हिन्दी को अपनों ने ही छला है

भारत में हिन्दी का क्षेत्र बड़ा ही व्यापक है। समस्त उत्तर भारत में और देश के उन सभी अहिन्दी भाषी राज्यों में भी हिन्दी को समझने वालों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार में साहित्य, संस्कृति, धर्म, व्यापार, सामाजिक परिवेश और हिन्दी के प्रचारकों के अलावा हिन्दी सिनेमा का महत्वपूर्ण योगदान है। विभिन्न राजनीतिक दुराग्रहियों के द्वेष को सहने वाली हिन्दी आज अपने अस्तित्व को लेकर चिंतित है। स्वतंत्र भारत में आज तक जो सम्मान अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजी संस्कारों को देने का प्रयास किया गया उसका शतांश भी हिन्दी को नहीं मिला। उसके साथ दोहरा मापदण्ड अपनाया गया। प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, विश्व हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन किया जाता है, हिन्दी सप्ताह और पखवारा मनाया जाता है। राज्य और केंद्र सरकार के कई कार्यालयों में राजभाषा अधिकारी के रूप में हिन्दी के अधिकारी नियुक्त किये जाते हैं।

प्रत्येक वर्ष कर्मचारियों को हिन्दी में उत्कृष्ट काम करने के लिए पुरस्कृत भी किया जाता है। लेकिन यह सब एक कर्मकांड सा प्रतीत होता है, क्योंकि प्रति वर्ष सितम्बर माह के मध्य में इस प्रकार के क्रिया-कलाप किये जाते हैं। हिन्दी जस की तस फटे-चिथड़े कपड़े में लिपटी हुई दिखायी पड़ती है, ऐसा लगता है जैसे गरीबी और भुखमरी से पीडि़त कोई महिला अपने तन को ढंकने के लिए पुरानी धोती को लपेटे हुए हो। हिन्दी के प्रचार-प्रसार पर करोड़ो व्यय करने के बाद भी इसकी दशा और दिशा दोनों दयनीय हैं। वास्तव में इस स्थिति के जिम्मेदार भारतीय ही हैं, इससे वो स्वयं को अलग नहीं कर सकते। हिन्दी हर बार छली गयी है। वैश्वीकरण और बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव के कारण आज हिन्दी एक भाषा के रूप में न होकर बड़े बाजार के रूप में देखी जा रही है। जिसके चलते विश्व के तमाम अंतरताना (इंटरनेट) माध्यमों पर हिन्दी में समाचार व सूचनायें देने का दबाव बढ़ा है। यह हिन्दी भाषा के लिए शुभ संकेत है। हिन्दी भाषा को उसका उचित स्थान दिलाने का प्रयास भी भारतीयों को ही करना होगा।
 
विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में हिन्दी भी सम्मिलित है। अंग्रेजी व चीनी भाषा के बाद हिन्दी तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। एक अनुमान के अनुसार विश्व में हिन्दी समझने वालों की संख्या लगभग अस्सी करोड़ है। जिसमें से लगभग पचास करोड़ लोग तो भारत में ही हिन्दी को लिख, पढ़, बोल व समझ सकते हैं। शेष भारत में जहां इसको जानने और बोलने वालों की संख्या कम है लेकिन वो भी इसे समझते हैं। इस प्रकार शिक्षित और अशिक्षित दोनों प्रकार के लोगों में हिन्दी समान रूप से प्रचलित है। हिन्दी का व्याप्त बहुत विशाल है। विश्व के अनेक देशों में हिन्दी सीखने वालों की संख्या गत कई वर्षों की तुलना में काफी बढ़ी है। विदेशों में हिन्दी के अध्यापकों को पढ़ाने के लिए नियुक्त किया जा रहा है।

विश्व के 115 ऐसे शिक्षण संस्थान हैं जहां हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन होता है। अमेरिका के 32 संस्थानों, लंदन, कैम्ब्रिज और यार्क विश्वविद्यालय, जर्मनी के 15 संस्थानों के अलावा हालैंड के 4 विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ायी जाती है। हालैंड में केटलर नामक डच विद्वान ने 1698 में हिन्दी भाषा का व्याकरण लिखा था। ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, हालैण्ड, फिजी, मारीशस, सूरीनाम के अलावा अफ्रीकी व अरब आदि जैसे विश्व के अनेकों देशों में भी इसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। अमेरिका जैसे देश की संसद में गायत्री मंत्र का पाठ किया जाना इस बात का संकेत है कि भारतीय भाषाओं और भारतीय मूल्यों का प्रभाव बढ़ रहा है। जिसे भारत में स्वीकारने में राजनीतिक मजबूरी आड़े आ जाती है।

