के अनुसार इलास्टिक डोरी को कसकर लपेटें और उसके बाद खोल दें। जैसे ही डोरी हटाते हैं, हथेली और पगथली पर दबाव हटने से वहाँ पर प्राण ऊर्जा तीव्र गति से प्रवाहित होने लगती है। परिणामस्वरूप वहाँ पर जमे हुए विजातीय तत्त्व अपना स्थान छोड़ने लगते हैं। डोरी खोलने के पश्चात् उस भाग की हथेली से मसाज कर लें ताकि वहाँ रक्त का संचार भी बराबर होने लगे। जैसे-जैसे विजातीय तत्त्व दूर होते हैं, संबंधित अंग-उपांग एवं अंगों में प्राण ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होने से वे रोग मुक्त होने लगते हैं। इस प्रकार पूरे शरीर अर्थात् प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सभी रोगों का उपचार किया जा सकता है।

उपचार का प्रभाव डोरी की इलास्टिक एवं व्यक्ति के दबाव की सहन शक्ति पर निर्भर करता है। यदि व्यक्ति की सहनशक्ति बराबर न हो तो उपचार बार-बार सहनीय दबाव देकर किया जा सकता है। उपचार में रोगी की भागीदारी मुख्य होती है। यदि स्वस्थ व्यक्ति उपरोक्त उपचार नियमित रूप से करे तो उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। शरीर के सभी तंत्र संतुलित रूप से अपना कार्य करने लगते हैं जिससे रोग उत्पन्न होने की संभावनाएँ कम हो जाती है। पूर्ण शरीर का उपचार होने से अर्थात् सहयोगी रोगों की उपेक्षा न होने से, चंद दिनों के उपचार से न केवल रोगों में राहत मिलती है, अपितु रोग से स्थायी मुक्ति हो जाती है।

पुराने संक्रामक और हट्टीले असाध्य रोगों में हथेली और पगथली के संबंधित प्रतिवेदन बिन्दुओं पर दबाव देने से असहनीय दर्द आता है। इस कारण बहुत से रोगी चाहते हुये भी एक्युप्रेशर चिकित्सा का लाभ नही उठा सकते। ऐसे रोगी यदि दर्द वाले प्रतिवेदन बिन्दुओं पर मेथी के दानों को कुछ समय के लिए स्पर्श करके रखे तो उससे भी उस स्थान पर जमा विजातीय तत्त्व धीरे-धीरे दूर हो जाते हैं, और प्राण ऊर्जा का प्रवाह संतुलित होने लगता है, जिससे व्यक्ति रोग मुक्त हो जाता है।

लेखक डा. चंचलमल चोरडिया संपर्क : मोबाइल – 9414134606 Email: [email protected]

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन