कानून के राजनीतिक और सरकारी इस्तेमाल का मामला साफ होता लग रहा है, कई उदाहरण आज ही हैं। हिमंत बिस्वा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट जाने को कहा जबकि 2018 के सबरीमाला मामले की समीक्षा नौ जजों की संविधान पीठ करेगी। न्यूजक्लिक संपादक की गिरफ्तारी को अदालत ने गलत कहा था अब फेमा उल्लंघन मामले में उसपर 184 करोड़ का जुर्माना।
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों में सुप्रीम कोर्ट से संबंधित खबरों की प्रस्तुति राजनीतिक आधार पर है तो खबरों में भी राजनीति नजर आती है। असल में एक आदेश एक में और दूसरा दूसरे अखबार में प्रमुखता से है। उदाहरण के लिए देशबंधु में चार कॉलम की खबर, दो लाइन का शीर्षक है – हिमंता मामले में सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई से इनकार। खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। याचिकाकर्ता के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि हिमंता बिस्व सरमा ने झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी (ऐसा ही या आपत्तिजनक) बयान का दिया है। इसलिए इस मामले को सुप्रीम कोर्ट को सुनना चाहिए। हिमंता ने संविधान की शपथ का उल्लंघन किया है। अमर उजाला में इतना ही बड़ा लेकिन और ऊपर या टॉप का शीर्षक है, धर्मस्थलों में महिलाओं से भेदभाव पर नौ जजों की संविधान पीठ करेगी सुनवाई। मुझे लगता है कि धर्म का मामला धर्म देखने वालों पर छोड़ दिया जाना चाहिए और धर्म की शिकायत भी अदालतों में नहीं करनी चाहिए। दिलचस्प है कि सर्वोच्च अदालत ने राजनीति से जुड़े मामले को छोड़ दिया और धर्म से संबंधित 2018 के फैसले की समीक्षा नौ जजों की संविधान पीठ से करने के लिए तैयार हो गई। हमारे संविधान (जो मौजूदा शासन में संकट में है) के बारे में आम समझ यही है कि हर किसी को अपने धर्म का पालन करने की छूट है। मोटे तौर पर धर्म के मामले धर्म वालों को ही निपटाना चाहिए बशर्ते बाजार-चौराहे या कानून व्यवस्था का मामला नहीं हो। हालांकि इस पर अलग चर्चा होनी चाहिए और अलग विषय है। आज मुद्दा यह है कि असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ हेट स्पीच का मामला सुप्रीम कोर्ट ने नहीं सुना। अमर उजाला में असम के मुख्यमंत्री वाला मामला पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन धर्म के मामले के भिन्न पहलू पहले ही पन्ने पर हैं जबकि दोनों आदेश एक दिन के थे तो दोनों को पहले पन्ने पर समान या कम ज्यादा महत्व मिलता। एक खबर का पूरा विवरण और दूसरे की चर्चा भी नहीं करना – पत्रकारिता की दृष्टि से ठीक नहीं है और चूंकि असम के मुख्यमंत्री का मामला भाजपा से संबंधित है तो उसे महत्व नहीं देना स्पष्ट रूप से राजनीतिक लगता है।
दूसरी ओर, देशबन्धु ने दोनों खबरों को लगभग एक साथ छापा है और एक को ज्यादा व दूसरे को कम महत्व दिया है तो इसमें कारण निष्पक्ष या स्वतंत्र पत्रकारिता का भी लगता है। पत्रकारिता के लिहाज से अदालत को धर्म के मामले में नहीं पड़ना चाहिए। सड़क पर नमाज पढ़ना हो या कावड़ियों की समस्या या उन पर सरकार की ओर से फूल बरसाने का मामला हो तो वह जरूरी अदालतों में सुना जाए, कानून व्यवस्था का मामला हो सकता है और दूसरों को प्रभावित कर सकता है। लेकिन मंदिर में या किसी और धर्मस्थल में किसी के प्रवेश या एतराज का मामला धार्मिक है। इसका फैसला धर्म वालों को करना चाहिए। इस पर मारपीट हो जाए और कोई पक्ष अदालत में आए तो अदालत को तभी दखल देना चाहिए जब वह कानून का भी मामला हो। ये मेरे निजी विचार है और पत्रकारिता के लिए हैं और आज खबरों की प्रस्तुति पर चर्चा इसी समझ या सोच के आधार पर कर रहा हूं। मुझे लगता है कि अमर उजाला ने सुप्रीम कोर्ट के दो आदेशों को पेश करने में पक्षपात किया है। अदालत ने असम के मुख्यमंत्री का मामला नहीं सुना यह कानूनी मामला हो सकता है लेकिन उसे पहले पन्ने पर नहीं छापना और धर्म से संबंधित दूसरी खबर को टॉप पर रखना भाजपा सरकार की राजनीति का समर्थन और प्रचार भी लगता है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता के लिए मैं नहीं चाहूंगा कि सुप्रीम कोर्ट इससे संबंधित नियम बनाए लेकिन पत्रकार के रूप में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाना संभव या जरूरी हो तो जरूर उठाऊंगा। जहां तक असम के मुख्यमंत्री का मामला है, मुझे लगता है कि एफआईआर तो संबंधित थाने को ही लिख लेना चाहिए था। और देश में कानून व संविधान का शासन लागू हो तो ऐसा हो सकता है। इसलिए जब किसी ने कार्रवाई नहीं की तो सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई (या करनी पड़ी) और सुप्रीम कोर्ट में यह दलील दी जा चुकी है कि राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ राज्य में कार्रवाई कौन कर पाएगा। भाजपा सरकार में यह विशेष संकट है, कई उदाहरण हैं)। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कानूनी पहलू के बारे में मैं नहीं जानता पर प्रस्तुति उसके अंदर की राजनीति बता रही है।
