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उत्तर प्रदेश

होंगे आप सीएम के मीडिया सलाहकार लेकिन आदमी दो कौड़ी के निकले!

यशवन्त सिंह-

फ्रैंक हुज़ूर जी बस भाजपा में शामिल होकर भाजपा के लिए नहीं लिखते थे इसलिए मरने के बाद भी भाजपाइयों के ज़हर का इन्हें सामना करना पड़ रहा है। कम से कम आपसे ऐसी उम्मीद न थी जो किसी पोलिटिकल एक्टिविस्ट के मरने पर ऐसा जहर लिखेगा। प्रकृति / सुपर पॉवर से डरिए।

आप भी वही काम कर रहे हैं जो फ्रैंक कर रहे थे। दोनों की पार्टीज़ अलग अलग है। ईश्वर न करें भरी जवानी में आप मर जायें और हम सबको लिखना पड़े आप जैसा ही कि दंगा पार्टी का एक संपोला मर गया।

राम राम। भगवान ऐसी कलम कभी न चलवायें। न अच्छा लिख सकते थे, चुप तो रह सकते थे। बहुत पतित हुए हैं इधर आप सरकारी कुर्सी मिलने के बाद। क्षमा! अनफ्रेंड कर रहा हूँ।

होंगे आप सीएम के मीडिया सलाहकार लेकिन आदमी आप दो कौड़ी के निकले।


भड़ास एडिटर यशवंत का उपरोक्त कमेंट जिस पंकज झा की पोस्ट पर है, उसे पढ़िए-

पंकज कुमार झा-

ये फ्रैंक हुजूर हैं। असली नाम सोमेश यादव। लगभग मुफलिसी की अवस्था में इनका दुःखद निधन हो गया है। मात्र 48 वर्ष के थे, अर्थात् हमारी उम्र के ही।

इन्हें निजी तौर पर तो नहीं, किंतु सोश्यल मीडिया से और इनके लिखे से इन्हें जानता था। नाम यही था इनका, हालांकि थे ये बिहार के यादवजी। जातिगत विद्वेष से लबालब भरे।

कितने स्मार्ट और जहींन हैं न? प्रख्यात अंग्रेजी स्कूल और दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़े। स्वयं ‘यादव’ थे किंतु बेटे का नाम इन्होंने मार्कोस रखा। कुछ-कुछ मार्लेना जैसा।

मसाज-वाद की जहरीली स्पाई और कांगरेड विचारधारा किस तरह आपको बर्बाद कर देती है, किस तरह केवल लालू-मुलायम के परिवार को खरबपति बनाने के चक्कर में ऐसे युवा होम होते जा रहे हैं, ‘हुजूर’ इसका उदाहरण हैं।

अच्छा खासा लंदन में थे। संपन्न परिवार से थे। जितनी जानकारी मिल पायी है, उसके अनुसार दूसरे भाई आज भी लंदन में ही हैं। इन्हें अखिलेश यादव बड़े-बड़े सब्जबाग दिखा कर लंदन से ले आये। किराये का घर दिलाया।

देश भर में अपने लेखन से गंध फैलाते रहे हुजूर। पाकिस्तानी इमरान खान पर किताब लिखा, मुलायम यादव पर लिखा, अखिलेश यादव पर लिखा, लालू यादव पर लिखा। फिर दूध की मक्खी की तरह निकाल दिये गये, काम होने के बाद ….

जैसी जानकारी आ रही है, फिर राहुल गांधी की टीम में आ गये। उनका ‘हैंडलर’ बने, ऐसी सूचना है। और फिर अंततः …. शायद राहुलजी ने कोई शोक संदेश तक देना उचित नहीं समझा।

सबक बस यही है कि जिस भी विचारधारा के लिये अपनी प्रतिभा और समय लगाना हो, लगाइए। लेकिन भगवान के लिए यह सोच कर अपना जीवन दीजिये कि या तो आपके राष्ट्र-समाज का भला हो या फिर आपके स्वयं का।

लालू-मुलायम-राहुल खानदान को कितना अमीर और ताकतवर बनाइयेगा भाई? सोचिए तनिक। आज के जातिवादी युवा भी सोचें कृपया। सबक लें इस घटना से।

(नोट : सोश्यल मीडिया और कुछ मुख्यधारा मीडिया से तथ्य लेकर यह लिखा है। निजी तौर पर केवल इनका ‘लिखा’ जानता था। अगर कोई तथ्यात्मक भूल हुई तो एडिट कर लूंगा इसे।)

लेखक पंकज कुमार झा छत्तीसगढ़ के सीएम के मीडिया सलाहकार हैं.


