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महाराष्ट्र

फडणवीस के आगे से परोसी थाली छीनने में नाकामयाब रहे भाजपा के भाग्य विधाता!

के पी सिंह-

हाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के नतीजे 23 नवम्बर को ही सामने आ गये थे जिसमें राज्य विधानसभा की 288 सीटोें में से महायुति को 230 सीटों पर विजय पताका फहराने में कामयाबी मिली थी। यह आंकड़ा विशाल बहुमत का द्योतक है। बहुमत के लिए 145 सीटों की जरूरत थी और महायुति में भाजपा के अकेले हिस्से में 132 सीटें आयी थी। इस तरह महायुति की सरकार के गठन और मुख्यमंत्री का पद भाजपा को मिलने में कोई ना नुकुर नहीं होनी चाहिए थी फिर भी 12 दिन विलम्ब से शपथ हो पायी। इस बीच महायुति में भारी उठा पटक चलती रही। यहां तक कि भाजपा में भी इस बात की अटकलें तेज रहीं कि पार्टी हाईकमान देवेन्द्र फडणवीस का राजतिलक होने देगा या नहीं। उनके स्थान पर विनोद तावड़े को मुख्यमंत्री बनाये जाने की चर्चा भी जोरों पर चली।

देवेन्द्र फडणवीस ने तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री की शपथ ली है। उनके मुख्यमंत्री के पहले कार्यकाल की सराहना होती है भले ही उन्हें इसके बावजूद सत्ता गंवानी पड़ गई हो। भाजपा हाईकमान ने जब शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में तोड़-फोड़ कराकर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली अपनी कठपुतली सरकार राज्य में गठित कराई उस समय मुख्यमंत्री रह चुके देवेन्द्र फडणवीस से कहा गया कि उन्हें इस सरकार की विश्वसनीयता के लिए एकनाथ शिंदे के अधीन उपमुख्यमंत्री पद स्वीकार करना पड़ेगा तो यह फडणवीस के लिए अत्यंत अपमान जनक पेशकश थी पर पार्टी के अनुशासन की खातिर उन्होंने अपनी तौहीन का यह घूंट पी लिया।

महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के परिणाम भाजपा के लिए सुखद नहीं रहे थे। इसमें देवेन्द्र फडणवीस को अपेक्षाकृत महत्व न दिये जाने की चूक को जिम्मेदार बताया गया था। नतीजतन विधानसभा चुनाव की कमान पार्टी हाईकमान को मजबूरी में उन्हें वैसे ही सौंपनी पड़ी जैसे उत्तर प्रदेश के इस बार के उपचुनाव के सारे अधिकार योगी के हवाले करने पड़ गये थे।

जैसा कि जाहिर है कि देवेन्द्र फडणवीस संघ के लाडले हैं इसलिए उनके नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला संघ के स्वयं सेवकों में नये तरह का उत्साह भरने वाला साबित हुआ। इस तरह भाजपा के पक्ष में जो सुयोग बना उसी का नतीजा था कि 6 महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव की विफलता का कोई दाग भाजपा के दामन पर विधानसभा चुनाव में टिका नहीं रह पाया। भाजपा को उम्मीद से बहुत ज्यादा जो सीटें मिली उस श्रेय के सबसे बड़े हकदार देवेन्द्र फडणवीस माने जा रहे थे तो इसमें कोई अन्यथा बात नहीं थी। इस कारण मुख्यमंत्री पद पर उनके नाम को लेकर कोई इफ-बट होनी नहीं चाहिए थी लेकिन मोदी-शाह की फितरत से लोग अब खूब परिचित हो चुके हैं जिन्हें अपने अलावा पार्टी में भी किसी और की जय-जयकार कबूल नहीं होती और इस कारण कोई और नेता अगर जरा भी चढ़ता दिखायी दे तो उसके मान मर्दन के लिए उनकी तलवार तत्काल उठ जाया करती है।

मोदी-शाह ने इस क्रम में भाजपा के अंदर अपनी सबसे ऊंची दिखाने के लिए पार्टी सिस्टम को तबाह करने का कोई मौका नहीं गंवाया। चाहे केन्द्रीय मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभाग के लिए मंत्री के चयन का मामला हो, राष्ट्रपति तक के पद के लिए चेहरा चुनना हो अथवा राज्यों के मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी का सवाल हो सभी मामलों में चैकाने वाले फैसले करने के नाम पर उन्होंने यह साबित करने में दिमाग लगाया कि पार्टी उनके सामने नथिंग है, सारे तर्क और औचित्य उनके लिए बेमानी है, वे सर्वोपरि हैं और किसी से बंधे नहीं हैं। मदांधता की इस सनक में उन्होंने भाजपा को बढ़ाने में बड़ा योगदान करने वाली हस्तियों के तिरस्कार का रिकार्ड बनाया है।