अमर उजाला ने बड़े और लाल अक्षरों में लिखा है, सबरीमला फैसले की समीक्षा को केंद्र सरकार का समर्थन। खबर में आगे लिखा है, इसमें केरल के सबरीमला मंदिर पर आए फैसले की समीक्षा भी शामिल है। आप जानते हैं कि केरल में भाजपा की धर्म की राजनीति की दाल नहीं गल रही है और खबर बता रही है कि इसे सरकार का समर्थन है। क्यों है समझना मुश्किल नहीं है और क्या इसीलिए सुनवाई सात अप्रैल से शुरू होगी और 22 अप्रैल को इसके खत्म होने की उम्मीद है। मुझे लगता है कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं है। और इस खबर को राजनीतिक कारणों से महत्व मिला है और हिमंत बिस्व सरमा की खबर को नहीं मिला है। मौजूदा राजनीतिक माहौल में स्वतंत्र औऱ निष्पक्ष पत्रकारिता का तकाजा था कि दोनों खबरों को बराबर महत्व मिलता। भले फैसले पर सवाल नहीं उठाया जाता, उसकी आलोचना नहीं की जाती। जो हुआ उसका कारण जो हो, आपत्तिजनक है और रेखांकित करने लायक है। खबर के अनुसार, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि वह सबरीमला फैसले की समीक्षा के लिए दायर याचिका का समर्थन करते हैं। जाहिर है, सरकारी धन से वेतन पाने वाले अधिवक्ता भी सरकार के हित में चाहते हैं कि धार्मिक मामले अदालत तय करे। ठीक है कि पहले भी ऐसा हुआ होगा लेकिन इसका मतलब नहीं है कि गलती सुधारी नहीं जाए या दोहराई जाती रहे।
इंडियन एक्सप्रेस में धार्मिक सुनवाई वाली खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन असम के मुख्यमंत्री वाली खबर का शीर्षक है, “हिमंता के हेट स्पीच मामले में मुख्य न्यायाधीश ने कहा : सुप्रीम कोर्ट राजनीतिक युद्ध का मैदान नहीं है”। हाईकोर्ट जाने के लिए कहा यह फ्लैग शीर्षक है और इस शीर्षक में जो नहीं कहा गया है वह सब अपने आप दिमाग में घूम जाता है। मुझे याद आता है कि देश में कांग्रेस की कथित भ्रष्ट और ‘हिन्दू विरोधी सरकार’ थी तो अदालतें स्वतः संज्ञान लेती थीं और तब शिकायतें भी सुनी जाती थीं। संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ऐसा व्यवहार नहीं करते थे तब भी। 2014 के बाद मुझे जो स्वतः संज्ञान याद है वह पश्चिम बंगाल के आरजी कार अस्पताल में डॉक्टर की मौत के बाद हुए हंगामें के मामले में था जबकि जांच सीबीआई को सौंपी जा चुकी थी और सीबीआई ने कलकत्ता पुलिस से अलग कुछ नहीं निकाला। अभी मुख्यमंत्री के खिलाफ मामला था, पर सुप्रीम कोर्ट ने नहीं सुना। धर्म स्थल के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की खबर इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया में सुप्रीम कोर्ट की दोनों खबरें पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर और पहले पन्ने पर अलग-अलग हैं। शीर्षक है, असम के मुख्यमंत्री के ‘हेट स्पीच‘ वाले मामले में हाईकोर्ट जाइए : सुप्रीम कोर्ट। द हिन्दू में धार्मिक मामलों वाली खबर पांच कॉलम में बॉटम है। इसके बराबर में असम के मुख्यमंत्री वाली खबर सिंगल कॉलम में है। सुप्रीम कोर्ट के एक और आदेश की खबर दो कॉलम में है।
खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट की पीठ इस बात की समीक्षा करेगी, क्या नया डेटा कानून आरटीआई को ‘बड़ा झटका’ देगा। कृष्णदास राजगोपाल की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट सोमवार को उन याचिकाओं को संविधान पीठ को भेजने पर सहमत हो गया, जिनमें कहा गया है कि भारत का नया डिजिटल पर्सनल डेटा कानून, राइट टू इन्फॉर्मेशन (आरटीआई) एक्ट के तहत नागरिकों के पारदर्शी और जवाबदेह सरकार के अधिकार को “बड़ा झटका” देता है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट 2023 का सेक्शन 44(3) आरटीआई एक्ट आवेदकों पर “पूरी तरह प्रतिबंध” लगाता है, ताकि वे ‘निजी सूचना’ का खुलासा करने की मांग नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि