अशोक कुमार पांडेय-
विकास की कहानी फाइनेंशियल टाइम्स की यह रिपोर्ट बता रही है।
खाने का सामान लगातार महंगा होता गया है और मध्यवर्ग की आय लगभग ठहरी हुई है, नतीजा यह कि आपको अपनी आय का बड़ा हिस्सा खाने पर खर्च करना पड़ रहा है और बाक़ी पर खर्च करने के लिए पैसे बच नहीं रहे।
प्रकाश के रे-
लकीरों से परे जो संकट है…
फ़ाइनेंशियल टाइम्स का यह ग्राफ़ ख़ूब शेयर किया गया है. इसमें बताया गया है कि मध्य वर्ग की आय एक दशक से ठिठकी पड़ी है, जबकि महँगाई तेज़ी से बढ़ी है. हालाँकि टाइम्स को मध्य आय वर्ग लिखना चाहिए था क्योंकि भारत में कोई मध्य वर्ग नहीं है. वैसे भी मध्य वर्ग एक सामाजिक श्रेणी है, आर्थिक नहीं.
दूसरी बात यह है कि हमारे देश में अगर कोई 25 हज़ार रुपया महीना कमा रहा है, तो वह कमाई के मामले में शीर्ष के 10 प्रतिशत लोगों में है और अगर मासिक कमाई 50 हज़ार रुपये है, तो वह फिर शीर्ष के एक प्रतिशत लोगों में है. तो जिसे मध्य वर्ग कहा जाता है, वह असल में शीर्ष आय श्रेणी में है.
वैश्विक अध्ययन बताते हैं कि केवल एक देश है, जहाँ अस्सी के दशक से अब तक कामकाजी लोगों की आय वास्तव में बढ़ी है. वह देश चीन है. ख़ैर, तमाम तरह की महँगाई और फ़ालतू के ख़र्च ने मध्य आय वर्ग को तो निचोड़ा ही, लेकिन कुछ अन्य चीज़ें भी घातक साबित हुई हैं.
सबसे बड़ा नुक़सान तो यह हुआ कि दो-तीन दशक से ढंग की बचत योजनाएँ ख़त्म हो गईं. कथित आर्थिक सुधारों ने बैंकों को मनमाना फ़ैसले की छूट दे दी. सूद की दरें पतंग हो गईं. क़र्ज़ ले-लेकर सामान ख़रीदने ने मध्य आय वर्ग को मध्ययुगीन सर्फ़ बना दिया, उसे बटाई पर खेती करने वाले के जैसा बना दिया. ऐसे में कमाऊ लोगों के जीवन में उनके पहले की पीढ़ी का सुकून नहीं रहा. सो, तमाम तरह की बीमारियाँ और कुंठाएँ भी हिस्से में चली आईं.
दूसरा बड़ा नुक़सान यह हुआ कि उन्होंने अच्छी शिक्षा के नाम पर बच्चों को नक़ली स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाया और पढ़ा रहे हैं. क्या हाल हुआ है! नौकरी देने वाले कह रहे हैं कि पेशेवर शिक्षा पाये अधिकतर युवा तो रोज़गार के योग्य ही नहीं हैं. अब ग़ैर-पेशेवर डिग्रियों का अनुमान लगा लें.
तीसरा बड़ा नुक़सान यह हुआ कि मध्य आय वर्ग स्वतंत्रचेता, तार्किक और रचनात्मक नहीं रहा, वह व्यावहारिक भी नहीं रहा, उसके भीतर प्रतिक्रिया करने की क्षमता भी जाती रही. इस व्याधि से वह अपनी संतानों को भी संक्रमित कर रहा है. वह चक्रव्यूह से निकलने की कोशिश भी कर रहा है, तो वह कर्मकांड से अधिक कुछ नहीं है.
निष्कर्ष यह कि बहुत कठिन है डगर पनघट की…