हिन्दी को राजभाषा के रूप में 14 सितम्बर 1949 को संवैधानिक मान्यता दी गई। संविधान के अनुच्छेद 343 में यह प्रावधान किया गया कि देवनागरी लिपि के साथ हिन्दी भारत की राजभाषा होगी। राष्ट्रभाषा के रूप में हिन्दी को स्थापित करने के लिए कई आंदोलन भी चले लेकिन भाषा की यह लड़ाई अधिक दिनों तक नहीं चल सकी। वास्तव में यह जन आंदोलन का रूप नहीं ले सका। भारत में हिन्दी आज भी दूसरी भाषा के रूप में देखी जाती है। यह स्थिति दूसरी भारतीय भाषाओं के साथ भी है। संस्कृत भाषा के बारे में यदि कोई आवाज उठाता है तो उसे तथाकथित आधुनिकतावादीयों द्वारा हेय दृष्टि और उपेक्षा से देखा जाता है। यहां तक कि उसे किसी संगठन या विचारधारा विशेष से जोड़कर एक महत्वपूर्ण विषय को कमजोर करने का प्रयास किया जाता है। आज संस्कृत संगणक (कम्प्यूटर) की भाषा बनने जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार संस्कृत भाषा की विशेषता यह है कि लिखने, पढ़ने व बोलने के लिए किसी अन्य प्रकार के स्वर और व्यंजनों का प्रयोग नहीं करना पड़ता जिससे संगणक पर काम करने में कठिनाई हो। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। तमिल, कन्नड़, तेलुगू, मलयालम, हिन्दी आदि भाषाओं में आज भी संस्कृत के अधिकांश शब्दों का प्रयोग होता है। हिन्दी के साथ एक विडंबना यह रही कि इसके साथ प्रयोग बहुत हुए। साहित्यकारों, भाषाविदों या पत्रकारों ने हिन्दी भाषा पर सर्वाधिक प्रयोग किये। उर्दू, फारसी, अरबी व अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग कर हिन्दी को चैराहे पर ला खड़ा किया है। हिन्दी को हिन्दी रहने दिया जाए यह अत्यंत आवश्यक है।

भारत जब स्वतंत्र हुआ तो लोगों को लगा कि रामराज्य आयेगा। अपनी भाषा, संस्कृति, संविधान, कानून, राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक व शिक्षा नीतियां आदि सभी भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप निर्देशित व अनुपालित किये जायेंगे। महात्मा गांधी ने मातृभाषा में शिक्षा देने का आग्रह किया था। तब उनके इस आग्रह को नकार दिया गया था। भारत में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति में सुधार को गठित आयोग ने मातृभाषा में शिक्षा देने की सिफारिश की है। सरकारी प्रश्रय पर जीवित अंग्रेजी आज भारत में भाषाओं की महारानी बना दी गई है। विभिन्न सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी में लिखे आवेदन या शिकायती पत्रों को स्वीकार किया जाता है। देश में नौकरशाहों की फौज खड़ी करने वाली संस्था संघ लोक सेवा आयोग ने नए पाठ्यक्रम के तहत अंग्रेजी की अनिवार्यता कर दी है जिससे गांव या हिन्दी माध्यम से पढ़े अभ्यर्थियों के सामने संकट की स्थिति उत्पन्न कर दी है। प्रशासनिक सेवा की प्रारम्भिक परीक्षा के ताजा परिणामों में हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों की संख्या अनुमान से काफी कम है। यह चिंताजनक है। हालांकि भाजपा सरकार ने इस पर तुरंत समाधान करते हुए इस वर्ष की संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अंग्रेजी के प्रश्नों को हल करने से छूट प्रदान की है। देश के नीतिगत मामलों में अंग्रेजीयत में पले बढ़े लोगों की बहुतायत होगी। भारतीय संस्कृति, संस्कारों, गांव, खेत, खलिहान और राजभाषा के प्रति कितनी निष्ठा से काम किया जाता है यह हम सब पिछली सरकार के कुछ राजनीतिज्ञों और नौकरशाहों के क्रिया-कलापों को देख कर समझ सकते हैं।

