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आज के अखबार : गुजरात समाचार के मालिक की गिरफ्तारी की खबर एक्सप्रेस और टेलीग्राफ में ही

संजय कुमार सिंह

नवोदय टाइम्स की आज की लीड के अनुसार हमारी सरकार देश का रक्षा बजट 50,000 करोड़ रुपये बढ़ायेगी। शिक्षा, इलाज, रोजगार, व्यवसाय सब चौपट करने के बाद देश के लिए जो बचेगा उसमें से यह राशि नरेन्द्र मोदी अपनी वीरता दिखाने या स्थापित करने के लिये खर्च करेंगे। सरकार की कमाई घटने और खर्चे बढ़ने का ही आलम है कि बहुमंजिली इमारतों और उनमें रहने वाले गरीबों के दड़बों या छोटे-ड़े फ्लैट के लिए आवश्यक लिफ्ट पर 18 प्रतिशत टैक्स है। जनता को इससे कोई शिकायत नहीं है या जिन्हें शिकायत है उनकी कोई सुनने वाला नहीं है तो यह पाकिस्तान से युद्ध, तालिबान से दोस्ती, मणिपुर से (चिन्ता) मुक्ति के माहौल में हो रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब करते हुए (मुख्य रूप से खबर देते हए) अखबार या सरकार ने रफाल से संबंधित पाकिस्तान के दावों का खंडन या पुष्टि करने की जरूरत नहीं समझी है। ऐसे अखबार मुफ्त में बंट रहे होते तो सरकार का प्रचार मान लिया जाता पर लोकतंत्र में आवश्यक यह चौथा खंभा सरकारी प्रचार के अलावा कुछ कर ही नहीं रहा है। इसके बावजूद आज यह भी खबर है कि पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग थलग करने के लिये सरकार दुनिया भर में सर्वदलीय टीम भेजेगी। यह इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक हैं जबकि नवोदय टाइम्स में इसी खबर का शीर्षक है, दुनिया भर में पाकिस्तान का आतंकी चेहरा बेपर्दा करेंगे देश के सभी दलों के नेता। पाकिस्तान को घेरने के लिए या घेरते हुए भारत तालिबान से दोस्ती कर रहा है यह खबर तो कल ही थी। आज भी है और इससे खुशी अमर उजाला के शीर्षक में झलक रही है, घेराबंदी तेज… अफगानिस्तान भी बांध बनाकर रोकेगा पाकिस्तान का पानी। सरकार, भाजपा और उसके काम की तारीफ में लगे कई अखबारों ने आज गुजरात समाचार के मालिक की गिरफ्तारी की खबर भी पहले पन्ने पर नहीं छापी है।     

आज जब ज्यादातर अखबार ऑपरेशन सिन्दूर और उसके बाद की जंग के बहाने मोदी सरकार की वीरता स्थापित करने वाली कहानियों से भरी है तब गुजरात समाचार के मालिक को एक पुराने मामले में गिरफ्तार किये जाने की खबर आठ में से छह अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। हिन्दी के दोनों अखबारों में तो नहीं ही है। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में फोल्ड के नीचे तीन कॉलम में और द टेलीग्राफ में टॉप पर तीन कॉलम में है। द टेलीग्राफ ने बाहुबली शाह की फोटो भी छापी है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, राज्य के सबसे पुराने अखबारों में एक गुजरात समाचार को चलाने वाली फर्म के निदेशकों में एक बाहुबली शाह को ईडी ने शुक्रवार की शाम गिरफ्तार कर लिया था बाद में उन्हें खराब स्वास्थ्य के आधार पर जमानत मिल गई। मनी लांडरिंग के जिस मामले में गिरफ्तारी की गई थी उसकी जांच 2023 से चल रही है। द टेलीग्राफ के अनुसार, गिरफ्तारी के बाद उन्होंने तबियत खराब होने की शिकायत की थी और उन्हें अस्पताल में दाखिल कराया गया था। अगले दिन जमानत मिली। इससे पहले गुजरात समाचार का एक्स खाता 9 मई से बिना कोई कारण बताये निलंबित कर दिया गया था। केंद्र सरकार ने इन्हीं दिनों पाकिस्तान से टकराव के माहौल में कई मीडिया संस्थानों पर ऑनलाइन नकेल कसी थी। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कल शाम इस गिरफ्तारी पर चिन्ता जताई थी और ई़डी की कार्रवाई को प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया था। इस संबंध में तमाम पत्रकार संगठनों का का साझा बयान मुझे भी कल शाम मिल गया था जबकि मैं सक्रिय पत्रकारिता में नहीं हूं। इसके बावजूद खबर पहले पन्ने पर नहीं होना इमरजेंसी की याद दिलाता है। तब पत्रकार एकजुट होकर सरकार से लड़ रहे थे। हिन्दू-मुसलमान करने वाली सरकार के शासन में पत्रकार तो बंट ही गये हैं मीडिया संस्थान के मालिक की गिरफ्तारी की विरोध भी मिलकर नहीं कर रहे हैं।

