कहते हैं चुनावी सिस्टम “निष्पक्ष” और “फूलप्रूफ” होता है… लेकिन यहां तो फाइलों में ही कमल खिल गया! Election Commission of India का एक आधिकारिक दस्तावेज़ जब Bharatiya Janata Party की मुहर के साथ दूसरे राजनीतिक दलों तक पहुंचा, तो सवाल उठना लाजिमी था। मगर सफाई आई—“क्लेरिकल एरर”! अब मामला सिर्फ एक कागज़ की गलती का नहीं, बल्कि उस सिस्टम का है जो हर चुनाव में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कसौटी पर खुद को खड़ा बताता है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये सच में एक मामूली चूक थी, या फिर उस “एरर” में छिपी है कोई बड़ी कहानी?
संजय कुमार सिंह-
इस तरह चुनाव आयोग ने ‘गंगा स्नान’ कर लिया…. ईवीएम, अनिल मसीह के बाद अब पूरे सिस्टम की पोल खुली
केरल चुनाव के कई स्टेकधारकों को ई-मेल से चुनाव आयोग ने एक दस्तावेज भेजा जिसपर भाजपा की सील लगी थी। जाहिर है इससे चुनाव आयोग की जो बदनामी होनी थी हुई पर चुनाव आयोग ने इसे clerical error कहा है। इसे स्वीकार करना, नहीं करना महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन मुद्दा यही है कि मुहर किसी और पार्टी का नहीं भाजपा का था और यह संयोग ही होता है। यह वैसे ही है जैसे ईवीएम की खराबी या किसी भी तरह की गलती का नतीजा यही होता है कि बटन कोई दबाओ – वोट भाजपा को ही जाता है।
इस तरह यह दिखाई दे रहा है मामला ईवीएम से चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है। बीच में अनिल मसीह वही करते हुए रिकार्ड हुए थे और जाहिर है उसे clerical error कहना ठीक नहीं होता। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया, उनकी गलती मानी गई पर clerical error की तरह ही रह गई और उन्हें सजा नहीं हुई। उनकी गलती (या पक्षपात) का लाभ भी भाजपा को ही हुआ था। यह व्यवस्था है और व्यवस्था का विकास इसी को कहते हैं। तभी तो चुनाव आयुक्त के खिलाफ पहली बार महाभियोग का प्रस्ताव आया है और वे महाभियोग के साये में चुनाव करवा पा रहे हैं जबकि मुख्य न्यायाधीश ने उनकी नियुक्ति करने वाले पैनल के संबंध में सुनवाई करने से मना कर दिया है।
यह अलग बात है कि 272 विशिष्ट नागरिकों और 204 पूर्व नौकरशाहों की तरह इसे सार्वजनिक करने या इसके लिए चुनाव आयोग की आलोचना करने के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराया गया और चुनाव आयोग के साथ भाजपा का बचाव भी हुआ। यह कोई नया तरीका नहीं है। दिसंबर 2020 में, पूर्व मुख्य सचिव योगेंद्र नारायण की अगुआई में रिटायर नौकरशाहों ने यूपी के ‘लव जिहाद’ कानून का समर्थन किया था। नौकरशाहों द्वारा योगी सरकार पर ‘नफरत की राजनीति’ के आरोप (लव जिहाद कानून के खिलाफ) को राजनीति से प्रेरित बताते हुए खारिज कर दिया था।
भाजपा ने केरल चुनाव आयोग पर आरोप का भी बचाव किया। चुनाव आयोग के गलती मानने के बावजूद किया। तीन स्क्रीन शाट – पहला दस्तावेज जो चर्चा में है, दूसरा चुनाव आयोग ने गलती मानी लेकिन भाजपा चुनाव आयोग का बचाव कर रही है।
चुनाव आयोग की सफाई
चुनावी प्रक्रिया से जुड़े एक दस्तावेज़ को लेकर सामने आए विवाद पर Election Commission of India ने आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया है। आयोग ने कहा है कि जिस पत्र पर Bharatiya Janata Party (BJP) की मुहर लगी थी और जिसे विभिन्न मलयालम न्यूज चैनलों पर प्रसारित किया जा रहा था, उसका प्रसार महज एक “क्लेरिकल एरर” यानी लिपिकीय गलती के कारण हुआ।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय के अनुसार, केरल में BJP इकाई ने हाल ही में 2019 के उस दिशा-निर्देश को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था, जिसमें उम्मीदवारों के आपराधिक मामलों के प्रकाशन से जुड़े नियम तय किए गए थे। इस अनुरोध के साथ पार्टी ने 2019 के मूल निर्देश की एक फोटोकॉपी भी जमा कराई थी, जिस पर पार्टी की मुहर पहले से मौजूद थी।
कार्यालय ने बताया कि इसी दस्तावेज़ को, मुहर पर ध्यान दिए बिना, अन्य राजनीतिक दलों को स्पष्टीकरण के तौर पर भेज दिया गया। बाद में जब इस गलती का पता चला तो इसे तुरंत ठीक किया गया।
21 मार्च को डिप्टी चीफ इलेक्टोरल ऑफिसर ने औपचारिक पत्र जारी कर इस दस्तावेज़ को वापस लेने का आदेश दिया। यह वापसी नोटिस सभी राजनीतिक दलों, जिला निर्वाचन अधिकारियों और रिटर्निंग अधिकारियों को भेज दिया गया है।
आयोग ने स्पष्ट किया है कि 2019 के दिशा-निर्देशों में बाद में संशोधन किए जा चुके हैं और इसकी जानकारी पहले ही सभी राजनीतिक दलों को दी जा चुकी है।
साथ ही, चुनाव आयोग ने मीडिया और आम जनता से अपील की है कि इस लिपिकीय गलती के आधार पर भ्रामक सूचनाएं न फैलाएं। आयोग ने भरोसा दिलाया है कि चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष और किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त रखने के लिए सख्त और मजबूत प्रणाली लागू है।