पूरा प्रकरण समझने के लिए इसे भी पढ़िए-

फ्रैंक हुजूर का शव देख रो पड़ीं उनकी दर्जनों बिल्लियां, देखें तस्वीरें https://www.bhadas4media.com/frank-huzur-cat/

फ्रैंक हुज़ूर के मौत की पूरी कहानी और राहुल गांधी की चिट्ठी! https://www.bhadas4media.com/frank-huzur-death-story/


भड़ास एडिटर यशवन्त के रिप्लाई पर छत्तीसगढ़ सीएम के मीडिया एडवाइजर पंकज कुमार झा की आई टिप्पणी पढ़िए-

पंकज कुमार झा-

यशवंत जी। इसमें फ्रैंक की प्रशंसा ही है। उनकी प्रतिभा का कोई सानी नहीं था, यही लिखा है। हां, जातिगत द्वेष था उनमें, ऐसा मूल्यांकन होना ही चाहिये। इस पोस्ट के बहाने हर विचारधारा में काम कर अपना समय और प्रतिभा लगाने वालों को सचेत किया गया है। केवल हुजूर की बात नहीं है।

शेष मेरा क्या दायित्व कब है या रहा है, इसे कभी फेसबुक के लेखन पर प्रभाव नहीं डालने दिया है। जो सोचता हूँ मुक्त होकर लिखता हूँ। क्योंकि आपसे निजी सरोकार है अतः आपकी भाषा में आपको जवाब नहीं देता। पर आपके कौड़ियों के मूल्यांकन के आधार पर लिखना-कहना छोड़ दिया होता तो कुछ कह ही नहीं पाता यहां।

आप मूल्य लगाते रहिए सबका कौड़ियों में। मुबारक हो आपको। हां, यह अवश्य है कि समाज भर को गरियाने वाले आप जैसे लोग जरा भी कुछ भी विपरीत सुनने का साहस नहीं रखते, यह सभी जानते हैं। ध्यान रखिए अपना और आनंद कीजिये।


सीएम एडवाइजर पंकज झा के लिखे पर बीएसएफ़ के इंस्पेक्टर जनार्दन यादव की ये टिप्पणी पढ़िए-

जनार्दन यादव-

मनोज यादव था असली नाम। दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान बीस वर्ष की उम्र में शानदार नाटक लिखे जिसका मंचन नहीं हो पाया। कारण आपको विदित होगा। इसमें दो राय नहीं कि प्रतिभा कूट कूट कर भरी थी। परिस्थितिजन्य ऐसी की अल्पायु में देहावसान हो गया। आक्षेप लगाने से पहले आप थोड़ा रिसर्च करके लिख लेते तो बढ़िया होता। जातीय विद्वेष से लवरेज ऐसे पोस्ट की कम से कम आपसे आशा नहीं थी। आप राजनीति कीजिए खूब कीजिए लेकिन विद्वतजनों के बारे में ऐसी मिथ्या जानकारियां देने से बचिए। अगड़ी जातियां ही बहुत प्रबुद्ध नहीं होती। लड़बक इतने कि उनकी मूर्खता पर दांतों तले अंगुली दबाने पर सब मजबूर हो जाय!!! कम से कम बीस लाख पैरा मिलिट्री फोर्स के संख्या के जातीय मनोविज्ञान को पढ़ा हूं और समझा हूं । प्रतिरोध इस कारण कर रहा हूं कि यथार्थ की धरातल पर उतरे बिना संख्या बल के कारण, आप ऐसा न लिखिए।


समाजवादी चिंतक फ्रैंक हुज़ूर की मृत्यु पर राजनीति की रोटी सेंकने वाले छत्तीसगढ़ सीएम के एडवाइज़र पंकज कुमार झा के लिखे पर अशोक कुमार शर्मा की टिप्पणी पढ़िए-


किसी की मृत्यु के बाद नैतिक मर्यादा क्या होनी चाहिए! वाल्मीकि रामायण में मृत्यु के बाद के विस्तृत प्रसंग मिलते हैं, जिनमें स्वयं भगवान श्रीराम ने प्रतिक्रिया दी है।

जिस प्रसंग का मैं उल्लेख कर रहा हूं, वह वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में सर्ग 109 के श्लोक 14 से 25 के बीच मिलता है।

इसमें भगवान श्रीराम कहते हैं: “जीवन में किसी ने किस प्रकार जिया, क्या किया और उसे क्या परिणाम मिला—यह विधि के अधीन और एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। किसी से वैर या शत्रुता केवल उसके जीवनकाल तक ही हो सकती है। मृत्यु के बाद उस शत्रुता और घृणा का अंत हो जाना चाहिए।”

ये आदर्श था जो भगवान श्रीराम ने स्थापित किया था, जिसका प्रमाण वाल्मीकि रामायण में मिलता है। अब त्रेता युग की गवाही भी देख लें। महाभारत के शांति पर्व के अध्याय 279 में स्वयं मृत्युशैया पर पड़े भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को समझाया—