लालकृष्ण आडवाणी को मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद राष्ट्रपति पद के लिए सबसे उपयुक्त नेता माना जा रहा था पर अपने आगे पूरी पार्टी को बौना साबित करने के लिए उन्होंने उस समय दलित राष्ट्रपति का बेतुका दांव सामने ला दिया और इस दांव से अपने गुरू लालकृष्ण आडवाणी को हलाल करने का मौका उन्होंने ढ़ूढ़ लिया। ध्यान रहे कि अनुसूचित जाति के राष्ट्रपति के रूप में देश के इस सर्वोच्च संवैधानिक पद पर केआर नारायणन काफी पहले आसीन हो चुके थे इसलिए दलित राष्ट्रपति के कार्ड को खेलने की कोई तुक नहीं बची थी। निर्मला सीतारमण को उन्होंने अर्थशास्त्र से सरोकार न होते हुए भी केन्द्रीय वित्तमंत्री बनाने के लिए चुना तो उनकी बहुत आलोचना हुई लेकिन इससे विचलित होने की बजाय मोदी इस बात पर मजे लेते रहे कि उनके सामने नियति तक किस कदर असहाय है।

हाल में जब मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा को बड़ी सफलता मिली तो मुख्यमंत्री के लिए अनुभव व अन्य बाजिव आधार पर जिन चेहरों को उपयुक्त माना जा रहा था उन्हें दर किनार करके उन्होंने सिर्फ अपनी मनमानी दिखाने के लिए नौसिखिये नेताओं का राजतिलक वीटो लगाकर करवा दिया। राजस्थान में तो जिन भजन लाल शर्मा को उन्होंने मुख्यमंत्री बनवाया वे तो विधायक तक पहली बार चुने गये थे। इस तरह का खिलवाड़ सर्वथा अस्वीकार्य होना चाहिए था पर परिस्थितियां कुछ ऐसी थी कि न तो भाजपा में पार्टी में इस पर आपत्ति करने वाला कोई नजर आया और न संघ में।

इस सोच के तहत मोदी और शाह निश्चित रूप से चाहते रहे होंगे कि जिन देवेन्द्र फडणवीस का नाम हरेक कोई महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद के लिए ले रहा है उन्हें दुत्कार कर किसी ऐरे गैरे को मुख्यमंत्री बनवाया जाये ताकि उनकी सामथ्र्य का एक बार फिर परिचय लोगों को मिल सके। इसी कारण महाराष्ट्र में नयी सरकार के गठन में इतना बिलम्व हुआ। कहा जाता है कि अमित शाह की शह के कारण ही एकनाथ शिंदे भाजपा को लगातार ब्लैकमेल करने की कोशिश करते रहे। पर अब परिस्थितियां बदली हुई हैं। लोकसभा चुनाव में अपनी दम पर भाजपा को बहुमत नहीं मिला तो मोदी और शाह का भाव भी औधे मुंह गिर गया। संघ ने भी इस विफलता के बाद मय ब्याज के दोनों शिखर नेताओं की हेकड़ी निकाली। मोदी-शाह से कहा गया कि अपने को अवतारी समझने के मुगालते में न रहें।

आप लोग भी कितने ही कुशल राजनीतिक खिलाड़ी होने के बावजूद साधारण इंसान ही हैं इसलिए आपके फैसलों में पैमाने झलकने चाहिए जो आपके फैसले का औचित्य प्रतिपादित कर सकें। पार्टी आपकी मनमानी को ढ़ोने के लिए अब तैयार नहीं है। इसलिए महाराष्ट्र में वे देवेन्द्र फडणवीस को किनारा करके चैकाने वाला हुकुमनामा पेश नहीं कर सके।

फडणवीस की शपथ हो गई है। आखिर तक एकनाथ शिंदे को लेकर सस्पेंस बना हुआ था कि वे उपमुख्यमंत्री पद के लिए तैयार होंगे या नहीं लेकिन आखिर में शिंदे को भी झुकना पड़ा। शपथ ग्रहण समारोह में भाजपायी मुख्यमंत्रियों के अलावा एनडीए के शक्तिशाली सहयोगी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू भी उपस्थित रहे। अलवत्ता महा अघाड़ी का कोई नेता शपथ ग्रहण में नहीं आया। शायद उन्हें यह दिखाना है कि महायुति ने गड़बड़ी करके यह चुनाव जीता है जिसे साबित करने के लिए वे सबूत जुटा रहे हैं। अगर वे शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होते तो संदेश यह जाता कि उन्हें चुनाव परिणाम मान्य हैं।

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