Justice For Sanskriti : हत्या के 6 दिन के बाद भी लखनऊ पुलिस के पास कोई सुराग नहीं है

Samar Anarya

एक जिला है बलिया। आजादी की लड़ाई के लिए मशहूर। कचहरी पर कब्ज़ा कर आज़ादी के पहले तिरंगा लहरा देने वाले चित्तू पांडेय का जिला। जिले में एक जगह है फेफना। बस. इसके बाद कुछ है नहीं। इसके बाद कुछ है नहीं सब था.

जैसे फेफना के भगवानपुर गांव के रहने वाले वकील उमेश कुमार राय की 17 साल की छोटी बेटी थी- नाम संस्कृति राय. कायदे से अभी भी है ही होना चाहिए था पर अब वो लखनऊ में पॉलिटेक्निक कॉलेज में सेकेंड ईयर में पढ़ती है नहीं, पढ़ती थी। फर्स्ट ईयर में उसे हॉस्टल मिला था- माने गुंडाराज में ही मिला होगा, रामराज तक तो परीक्षा करीब आ जाती है.

सेकेंड ईयर रामराज में उसे हॉस्टल नहीं मिला था। सो वो इंदिरानगर में सेक्टर 19 में राजेंद्र अरोड़ा के मकान में किराए पर रहने लगी। संस्कृति अभी घर से छुट्टी मना कर आयी थी, क्योंकि 7 जून को उसकी प्रैक्टिकल की परीक्षा थी. परीक्षा उसने दे दी थी (है होना था पर फिर वही!).

परीक्षाएं खत्म होने के बाद संस्कृति 21 जून की रात रात अपने घर के लिए निकली थी. रात 9 बजे उसने अपनी मां नीलम राय जी को फोन करके बताया भी था किस वो बादशाहनगर से ट्रेन पकड़ने निकल चुकी थी। उसके साथ उसकी चंदौली की रहने वाली दोस्त पुष्पांजलि को भी ट्रेन पकड़नी थी।

पर फिर संस्कृति स्टेशन नहीं पहुंची थी। पुष्पांजलि ने संस्कृति को फोन किया तो उसका फोन बंद था। फिर पुष्पांजलि ने एक और सहेली को फोन कर बताया कि संस्कृति स्टेशन नाहीज पहुँची और उसका फोन भी बंद है। तब सहेली ने संस्कृति के पिता उमेश कुमार को रात के 9 बजकर 52 मिनट पर फोन किया। परेशान पिता ने लखनऊ में रहने वाले एक रिश्तेदार को फोन किया और पूरी बात बताई। इसके बाद रात में ही वो रिश्तेदार गाजीपुर इंस्पेक्टर के पास पहुंचा। गाजीपुर इंस्पेक्टर ने संस्कृति के पिता उमेश से बात की और अनहोनी की आशंका जताई।

अगले दिन 22 जून की दोपहर करीब 12 बजे घैला गांव की रहने वाली एक महिला प्रेमा ने झाड़ियों में एक लड़की को गंभीर हालत में देखा। उसने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस मौके पर पहुंची और उसे ट्रॉमा सेंटर लेकर गई। ट्रॉमा सेंटर में पहुंचने के बाद डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। लड़की के पास मोबाइल, पर्स या कोई ऐसे कागजात नहीं थे, जिससे पुलिस उसकी पहचान कर पाती। लिहाजा पुलिस ने उसकी फोटो सोशल मीडिया पर वायरल कर दी।

गाजीपुर के इंस्पेक्टर सुजीत राय ने उस लड़की की शिनाख्त बलिया के फेफना के रहने वाले संस्कृति राय के तौर पर की थी। प्राथमिक जांच में इंस्पेक्टर मडियांव अमरनाथ वर्मा ने बताया कि लगता है कि लूट के इरादे से संस्कृति राय की हत्या की गई। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक संस्कृति के सिर पर ईंटों से प्रहार किया गया था तथा आस-पास खून के छीटें पड़े थे और ऐसा लग रहा था कि संस्कृति ने खुद के बचाव के लिए खूब हाथ-पैर मारे थे।

आज हत्या के 6 दिन के बाद भी लखनऊ पुलिस के पास कोई सुराग नहीं है। मामले और परिवार से जुड़े लोग बताते हैं कि पुलिस के मुताबिक कुछ मोबाइल नंबर हैं, जिन्हें सर्विलांस पर लगाकर जांच की जा रही है। हत्यारे अब भी अज्ञात हैं.

पर इसके बाद फिर से कुछ ‘था’ है में बदल गया है. बलिया की ही बेटी निर्भया की दिल्ली में कांग्रेस सरकार के वक़्त हुए सामूहिक बलात्कार और हत्या पर देश भर में आक्रोश था, संस्कृति पर नहीं है. तब कांग्रेस की सरकार थी, अब नहीं है, भाजपा की है.

अभी कठुआ में बलात्कार और हत्या के बाद तमाम हिन्दू शूरवीरों का (भाजपा राज वाले) असम में बेटियों के बलात्कारों और हत्याओं पर खून खौल रहा था- अब नहीं खौल रहा है. अभी तमाम भगवा गमछे गाज़ियाबाद में गीता (बदला नाम) नाम की बच्ची को इंसाफ़ मांग रहे थे, अब नहीं मांग रहे हैं. पहले प्रदेश में जंगलराज था- अब रामराज है.

हम जैसे क्या करें- हम तो उन जैसे वहशी भी नहीं हो सकते कि इनसे पूछें कि किसका इन्तजार कर रहे हो- कल कोई कठुआ फिर से हुआ तब संस्कृति पर बोलोगे? और वो भी ऐसे कि सरकार तुम्हारी, प्रशासन तुम्हारा और तुम हम से ही पूछ रहे कि तब तुम कहाँ थे?

पर एक चीज अब भी है- माने है ही है.

बाकी जगहों की कौन कहें, राजधानी लखनऊ में बच्चियाँ तब भी मार के मोहनलालगंज में फेंक दी जाती थीं, अब तो बीच शहर फेंक दी जाती हैं.

निर्भया थी. अब नहीं है. आसिफा थी. अब नहीं है. संस्कृति थी. अब नहीं है.

रामराज के दावे हैं. बुलेट ट्रेन के वादे हैं. आपातकाल की निंदा है. नेहरू का हौवा है. 2019 भूल 2022 के वादे हैं. लाल बत्ती कारें हैं. उनमें बस बदल गए लोग हैं. कहीं दूर हापुड़ में किसी और हत्या पर चमकती आँखें हैं.

लड़कियों की आँख में उतर आया डर है. बलात्कारी-हत्यारी हो गयी सड़के हैं. सहमें हुए माँ बाप हैं. .

अब आगे बस लड़कियों से खाली होने को कॉलेज हैं. हॉस्टल हैं. मॉल हैं. सड़कें हैं.

(नाम और घटना का ब्यौरा विशाल शेखर राय वाया Madhvendra Pratap Singh। दुःख, पीड़ा, और रोज थोड़ा और पत्थर हो जाता मन अपना)

#JusticeForSanskriti

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय उर्फ समर अनार्या की एफबी वॉल से.

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