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वरिष्ठ पत्रकार हेम भट्ट का चैनल बंद करवाया जाना और उसी शाम हमला होना.. क्या महज संयोग है?

इंद्रेश मैखुरी-

बीते दिनों पत्रकार हेम भट्ट पर हमले की बात सामने आई और श्री भट्ट ने लिखित शिकायत पुलिस में दर्ज करवाई थी. प्रेस क्लब, पत्रकारों, सामाजिक, राजनीतिक संगठनों द्वारा इस हमले की तीव्र भर्त्सना की गयी.

पुलिस ने 24 घंटे में आरोपी बताए जा रहे दो लोगों को गिरफ्तार किया और बताया कि दो आरोपी गिरफ्तार कर लिए हैं, तीसरे की तलाश जारी है. हैरत की बात यह कि देहरादून के एसपी सिटी का इस मामले में जो वीडियो पुलिस की ओर से जारी हुआ, उसमें पकड़े गए आरोपियों के बारे में कोई ब्यौरा नहीं था.

अगले दिन अखबारों में खबर छपी कि पुलिस ने तो आरोपियों को पांच मिनट में छोड़ दिया यानि कि आरोपियों की गिरफ्तारी के बारे में जब तक एसपी सिटी का वीडियो रिकॉर्ड हो कर अपलोड हुआ होगा तब तक आरोपी छोड़े भी जा चुके होंगे!

इस मामले में पत्रकार हेम भट्ट ने बेहद वाजिब सवाल उठाए हैं. वे पूछते हैं कि पुलिस ने सिर्फ आरोपियों से बात करके ही कैसे निष्कर्ष निकाला कि मामला रोड रेज का है? एक ही दिन में उनके चैनल- जय भारत टी वी – को फेसबुक पर बंद करवाया जाना और उसी शाम हमला होना, क्या महज संयोग है?

वे तो यहां तक कहते हैं कि पुलिस ने इस बारे में उन्हें सूचित तक नहीं किया. आरोपियों की शिनाख्त भी नहीं करवाई गयी तो फिर कैसे माना जाए कि जिन्हें पकड़ा गया, वो ही हमला करने वाले थे?

आरोपी कहें, रोड रेज था, पास नहीं देने को लेकर उन्होंने मारपीट कर दी और पुलिस चुपचाप आरोपियों की बात मान ले, इतनी भोली कब से हो गयी पुलिस?

प्रश्न यह है कि पुलिस ने आरोपियों की बात पर इतने भोलेपन के साथ भरोसा कर लिया या कोई और दबाव काम कर रहा था, जिसके चलते पुलिस के सामने आरोपियों पर भरोसा करने और कार्रवाई का अभिनय करके आरोपियों को छोड़ देने के अलावा कोई चारा नहीं था?

इस मामले में श्री हेम भट्ट के संघर्ष करने के जज्बे के साथ पूर्ण एकजुटता और समर्थन, अन्याय के खिलाफ संघर्ष का जज्बा जिंदाबाद।

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