“मरने के बाद वैर नहीं रखना चाहिए।”

मूल श्लोक :
“वैरं मृतस्य न कर्तव्यं वैरं मृतो न धारयेत्।
तस्मात् सर्वेषु भूतेषु वैरं न कर्तुमर्हसि॥”

यदि भारतीय जनता पार्टी, जो अपनी नैतिकता और मर्यादा को भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग मानती है, उसके कोई विशेष कार्य अधिकारी / सलाहकार किसी मृत व्यक्ति के बारे में अनुचित टिप्पणी करते हैं, तो यह नैतिक रूप से अमर्यादित आचरण है। किसी की मृत्यु के बाद उस पर कीचड़ उछालना गलत है।

किसी भी व्यक्ति का जीवन मरण विधि और ईश्वर के द्वारा नियंत्रित होता है। उसका जन्म कहां हुआ, किस जाति में हुआ, किस धर्म को अपनाया, उसने किस प्रकार का जीवन जिया—इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता।

जहां तक सियासत में सफलता और मुफलिसी की बात है, यह अंततः सभी के साथ होता है। कोई जीवनकाल में पूज्य बन जाता है, कोई फटेहाल मर जाता है। कोई जमीन से आसमान तक उड़ता है। कोई आसमान से आकर धरती से टकराकर मर जाता है। कोई विस्फोट में टुकड़े-टुकड़े हो जाता है।

फ्रैंक हुजूर को किसी कानून के अंतर्गत दोषी नहीं पाया गया था और उनके खिलाफ किसी सरकार में कोई आरोप लंबित नहीं है।
उनके भी चाहने वाले बहुत हैं। इसलिए एक संवेदनशील संवैधानिक पद पर बैठे मुख्यमंत्री के अधीनस्थ अधिकारी / सलाहकार को बिना वजह अनुचित बयान नहीं देना चाहिए।

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1 Comment

1 Comment

  1. AshokKumar Sharma

    March 10, 2025 at 10:40 am

    “मरने के बाद वैर नहीं रखना चाहिए” महाभारत के शांतिपर्व में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को उपदेश के दौरान कहा गया है।
    वैरं मृतस्य न कर्तव्यं वैरं मृतो न धारयेत्।
    तस्मात् सर्वेषु भूतेषु वैरं न कर्तुमर्हसि॥

    इस श्लोक में भीष्म पितामह ने यह बताया है कि किसी की मृत्यु के बाद शत्रुताएं समाप्त हो जानी चाहिए और सभी को क्षमा और मृतक के प्रति शांत भाव से सज्जनता का व्यवहार करना चाहिए।

    लगभग यही भाव वाल्मीकि रामायण में श्री राम ने रावण की मृत्यु पर और रामचरितमानस में तुलसीदास ने अलग प्रकार से व्यक्त किया है।

    कहने का आशय यही है कि जो भी शत्रुता आए हैं जो भी प्रतिद्वंद्विता है और जो भी घृणा है वह किसी जीवित व्यक्ति के कार्यों से हो सकती है और होनी भी चाहिए। लेकिन जब वह पंचतत्व में विलीन हो जाए उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाए और उसकी आत्मा वापस परमात्मा में विलीन हो जाए तब उसे बुरा भला कहना ईश्वर को बुरा भला कहने के समान है।

    रावण जब अंतिम सांस से गिन रहा था तब भगवान श्री राम ने लक्ष्मण को उनके पास रावण से ज्ञान सीखने के लिए कुछ उपदेश ग्रहण करने के लिए भेजा और कहा कि उसने हमारे साथ जो कुछ भी किया उसे भूल जाओ और उससे जो कुछ भी प्राप्त कर सकते हो प्रार्थना करके प्राप्त करो।

    रावण की मृत्यु के बाद भी श्री राम अपने भाई लक्ष्मण को समझाते हुए कहते हैं कि रावण एक महान व्यक्ति था एक शूरवीर था विद्वान था और उसके समान कोई भी व्यक्ति नहीं था परंतु उसने जो कार्य किया उसके शरीर को उसका दंड मिल गया अब वह निशेष हो गया है उसका अस्तित्व समाप्त हो गया है। इसलिए उसके संस्कार में विलंब नहीं करना चाहिए और राजकीय सम्मान से उसे अंतिम विदा देनी चाहिए।

    यदि हम राजनीति और नैतिकता को अलग-अलग तरीके से देखेंगे तो बहुत सी समस्याएं पैदा होगी और वह हमारी ही पीडिया को झेलनी होगी।

    जिन लोगों को छोटे-मोटे पद प्राप्त करके अभिमान हो जाता है, उनका अस्तित्व बहुत बुरी गति को प्राप्त करता है यह आचार्य चाणक्य ने भी पंचतंत्र में कहा है।

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