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जाली, फ़र्ज़ी और नक़ली तीनों के अर्थों में भारी अन्तर है!

एल एन शीतल-

‘जाली’ (Forge) शब्द से बना है ‘जालसाज़ी’ (Forgery), जिसका मतलब है असल दस्तावेजों या हस्ताक्षरों में हेरफेर करके किसी को ठगना या धोखाधड़ी करना। इसे यों समझें कि जब काग़ज़ों या दस्तावेज़ों में काट-छाँट या हेराफेरी का अपराध किया जाता है, तो उसे जालसाज़ी कहते हैं। जैसे, यदि कोई व्यक्ति अपनी अंकसूची में छेड़-छाड़ करके अपने अंक बढ़ा लेता है तो उसके उस कृत्य को जालसाज़ी कहेंगे।

‘फ़र्ज़ी’ (bogus, Fictitious) का अर्थ है फ़र्ज़ करना यानी कल्पना करना। अर्थात काल्पनिक, मन से बनाया हुआ, फ़र्ज़ किया हुआ। इसी तरह ‘फ़र्ज़ीवाड़े’ शब्द का मतलब यह हुआ कि जिसका वास्तव में अस्तित्व ही नहीं है, उसका अस्तित्व दिखा कर धोखाधड़ी करना।

जैसे, तालाब तो असल में बनाया ही नहीं गया, लेकिन उसे बनाया गया दर्शा कर सार्वजनिक धन हड़प लेना। एक और उदाहरण। यदि कोई व्यक्ति काग़ज़ों में दिखाता है कि उसने 40 लोगों से कोई काम करवाया। लेकिन वास्तव में उसने केवल 32 लोगों से ही काम करवाया, भुगतान 40 का ले लिया। तो उसने 8 लोगों के नामों पर भुगतान लेकर फ़र्ज़ीवाड़ा किया।

प्रसंगवश बता दूँ कि नुक़्ता कैसे-कैसे खेल कर देता है। इसकी एक बानगी देखिए। फ़र्ज़ का मतलब होता है कर्त्तव्य, जबकि ‘फ़र्ज’ का अर्थ होता है ‘योनि’।

नक़ली (Fake, Imposter) जो किसी की नक़ल भर हो। इस सन्दर्भ में ज़रूरी है कि चीज़ या व्यक्ति का असल में होना। ‘नक़ली’ यानी असल की नक़ल। जैसे, किसी स्थापित ब्राण्ड का कोई उत्पाद है। लेकिन जब कोई व्यक्ति या संस्थान उसी ब्राण्ड और उसी उत्पाद के नाम से कोई उत्पाद बेचता है तो वह उत्पाद नक़ली कहा जायेगा और वह संस्थान या व्यक्ति नक़्क़ाल कहे जायेंगे।

लेकिन सभी समाचार माध्यमों में इन तीनों प्रकारों के अपराधों के लिए केवल एक ही शब्द ‘फ़र्ज़ीवाड़े’ का प्रयोग धड़ल्ले से किया जाता है, जबकि तीनों के अर्थों में भारी अन्तर है।

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