यह प्रावधान नागरिकों के सूचना के अधिकार को कमज़ोर करने के लिए प्राइवेसी के अधिकार का गलत इस्तेमाल करता है। इस खबर के साथ मुख्य न्यायाधीश का यह कथन हाईलाइट किया गया है, यह एक-दूसरे के हितों के बीच संतुलन बनाने के बारे में है। हमें कमियों को दूर करना होगा और यह तय करना होगा कि पर्सनल जानकारी क्या होती है। कहने की जरूरत नहीं है कि इस सरकार ने ऐसे बहुत सारे मुद्दे तय करवाए हैं और अब (सबरीमाला) मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मामला तय होगा (असल में तय तो हो चुका है अब उसकी समीक्षा होगी) लेकिन अदालत राजनीतिक युद्ध का मैदान नहीं है और सॉलिसिटर जनरल, तुषार मेहता ने कहा है कि वे सबरीमाला फैसले की समीक्षा के लिए दायर याचिका का समर्थन करते हैं। गौरतलब है कि द हिन्दू का शीर्षक अमर उजाला के शीर्षक से अलग है। अमर उजाला ने धर्म स्थल लिखा है जैसे सभी धर्मों का मामला हो या सभी मंदिरों (या सभी धर्मों के पूजा स्थलों) का मामला हो। तथ्य यह है कि मामला केरल के सबरीमाला मंदिर का है। अब 2018 के फैसले की समीक्षा का मामला है और भाजपा तब भी वहां सत्ता का विस्तार चाहती थी अब भी चाहती है। वैसे तो इसे भी केरल हाईकोर्ट में सुना जाना चाहिए लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मामले की समीक्षा हाईकोर्ट कैसे करे।
नवोदय टाइम्स के साथ अमर उजाला में भी आज सुप्रीम कोर्ट की एक अहम टिप्पणी प्रमुखता से छपी है। शीर्षक है, शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने में बरतें सावधानी। अमर उजाला की खबर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मामला फिलहाल टालते हुए दोनों पक्षों को समझौते की संभालना तलाशने के लिए कहा है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, विवाह पूर्व शारीरिक संबंध पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, शादी से पहले किसी पर भरोसा न करो। दि एशियन एज में असम के मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई की अपील को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने की खबर है लेकिन सुप्रीम कोर्ट से संबंधित अन्य कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं है। द टेलीग्राफ में एक ही खबर पहले पन्ने पर है और सिंगल कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया लेकिन डेटा कानून पर स्टे नहीं। हिन्दुस्तान टाइम्स में असम के मुख्यमंत्री वाली खबर या हिन्दू में छपी खबर तो नहीं है लेकिन सबरीमाला मंदिर या धार्मिक मामलों वाली खबर है। एक नई या अलग खबर भी है। इसका शीर्षक है, नौ जजों की पीठ अगले महीने फैसला करेगी, ‘उद्योग‘ क्या है। देश में सुप्रीम कोर्ट और पत्रकारिता की यह हालत (या उपयोग) है तो मीडिया संस्थान न्यूजक्लिक पर 184 करोड़ रुपए के के जुर्माने की खबर है। ईडी ने कथित फेमा उल्लंघन के लिए यह जुर्माना लगाया है। आप जानते हैं कि संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को 3 अक्टूबर 2023 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया था। उन पर आरोप था कि पोर्टल को चीन से जुड़े स्रोतों और अमेरिकी निवेशक जॉर्ज सोरोस के नेटवर्क से कथित रूप से धन प्राप्त हुआ, जिसका इस्तेमाल “भारत विरोधी प्रचार” के लिए किया गया। इसी मामले में एचआर प्रमुख अमित चक्रवर्ती सहित अन्य से भी पूछताछ और कार्रवाई की गई। पुलिस ने कई पत्रकारों और सहयोगियों के यहां तलाशी ली थी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए। मामला दिल्ली हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 15 मई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने प्रबीर पुरकायस्थ की गिरफ्तारी को अवैध ठहराते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी और रिमांड की प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया गया, विशेषकर आरोपों की लिखित जानकारी उपलब्ध कराने के संबंध में। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूएपीए जैसे कठोर कानूनों में भी प्रक्रिया का सख्ती से पालन आवश्यक है। रिहाई के बाद भी प्राथमिकी (एफआईआर) और जांच औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुई है। प्रबंधन ने आरोपों को निराधार और पत्रकारिता को दबाने की कार्रवाई बताया है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