हिन्दी की उपेक्षा जितनी अंग्रेजी मानसिकता के लोगों ने की उससे कहीं अधिक इस भाषा के खेवनहारों ने भी की है। आज हिन्दी अपनों से ही उपेक्षित है। हिन्दी की तोता रटन्त बातें करने वाले और हिन्दी की रोटी खाने वाले दोनों ने हिन्दी की रंच मात्र भी चिंता नहीं की। मंचों और समाचारों तक ही हिन्दी के लिए उनकी चिंता रहती है। अधिकांश हिन्दीवादियों के बच्चे अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में पढ़ते है। यही लोग उन विद्यालयों में प्रवेश के लिए तमाम प्रकार के जुगाड़ लिए प्रवेश द्वार पर अपनी बारी का इंतजार करते दिखाई दे जाते हैं। क्यों हिन्दी को बार-बार छला जा रहा है। अंग्रेजी भाषा का कहीं कोई विरोध नहीं है। यह वर्तमान समय की आवश्यकता हो सकती है। किन्तु, केवल अंग्रेजी ही भविष्य का आधार नहीं हो सकती। विश्व के कई ऐसे देश हैं जिन्होंने अपनी भाषा में सरकारी कामकाज अपनाकर आज विश्व की अग्रिम पंक्ति में बैठे हुए हैं। वैश्वीकरण के दौर में हिन्दी तेजी से स्थापित हो रही है।

भारत में उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रवेश के बाद से अंग्रेजी को कड़ी टक्कर हिन्दी ने दी है। वैश्विक परिदृश्य में बाजारवाद हावी है। सवा अरब की जनसंख्या वाले भारत में हिन्दी की पहुंच ने उद्योगपतियों को ही नहीं बल्कि मीडिया उद्योग को भी आकर्षित किया है। समाचार पत्रों, टी0वी0 चैनलों और वेबसाइटों के नित नए हिन्दी संस्करणों का जन्मना इस बात का संकेत है कि हिन्दी का बाजार इतना बड़ा है कि इस पर कब्जा जमाने की होड़ सी लगी हुई है। माइक्रोसाफ्ट, गूगल, याहू, सन, आईबीएम, तथा ओरेकल जैसे उद्योगों ने हिन्दी के प्रयोग को प्रमुखता देना शुरू किया है। सूचनाओं और समाचारों को हिन्दी में प्रस्तुत करने में तेजी आयी है। भारतीय लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में संचार माध्यमों की भूमिका केवल शब्दों के माध्यम से कह देने से तय नहीं होने वाली है। बल्कि इसके लिए प्रत्येक स्तर पर सामूहिक प्रयास से आवश्यक दायित्व और भूमिका तय करना होगा। हिन्दी मीडिया उद्योग में समाचार को रूचिकर ढंग से प्रस्तुत करने के चक्कर में उच्चारणों की कमियों और अंग्रेजी शब्दों के मिले जुले प्रयोगों से एक नई भाषा हिंग्लिश का जन्म हुआ। यह हिन्दी के विद्रुप होने का प्रमाण है। यह तस्वीर का एक पहलू है, दूसरा पहलू समाज में अपनी भाषा को लेकर चिंता और उसे संरक्षित तथा विकसित करने के लिए भगीरथ प्रयास करने वालों की भी कमी नहीं है। ऐसे साहित्यकारों, भाषाविदों और पत्रकारों ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। उन्हें सम्मान, पुरस्कार और राजनीतिक संरक्षण की तनिक भी चिंता नहीं थी। मीडिया ने ऐसे मनीषियों के कार्यों को जनता के सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारत में सकारात्मक विकास की एक नई सोच पनपी है। इस नये विचार प्रवाह के निर्माण में मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। व्यक्ति, समाज, संस्कृति, संस्कार, भाषा और राष्ट्र आज भी बौद्धिक जगत में चर्चा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय है। समाज में वैचारिक मंथन व चिंतन के विषय मीडिया के द्वारा प्रचारित और प्रसारित किए जाते हैं। हिन्दी भाषा और मीडिया का जन्म जन्मांतर का साथ रहा है। मीडिया हिन्दी की सुचिता को बनाये रखने में अपनी भूमिका को और आगे बढ़ायेगी जिससे देश में एक भाषा, राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित हो सके।

नीरेन कुमार उपाध्याय
स्वतंत्र पत्रकार
पत्रकारिता एवं जनसंचार विषय में शोधरत
इलाहाबाद (उ0प्र0)
09451077130
nirenupadhyay@gmail.com
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