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मजीठिया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हिंदी अनुवाद पढ़ें (पार्ट वन)

अखबार प्रतिष्ठानों में कार्यरत श्रमजीवी पत्रकारों और गैर पत्रकार कर्मियों को मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतनमान न दिए जाने और माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश न मानने पर सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई 83 अवमानना याचिकाओं और तीन रिट पेटिशनों का निपटारा करते हुए 19 जून, 2017 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो निर्णय दिया है, उसे कुछ कर्मचारी साथी मालिकों के पक्ष में बताकर निराशा का माहौल पैदा करने में जुटे हुए हैं। हालांकि इस निर्णय में मालिकों के पक्ष में सिर्फ एक ही बात गई है, वो यह है कि कोर्ट ने इनके खिलाफ अवमानना को स्वीकार नहीं किया है और जिन अखबार मालिकों ने मजीठिया वेजबोर्ड अधूरा लागू किया है और जिनने नहीं लागू किया है उन्हें एक और मौका दिया गया है।

7. यहां तक कि पहले अधिनियम की धारा 12 के तहत 11.11.2011 को सरकार की अधिसूचना प्रकाशित हुई थी, मजीठिया वेजबोर्ड अधिनिर्णय/अवार्ड से प्रभावित विभिन्न समाचारपत्र स्थापनाओं ने इस न्यायालय के समक्ष भारत के संविधान की धारा 32 के तहत न्यायिक याचिकाएं(writ petitions) दायर करके वेजबोर्ड की सिफारिशों को चुनौती दी थी, रिट पेटिशन(सी) नंबर 246 आफ 2011 इसमें प्रमुख मामला था। अधिनियम की धारा 12 के तहत 11.11.2011 की अधिसूचना को न्यायिक याचिकाओं की लंबितता के दौरान जारी किया गया था, जिसे न्यायिक याचिाकाओं में संशोधन करके चुनौती के तहत लाया गया था।

8. उपरोक्त रिट याचिकाओं में, अन्य बातों के साथ(इंटर एलिया) इस आधार पर चुनौती गई थी कि 1974 में किए गए संशोधन सहित अधिनियम संवैधानिक तौर पर अवैध था और इसके अलावा यह कि वेजबोर्ड का गठन अधिनियम में निहित वैधानिक प्रावधानों के विपरित था। श्रमजीवी पत्रकारों के साथ-साथ गैरपत्रकार कर्मचारियों के वेतन/मजदूरी के निर्धारण के लिए वेजबोर्डों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया गलत और दोषपूर्ण थी, जिसे न्यायालय के हस्तक्षेप की आवश्यकता थी। 

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