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सियासत

मोदी सरकार के नए प्राइवेसी कानून को पत्रकारों और एक्टिविस्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी!

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री Narendra Modi की सरकार के नए प्राइवेसी कानून को लेकर देश में बड़ा कानूनी और लोकतांत्रिक विवाद खड़ा हो गया है। पारदर्शिता के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट्स और पत्रकारों ने इस कानून को Supreme Court of India में चुनौती दी है, यह कहते हुए कि इससे पत्रकारिता पर “चिलिंग इफेक्ट” पड़ेगा और सरकार को जनहित की सूचनाएं छिपाने का मौका मिल जाएगा।

इस मामले में चार अलग-अलग याचिकाओं पर 23 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि यह कानून 20 साल पुराने सूचना के अधिकार कानून (RTI) को कमजोर कर रहा है, जो अमेरिका के फ्रीडम ऑफ इंफॉर्मेशन एक्ट की तर्ज पर बना था।

क्या है विवाद की जड़?

विवाद का केंद्र Digital Personal Data Protection Act है, जो नवंबर में लागू हुआ। इसके तहत RTI कानून में एक लाइन का संशोधन किया गया है, जिसमें “व्यक्तिगत जानकारी” (personal information) को साझा करने से बाहर कर दिया गया है।

पहले कानून में यह प्रावधान था कि अगर जनहित में जरूरत हो, तो ऐसी जानकारी भी सार्वजनिक की जा सकती है। लेकिन नए बदलाव के बाद अधिकारियों को यह अधिकार मिल गया है कि वे व्यक्तिगत जानकारी के नाम पर कई अहम सूचनाएं देने से इनकार कर सकते हैं।

एक्टिविस्ट्स और पत्रकारों की आपत्ति

प्रमुख पारदर्शिता कार्यकर्ता Anjali Bhardwaj ने कहा कि इस बदलाव का इस्तेमाल सरकार ठेकेदारों या अधिकारियों के नाम छिपाने के लिए कर सकती है, भले ही वे घटिया काम या भ्रष्टाचार से जुड़े हों।

RTI एक्टिविस्ट Venkatesh Nayak ने अपनी याचिका में इसे “भागीदारी लोकतंत्र के लिए मौत की घंटी” बताया है और कहा है कि इससे ओपन गवर्नेंस की अवधारणा कमजोर होगी।

सरकार का पक्ष

सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है। केंद्रीय आईटी मंत्री Ashwini Vaishnaw ने संसद में कहा था कि यह बदलाव व्यक्तिगत गोपनीयता और सूचना के अधिकार के बीच संतुलन बनाने के लिए किया गया है और इससे सूचना साझा करने की प्रक्रिया पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा।

पत्रकारों में बढ़ी चिंता

मीडिया संगठनों का कहना है कि इस कानून का असर न्यूज़ गैदरिंग पर पड़ेगा। Editors Guild of India ने चेतावनी दी है कि इससे खोजी पत्रकारिता (accountability journalism) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

नई दिल्ली स्थित The Reporters’ Collective भी उन संगठनों में शामिल है, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में इस कानून को चुनौती दी है। उनका कहना है कि यह कानून पत्रकारों और आम नागरिकों को भारी जुर्माने के डर से आत्म-सेंसरशिप के लिए मजबूर करेगा।

अंतरराष्ट्रीय तुलना और रैंकिंग

दिलचस्प बात यह है कि ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में ऐसे कानूनों में पत्रकारों को छूट दी गई है, जबकि भारत के इस कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

इसके अलावा, प्रेस स्वतंत्रता को लेकर भारत की स्थिति भी चिंता का विषय बनी हुई है। ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत 180 देशों में 151वें स्थान पर है।

आगे क्या?

इस मामले की सुनवाई लंबी चल सकती है और अंतिम फैसला आने में कई महीने लग सकते हैं।

लेकिन इतना साफ है कि यह मामला सिर्फ एक कानून का नहीं, बल्कि पारदर्शिता, पत्रकारिता और लोकतंत्र के भविष्य का बड़ा परीक्षण बन गया है।

न्यूज़ एजेंसी रायटर्स में प्रकाशित खबर पर आधारित

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1 Comment

1 Comment

  1. Vaibhav Sunder

    March 21, 2026 at 10:47 pm

    People take their ISP providers too seriously anyway 🙂 I’m not even gonna try to explain what is the ground in US. EU Modi knows. Collaborative Democratics = pending wrath on Socialism, the political party kind, when INC answers Mamdani whenever. Have you seen the state of real Left media? (The wire etc.) They’re selling their pants to exist.

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