आज की दूसरी बड़ी खबर है, राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से जो सवाल किये हैं उसपर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा है कि वे दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात करेंगे। आप जानते हैं कि राज्यपालों की राजनीतिक सक्रियता के इस दौर में तमिलनाडु के राज्यपाल ने जब कई महीनों तक विधेयकों पर सहमति नहीं दी तो सु्प्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें लागू कर दिया गया। तभी सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपाल से समय सीमा के अंदर सहमति देने की सलाह दी थी। भाजपा ने तब यह सवाल उुठाया था और पूरे मामले को राजनीतिक रंग देने की कोशिश की थी। अब राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा है कि वह उन्हें आदेश दे सकता है कि नहीं। तकनीकी तौर पर मामला कुछ और हो तो भी मोटे तौर पर यही है और मुझे लगता है कि इस सवाल या मामले को तूल देकर राष्ट्रपति सत्तारूढ़ दल की राजनीति आसान कर रही हैं। जो भी हो, खबर तो यह है ही और कल मैंने बताया था कि कहां कैसे छपी थी। उसी क्रम में आज द हिन्दू में ये खबर छपी है जो दूसरे अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है।  

दि एशियन एज की एक खबर के अनुसार मणिपुर में हथियारों का बड़ा जखीरा जब्त किया गया है। आप जानते हैं कि कश्मीर और देश से आतंकवाद खत्म करने के नाम पर सरकार पाकिस्तान से लोहा ले रही है लेकिन मणिपुर की बात भी नहीं करती। मणिपुर की स्थिति नियंत्रण में क्यों नहीं है या आ गई है, नहीं बताया गया है। सरकार मणिपुर में शांति स्थापित करने के लिए क्या कर रही है वह तो पता नहीं है पर इतने दिनों बाद गोलीबारी तथा हथियार पकड़ा जाना चिन्ता का विषय है। तथ्य यह है कि मणिपुर शांत नहीं हो रहा है हम पाकिस्तान को सबक सिखाने में लगे हैं। और मीडिया को इसमें  कुछ गलत या अटपटा भी नहीं लग रहा है। खासकर तब जब अफगानिस्तान और तालिबान से दोस्ती हो रही है। आईएमएफ ने पाकिस्तान को जो पैसे दिये हैं उसे भारत अप्रत्यक्ष टेरर फंडिंग कह रहा है। दूसरी और सिन्धु संधि स्थगित करके पाकिस्तान को परेशान करने के लिये हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड के अनुसार नहरों का पुनर्निमाण होना है, नये नहर बनाये जाने हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार अटारी सीमा से अफगानिस्तान के लिये 160  ट्रकों को विशेष प्रवेश दिया जायेगा। आप जानते हैं कि पाकिस्तानी आतंकी को छुड़ाने के लिए भारतीय विमान का अपहरण किया गया था तब की भाजपा सरकार ने खूंखार आतंकी को छोड़ने का निर्णय किया था और तबके विदेश मंत्री उसे कंधार छोड़कर आये थे। अब के विदेश मंत्री उसी अफगानिस्तान में सत्तारूढ़ तालिबान से गलबहियां कर रहे हैं जैसे नरेन्द्र मोदी ने 2014 के बाद नवाज शरीफ से किये थे।

यह सब पूरी तरह ठीक हो और एतराज का कोई कारण नहीं हो तब भी खबर का हिस्सा तो होना ही चाहिये। सरकार से सवाल तो पूछे ही जाने चाहिये उसकी रीति नीति जानने-समझने की कोशिश होनी ही चाहिये पर सरकार विरोधियों का किसी न किसी तरह मुंह बंद कर मनमानी करने पर आमादा है। नेशनल कांफ्रेंस जम्मू व कश्मीर के लिए फिर से राज्य का दर्जा मांग रही है उसपर सुनवाई तो छोड़िये, खबर भी कहीं कोने में छपती है। पहले पन्ने सरकारी प्रचार के लिए आरक्षित से हैं। ऐसे में द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, पाकिस्तान आईएमएफ से प्राप्त पैसों का इस्तेमाल आतंकवाद के लिए करेगा। कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसा है तो आईएमएफ के खिलाफ वही कार्रवाई होनी चाहिये जो सरकार टेरर फंडिंग के लिये करती है या करने के लिए कहा है। वास्तविकता यह है कि कथित टेरर फंडिंग के डर से सरकार जनसेवा करने वालों को भी विदेशी चंदा या दान नहीं लेने देती और ऐसा नियम बना दिया है कि जन सेवा करने वाले तमाम संस्थानों के लिए विदेशी चंदा लेना असंभव या अस्वाभाविक हो गया है। इसमें सरकार के डर की भी भूमिका है। हलाल प्रमाणन के खिलाफ भी यही कहा जाता है और कार्रवाई जो होती है या हो रही है वह किससे छिपा है।

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